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अगस्ता की आंधी में उड़ सकती है अहमद पटेल की रहस्य की चादर

आकाश बिष्ट | Updated on: 2 May 2016, 8:26 IST
QUICK PILL
  • जानकार इसे लेकर अटकलें लगा रहे हैं कि नोट में दर्ज \"एपी\" नाम का व्यक्ति कोई और नहीं बल्कि सोनिया गांधी के सबसे खास उनके राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल हैं.
  • राजनीतिक हलकों में अहमद भाई के नाम से जाने जाने वाले पटेल कांग्रेस पार्टी के मुख्य मध्यस्थ या वार्ताकार माने जाते हैं और किसी भी बड़े संकट के समय वे पार्टी के प्रमुख संकटमोचक भी हैं.

मिलान के कोर्ट आॅफ अपील्स ने बीती 8 अप्रैल को फिनमेक्कैनिका और अगस्टा वेस्टलैंड के तीन अधिकारियों को वीवीआईपी हेलीकाॅप्टरों के सौदों में रिश्वतखोरी और काले धन के लेनदेन के आरोपों में सजा सुनाई है. 

अदालत के इस फैसले में कुछ वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं के नामों का उल्लेख होने के चलते भारतीय संसद में इस मामले को लेकर हंगामा मचा हुआ है और बीजेपी इस मौके का उपयोग विपक्ष पर 3600 करोड़ के इस हेलीकाॅप्टर सौदे में भ्रष्टाचार करने का आरोप लगाते हुए उसे घेरने के लिये करना चाहती है.

हालांकि अदालती आदेश में कहीं भी कांग्रेस नेतत्व द्वारा गड़बड़ी करने का कोई उल्लेख नहीं किया गया है लेकिन इस मामले में बिचौलिये की भूमिका निभाने वाले क्रिस्चियन मिशेल और गुइडो हैश्के द्वारा हस्तलिखित एक नोट, जो इस आदेश का एक हिस्सा है, में राजनीतिक वर्ग से ताल्लुक रखने वाले किसी "एपी" को रिश्वत के तौर पर 15.16 मिलियन यूरो बतौर घूस भुगतान करने का उल्लेख है. 

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जानकार इसे लेकर अटकलें लगा रहे हैं कि नोट में दर्ज "एपी" नाम का व्यक्ति कोई और नहीं बल्कि सोनिया गांधी के सबसे खास उनके राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल हैं.

आरोपों पर पहली प्रतिक्रिया देते हुए पटेल ने कहा, ‘‘अगर मैं दोषी हूं तो मुझे फांसी पर लटका दो.’’ पटेल का यह बयान काफी आश्चर्यजनक माना जा रहा है क्योंकि उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में सार्वजनिक रूप से शायद ही कभी इस तरह का कोई बयान दिया हो.

पटेल दुनिया की नजरों से दूर, पर्दे के पीछे रहकर काम करने वाली शख्सियत हैं. अगर हम ध्यान दें तो इस तरह का तल्ख बयान पटेल ने इससे पहले 2008 में तब दिया था जब उनका नाम ‘‘कैश फाॅर वोट’’ के सूत्रधार के रूप में उछला था. उस समय उनका कहना था, ‘‘अगर कोई यह साबित कर दे कि मैंने किसी भी सांसद को कोई रिश्वत दी है तो मैं सार्वजनिक जीवन छोड़कर कोई भी सजा भुगतने के लिये तैयार हूं.’’

सूत्रधार

राजनीतिक हलकों में अहमद भाई के नाम से जाने जाने वाले पटेल कांग्रेस पार्टी के मुख्य मध्यस्थ या वार्ताकार माने जाते हैं और किसी भी बड़े संकट के समय वे पार्टी के प्रमुख संकटमोचक भी हैं. अपने मन की बात वे सिर्फ कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के साथ ही साझा करते हैं. 

