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कावेरी जल विवाद: जानिए कैसे 120 साल पुराने विवाद ने दो राज्यों के बीच खड़ी की दीवार

कैच ब्यूरो | Updated on: 16 February 2018, 12:35 IST

लगभग 120 साल से कावेरी नदी के पानी को लेकर तमिलनाडु और कर्नाटक राज्य के बीच विवाद पर आज सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया है. सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु के मिलने वाले पानी को घटा दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नदी पर कोई एक राज्य दावा नहीं कर सकता.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि तमिलनाडु को 177.25 टीएमसी पानी दिया जाए. वहीं कर्नाटक को 14.75 टीएमसी अतिरिक्त पानी दिया जाएगा. सीजेआई दीपक मिश्रा की अगुआई वाली तीन जजों की बेंच ने यह फैसला सुनाया.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा नदी का जल राष्ट्रीय संपत्ति है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कर्नाटक के फायदे के लिए यह फैसला दिया गया है. सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से कर्नाटक को फायदा हुआ है. इसके बाद कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्घेरमैया ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर खुशी जाहिर की है. वहीं तमिलनाडु ने फैसले पर समीक्षा की बात कही है.

 

आइए आपको बताते हैं क्या है कावेरी जल विवाद?

कर्नाटक राज्य के कोडागु जिले से निकलने वाली कावेरी नदी तमिलनाडु के पूमपुहार में बंगाल की खाड़ी में जाकर गिरती है. इसके पानी के बंटवारे को लेकर तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच विवाद है. कावेरी नदी के बेसिन में कर्नाटक का 32 हजार वर्ग किलोमीटर और तमिलनाडु का 44 हजार वर्ग किलोमीटर का इलाका आता है.

दोनों ही राज्यों को सिंचाई के लिए पानी की जरूरत है. इसे लेकर दशकों से विवाद चल रहा है. विवाद के निपटारे के लिए जून 1990 में केंद्र सरकार ने कावेरी ट्राइब्यूनल बनाया था, लंबी सुनवाई के बाद 2007 में फैसला दिया कि हर साल कावेरी नदी का 419 अरब क्यूबिक फीट पानी तमिलनाडु को दिया जाए जबकि 270 अरब क्यूबिक फीट पानी कर्नाटक को दिया जाए.

कावेरी बेसिन में 740 अरब क्यूबिक फीट पानी मानते हुए ट्राइब्यूनल ने अपना फैसला सुनाया. इसके अलावा केरल को 30 अरब क्यूबिक फीट और पुद्दुचेरी को 7 अरब क्यूबिक फीट पानी देने का फैसला दिया गया. ट्राइब्यूनल के फैसले से कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल खुश नहीं थे और फैसले के खिलाफ तीनों ही राज्य एक-एक करके सुप्रीम कोर्ट पहुंचे.

 

कर्नाटक चाहता था कि तमिलनाडु को जल आबंटन कम करने के लिए सुप्रीम कोर्ट आदेश जारी करे, जबकि तमिलनाडु का कहना था कि कर्नाटक को जल आवंटन कम किया जाए.

ट्रिब्यूनल ने तमिलनाडु में 192 टीएमसी फीट (हजार मिलियन क्यूबिक फीट) को कर्नाटक द्वारा मेटटूर बांध में छोड़ने के आदेश दिए थे. जबकि कर्नाटक को 270 टीएमसी फीट, केरल को 30 टीएमसी आवंटित किया गया था और पुडुचेरी को 6 टीएमसी आवंटित किया गया था.

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सभी राज्यों का आधार है कि उनके हिस्से में कम आबंटन दिया गया है. अंतिम सुनवाई 11 जुलाई को शुरू हुई और बहस दो महीने तक चली थी.

कर्नाटक ने तर्क दिया कि 1894 और 1924 में तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेंसी के साथ जल साझाकरण समझौता किया गया था और इसलिए 1956 में नए राज्य की स्थापना के बाद इन करारों को बाध्य नहीं किया जा सकता.

कर्नाटक ने आगे तर्क दिया कि ट्रिब्यूनल ने तमिलनाडु को पानी के हिस्से को आबंटित करने में इन समझौतों की वैधता को मान्यता दी है, जो गलत है. राज्य चाहता है कि अदालत कर्नाटक को तमिलनाडु को केवल 132 टीएमसी फीट पानी छोड़ने की अनुमति दे.

वहीं, तमिलनाडु ने इन तर्कों का खंडन किया था और कहा था कि कर्नाटक ने कभी भी दो समझौतों को लागू नहीं किया और हर बार राज्य को अपने अधिकार के पानी के दावे के लिए सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगानी पड़ती है.

तमिलनाडु का कहना है कि ट्रिब्यूनल ने ग़लती से कर्नाटक को 270 टीएमसी फीट पानी आबंटित किया था, जिसे कम कर 55 टीएमसी किया जाना चाहिए और तमिलनाडु को और अधिक जल दिया जाना चाहिए.

 

कावेरी नदी को दक्षिण भारत की गंगा भी कहा जाता है. यह पश्चिमी घाट के पर्वत ब्रह्मगिरी से निकली है. इसकी लंबाई करीब 800 किलोमीटर है. कावेरी नदी के डेल्टा पर अच्छी खेती होती है. कावेरी नदी के जल पर चार राज्यों के करोड़ों लोग निर्भर हैं.

पिछले कुछ सालों में अनियमित मानसून और बेंगलुरु में भारी जल संकट की बात कहकर कर्नाटक बार-बार यह तर्क देता रहा है कि उसके पास कावेरी नदी बेसिन में इतना पानी नहीं है कि वह तमिलनाडु को उसका हिस्सा दे सके. वहीं, तमिलनाडु का तर्क था कि राज्य के किसान साल में दो फसल बोते हैं, इसलिए उन्हें कर्नाटक के मुकाबले ज्यादा पानी मिलना चाहिए.

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गौरतलब है कि साल 2016 में कावेरी विवाद पर आए सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश के बाद पूरे कर्नाटक में बड़े पैमाने पर हिंसक प्रदर्शन हुए थे. इसी मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में आज फैसला आया है.

First published: 16 February 2018, 12:05 IST
 
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