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इरोम के बहाने: जुझारू समाजसेवियों की चुनावी सफलता की दर इतनी खराब क्यों है?

कैच ब्यूरो | Updated on: 17 March 2017, 7:42 IST

सामाजिक कार्यकर्ता इरोम शर्मिला अपना पहला ही चुनाव हार गई. शर्मिला मणिपुर के पूर्व मुख्यमंत्री ओकराम इबोबी के खिलाफ थौबल सीट से चुनाव लड़ी थीं. शर्मिला के प्रशंसकों के लिए यह किसी सदमे से कम नहीं था. राजनीति को परिवर्तन लाने का जरिया बनाने का उनका प्रयास भले ही असफल सिद्ध हुआ हो, लेकिन यह संदेश तो मिल ही गया कि सामाजिक या सामुदायिक आंदोलनों को राजनीतिक पार्टी बनाना किसी चुनौती से कम नहीं है.

इरोम पहली सामाजिक कार्यकर्ता नहीं हैं, जिसने राजनीति में आने की इच्छा से चुनाव लड़ा हो और पहले ही प्रयास में फेल हो गए हों. उनसे पहले भी कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने ऐसी कोशिश की और विफल रहे.

इरोम शर्मिला सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम (आफस्पा) के खिलाफ संघर्ष का प्रतीक बन चुकी हैं. मणिपुर का जाना-माना नाम होने के बावजूद वे पहला ही चुनाव हार गईं. उनका राजनीतिक करियर शुरू होने से पहले ही खत्म हो
गया. उन्होंने अरसे से उनका साथ दे रहे सहयोगियों की सलाह लिए बगैर एकदम से अपना अनशन खत्म कर, राजनीति में आने का फैसला किया था.

अनशन खत्म करने के बाद एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने अपने दोस्त डेसमंड काउंटीन्हो से शादी का ऐलान कर दिया. मणिपुर जैसे पिछड़े राज्य में 16 साल तक अनशन पर रहीं इरोम शर्मिला लोगों की नजरों में महान बन गई थीं लेकिन शर्मिला का अचानक अनशन खत्म कर एक ऐसे व्यक्ति से शादी करना, जिसे ज्यादातर लोग पसंद नहीं करते, लोगों के बीच उनके प्रति नाराजगी का कारण बन गया.

यह सामाजिक आंदोलन के चुनावी राजनीति में बदलने पर होने वाली जिल्लत का जीता जागता उदाहरण है. बड़े पैमाने पर सामाजिक कार्यकर्ताओं का राजनीति में आने का सबसे बड़ा उदाहरण आम आदमी पार्टी का बैनर है. इसके तले नर्मदा बचाओ आंदोलन की मेधा पाटकर, आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता सोनी सोरी और कुडनकुलम विद्युत परियोजना विरोधी आंदोलन के एसपी उदय कुमार ने 2014 का लोकसभा चुनाव लड़ा था.

मेधा ने मुंबई (उत्तर पूर्व) क्षेत्र से चुनाव लड़ा. इसी क्षेत्र में उन्होंने लोगों को आवास दिलाने के लिए 35 साल तक संघर्ष किया. उन्होंने मानखुर्द, मुलुंड और चेम्बूर की झुग्गी-बस्ती में रह रहे लोगों को आवास दिलाने के लिए काम किया. उन्हें सिर्फ 75,000 वोट मिले. बाकी सामाजिक कार्यकर्ताओं के चुनाव परिणाम भी कमोबेश ऐसे ही रहे.

पूर्व प्रशासनिक अधिकारी डॉ. जयप्रकाश नारायण ने आंध्र प्रदेश में लोकसत्ता पार्टी (एलएसपी) का गठन किया लेकिन यह ज्यादा दिनों तक एक राजनीतिक संगठन नहीं रह सका, क्योंकि वे चुनाव हार गए थे. तभी से डॉ. जयप्रकाश ने राजनीति छोड़ दी और अपने वकालत के पेशे व सामाजिक कार्य की ओर लौट गए.