पटेल के दोस्त और दुश्मन सभी उन्हें ‘स्पिन डाॅक्टर’ और 'पैसा उगाहने वाला’ जैसे विशेषणों से नवाजते हैं. फंडरेज़र के रूप में उनके द्वारा किये जाने वाले काम उन्हें समय-समय पर सुर्खियों में लाते रहे हैं.

वरिष्ठ पत्रकार अदिति फड़नीस अपनी पुस्तक ‘पाॅलिटिकल प्रोफाइल्स आॅफ काबाॅल्स एंड किंग्स’ में एक जगह लिखती हैं कि वे मात्र 30 मिनट के भीतर 30 करोड़ रुपये की व्यवस्था करने में सक्षम हैं. ऐसे तमाम मौके आए हैं जब पत्रकारों ने चुनाव प्रबंधन के दौरान उनके कार्यालय से नोटों के भरे हुए बोरे जाते हुए देखे हैं. 

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चूंकि कई बड़े उद्योगपति अहमद भाई के गृहराज्य गुजरात से संबंध रखते हैं और ऐसे में गुजरात उनकी पार्टी के कोष का मुख्य स्रोत है.

यहां तक कि उनके कट्टर विरोधी और आलोचक भी उनकी निष्ठा और प्रथमिकता के लिये उनकी प्रशंसा करते हैं. शायद ही किसी राजनीतिक दल के नेता ने कभी अहमद भाई की बुराई की हो.

मीडिया से दूरी बनाए रखते हुए भी अहमद पटेल ने यह सुनिश्चित किया है कि उनकी मित्रता देश के तमाम शीर्ष संपादकों के साथ बनी रहे

कुछ खास पत्रकारों के अलावा लगभग समूचे मीडिया के लिये देश के सबसे शक्तिशाली कार्यालयों में से एक को संभालने वाले इस व्यक्ति तक अपनी पहुंच बनाना लगभग असंभव है. मीडिया से दूरी बनाए रखते हुए भी अहमद पटेल ने यह सुनिश्चित किया है कि उनकी मित्रता देश के तमाम शीर्ष संपादकों के साथ बनी रहे. इसके जरिए वे कांग्रेस अध्यक्ष को मीडिया की किसी भी नकारात्मक खबर से बचाए रखते हैं. नपे-तुले शब्दों वाले अहमद पटेल के शब्दों को पार्टी के भीतर ‘मैडम’ के शब्द माना जाता है.

एक वरिष्ठ सपा नेता कहते हैं, ‘‘अगर आप पर्दे के पीछे रहकर काम करने वाले अन्य स्पिन मैनेजरों पर एक नजर डालें तो उनमें से कोई भी अहमद भाई के बराबर नहीं ठहरता, क्योंकि ताकत का नशा कभी उनके सिर पर नहीं चढ़ा. वे अपना दिमाग ठंडा रखने के अलावा मुंह बंद रखना बखूबी जानते हैं.’’ 

लेकिन उनकी ताकत समय के साथ तबसे कम होती जा रही है जबसे सोनिया गांधी ने निर्णय लेने के सारे अधिकार राहुल गांधी को सौंपे हैं.

राहुल गांधी का लचर प्रदर्शन

जबसे गांधी परिवार के इस वारिस ने बड़ी जिम्मेदारी संभाली है पटेल कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति में लगभग हाशिये पर धकेल दिये गए हैं. पार्टी में उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी संभालने के बाद राहुल और उनकी टीम ने पार्टी के मुद्दों को अपने तरीके से निबटाना प्रारंभ कर दिया है और पटेल को निर्णय लेने की इस प्रक्रिया से दूर रखा जाने लगा है.

एक वरिष्ठ संपादक और पटेल के व्यक्तिगत मित्र बताते हैं, ‘‘राहुल या उनकी टीम में से शायद ही कोई उनसे परामर्श लेता है और उनके अपने नए रणनीतिकार हैं. मैं जब भी किसी लेख के सिलसिले में उनसे मिलने जाता हूं तो वे लगातार यही कहते रहते हैं कि अब मेरे हाथ में कुछ नहीं है.’’