मुश्किल डगर

कुल मिलाकर बात यह है कि सामाजिक आंदोलन का राजनीतिक संगठन में बदलना इतना आसान नहीं है, जितना अरविंद केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी ने पिछले चार सालों में लोगों को दिखाया है. कांग्रेस और भाजपा जैसी पुरानी पार्टियों को चुनौती देना कोई आसान नहीं है, क्योंकि इन पार्टियों को व्यापक जनसमर्थन प्राप्त है. बड़ी पार्टियां इन सामाजिक कार्यकर्ताओं को आर्थिक प्रलोभन और झिड़कियां देने में भी नहीं चूकती.

यह स्थिति सामाजिक आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ताओं और समर्थकों के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है, जिनके पास न पैसा है और न पावर. इन कार्यकर्ताओं को जो संसाधन दिए जाते हैं, वे अक्सर मंझे हुए राजनेताओं के खर्चे का बहुत छोटा हिस्सा होता है यानी इन कार्यकर्ताओं को लगभग बिना संसाधनों के चुनाव मैदान में उतार दिया जाता है.

जनता से नैतिकता के आधार पर वोट की अपील करना भी व्यर्थ है क्योंकि बड़े राजनेताओं को दशकों से मिल रहे समर्थन के चलते सही और गलत के बीच की महीन रेखा कुछ धुंधली सी पड़ गई है.

सामाजिक कार्यकर्ताओं को समझना होगा, जरूरी नहीं कि लोग उन्हें उनके संघर्ष का जवाब वोट देकर दें

उदाहरण के लिए, तेलीगाव के बाहुबली बाबुश मॉन्सरेट को लेकर मतदाताओं में भय व्याप्त है और वे उन्हें ही मानते भी हैं. उनके रियल एस्टेट के अवैध कारोबार से उन्होंने यहां के स्कूलों और कॉलेजों को आर्थिक सहायता दी है और तेलिगावकरों के हजारों लोगों के मेडिकल बिलों का भुगतान किया है. उन्होंने लोगों के घर बनाने में उनकी मदद की. शौचालय बनवाए और शादियों के लिए पैसा दिया. स्वाभाविक है कि तेलीगाव के मतदाता बाबुश के प्रति अधिक कृतज्ञ होंगे बजाय शर्मिला को वोट करने वाले मणिपुर के मतदाताओं के.

सामाजिक कार्यकर्ताओं को समझना होगा, जरूरी नहीं कि लोग उन्हें उनके संघर्ष का जवाब वोट देकर दें. रौसेउ ने इस बारे में एक कड़वा लेकिन खरा सच कहा है, ‘हर इंसान अच्छा होता है लेकिन जीवन भ्रष्ट आदमी का जीता है. आम तौर पर भ्रष्टाचार के जरिये लोगों को जल्दी लाभ होता है बजाय लम्बे समय तक चलने वाले संघर्ष के. और सबसे बढ़ कर मतदाताओं को कोई नहीं बरगला सकता.'

बिना किसी प्रलोभन और हिकारत के पंजाब के ग्रामीण इलाकों में 24 प्रतिशत की वोट साझेदारी के साथ 20 सीटें जीतना एक चार साल पुरानी पार्टी के लिए कोई मामूली बात नहीं है. केवल आप पार्टी ने ही अपने आपको सामाजिक संगठन से राजनीतिक पार्टी में सफलतापूर्वक परिवर्तित किया है लेकिन उसकी इस उपलब्धि को कमतर करके आंका जाता रहा है. पार्टी ने जिस तरह से आम आदमी के लिए राजनीति के दरवाजे खोले और सत्ता को चुनौती दी, वह लोकतंत्र में मील का पत्थर है. इसलिए इसकी कद्र की जानी चाहिए.

इरोम शर्मिला आफस्पा के खिलाफ अपने लंबे आंदोलन के लिए हमेशा एक महान कार्यकर्ता के तौर पर याद की जाएंगी और हमारा सुझाव है कि वे राजनीति छोड़ने के फैसले पर पुनर्विचार करें और अगले चुनाव के लिए पीपुल्स रीसर्जेन्स एंड जस्टिस एलायंस (पीआरजीए) का गठन करें.

First published: 17 March 2017, 7:42 IST
 
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