राहुल के कुछ नजदीकी नेता विभिन्न अवसरों पर पार्टी के वरिष्ठ नेतृत्व, विशेषकर पटेल को कांग्रेस की मौजूदा स्थिति के लिये जिम्मेदार ठहराते आए हैं जिसके फलस्वरूप वे निरंतर हाशिये पर आते जा रहे हैं.

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हालांकि राहुल और उनकी टीम की निरंतर विफलताओं के चलते पार्टी को समय-समय पर पटेल और अन्य वरिष्ठ नेताओं की सहायता लेनी पड़ी है. चाहे मामला उत्तराखंड, मणिपुर, हिमाचल प्रदेश और अन्य राज्यों में पार्टी नेताओं के बीच उपजे अंदरूनी असंतोष से निबटने का हो, या सरकारों की बर्खास्तगी का हो. कहा जा रहा है कि हर बार विद्रोह को कुचलने में पटेल ने ही मुख्य भूमिका निभाई है.

वे क्रिकेट के बेहद शौकीन थे और गेंदबाजी और बल्लेबाजी में एक से निपुण थे

यहां तक दिसंबर 2015 में जब सोनिया और राहुल गांधी को नेशनल हेराल्ड मामले में अदालत के समक्ष पेश होनेे के आदेश हुए तब कांग्रेस मुख्यालय पर देशभर से पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं को एकत्र कर ताकत दिखाने के पीछे भी पटेल का ही दिमाग था. 

उनका रुतबा कुछ ऐसा है कि राहुल की टीम के उनको किनारे करने के तमाम प्रयास विफल होते आए हैं और आपात स्थितियों में अब भी वे ही पार्टी के तारणहार साबित होते आए हैं.

सियासी सफर

21 अगस्त 1949 को भरुच जिले के पीरामन गांव में मोहम्मद ईशाकजी पटेल और हवाबेन मोहम्मदभाई पटेल के घर जन्मे अहमद पटेल को प्यार से ‘बाबू भाई’’ कहकर पुकारा जाता था. 

वे क्रिकेट के बेहद शौकीन थे और गेंदबाजी और बल्लेबाजी में एक से निपुण थे. लेकिन उनकी सबसे बड़ी विशेषता थी उनकी गुगली जिसका इस्तेमाल उन्होंने बाद में राजनेताओं को  बोल्ड करने में बखूबी किया.

कांग्रेस के प्रति हमदर्दी रखने वाले और स्थानीय व्यापारी संगठनों के नेता के रूप में काम करते हुए उनके पिता ने उन्हें गुजरात के सत्ता के गलियारों तक पहुंच बनाने में उनकी मदद की. 

गुजरात युवक कांग्रेस के एक सदस्य होने के अलावा अल्पसंख्यक का तमगा पटेल को आगे ले जाने में काफी मददगार साबित हुआ. सिर्फ 28 वर्ष की आयु में वे गुजरात प्रदेश युवक कांग्रेस के सबसे युवा अध्यक्ष बने. समय के साथ उनकी नजदीकियां राजीव गांधी से बढ़ीं और उनकी व्यक्तिगत ईमानदारी वह विशेषता रही जिसने उन्हें गांधी परिवार को इतने करीब पहुंचा दिया.

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बीते करीब दो दशकों से सोनिया गांधी के साथ साये की तरह रहने वाले पटेल ऐसे संकटमोचक बनकर उभरे हैं जिसने कई अवसरों पर पार्टी को शर्मनाक स्थितियों से सफलतापूर्वक उबारा है. वे उन चुनिंदा कांग्रेसियों में से हैं जो इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और सोनिया गांधी के साथ काम कर चुके हैं. 

हालांकि वे कोई महान वक्ता या भीड़ को आकर्षित करने वाले व्यक्तित्व के स्वामी नहीं हैं लेकिन वे एक ऐसे व्यक्ति हैं जो कांग्रेस नेताओं की नई पीढ़ी के मुकाबले संगठन को बेहतर तरीके से जानते और समझते हैं.

पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ सोनिया गांधी के जुड़ने का एकमात्र जरिया होने के चलते पटेल सिर्फ अपनी पार्टी में ही नहीं बल्कि पूरे राजनीतिक जगत में पर्दे के पीछे से काम करने वाले आदर्श नेता का प्रतीक बन गए हैं.

उनमें से कुछ आरोप लगाते आए हैं कि उन्होंने नरेंद्र मोदी के गुजरात का मुख्यमंत्री रहते समय उनके साथ एक गुपचुप समझौता किया था

सोनिया गांधी के साथ उनकी नजदीकी के चलते उनके कई विरोधी भी बने हैं जो राजनीतिक रणनीतिकार के रूप में उनकी क्षमता पर संदेह करते आए हैं. वे समय-समय पर उनके गृहराज्य गुजरात में कांग्रेस को पुनर्जीवित करने की उनकी अक्षमता को उठाते हैं जहां कांग्रेस, बीजेपी का मुकाबला करने में नाकाम सिद्ध हुई है.

उनमें से कुछ आरोप लगाते आए हैं कि उन्होंने नरेंद्र मोदी के गुजरात का मुख्यमंत्री रहते समय उनके साथ एक गुपचुप समझौता किया था. उनके आलोचक उन्हें औसत दर्जे का एक ऐसा राजनेता कहते आए हैं जिसका कोई जनाधार नहीं है. वे कांग्रेस में सिर्फ अपनी पैसा ला सकने की क्षमता के कारण प्रासंगिक बने हुए हैं.

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उनके हाथ में एक और ताकत है. वही यह तय करते हैं कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से कौन मिल सकता है और कौन नहीं. उनके विरोधियों का कहना है कि यही एक बात पार्टी को सबसे अधिक नुकसान पहुंचा रही है. इसके अलावा कांग्रेस कार्यकर्ता उनपर कांग्रेस अध्यक्ष को जमीनी हकीकत को लेकर लगातार अंधेरे में रखने का आरोप भी लगाते हैं.

उनके ऊपर यह आरोप भी लगता है कि उन्होंने पार्टी में अल्पसंख्यक समुदाय के नए चेहरों को सामने लाने और उन्हें प्रशिक्षित करने का कोई प्रयास नहीं किया. एक मुसलमान होने के अलावा पार्टी में एक प्रमुख स्थान पर होने के चलते उनके समुदाय के लोगों को उम्मीद थी कि वे अपनी पहुंच का उपयोग करते हुए उनके लिये कुछ करेंगे. लेकिन पटेल ऐसा कुछ भी करने में असफल साबित हुए हैं.

उनकी तरक्की को उनकी बेदाग वफादारी का ईनाम माना जा सकता है

एक तरफ तो पटेल पार्टी को चलाने में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की सफलतापूर्वक मदद करते आए हैं वहीं दूसरी तरफ वे 2002 के गुजरात दंगों के बाद अपने गृहराज्य के मुसलमानों के लिये कुछ न करने को लेकर निशाने पर भी रहे हैं. गुजरात के मुसलमानों का मानना है कि दंगों के बाद जब गुजरात के मुसलमानों ने मदद के लिये अहमद पटेल की तरफ उम्मीद की निगाहों से देखा तो उन्होंने एक अजीब सी दूरी और चुप्पी बनाए रखना बेहतर समझा.

सानिया गांधी की मजबूत धर्मनिरपेक्ष साख और सांप्रदायिक राजनीति के खिलाफ राहुल गांधी की घोषित स्थिति के बावजूद गुजरात को लेकर पटेल की स्थिति डांवाडोल रही है. 

उनकी तरक्की को उनकी बेदाग वफादारी का ईनाम माना जा सकता है. पटेल ने खुद को दी गई जिम्मेदारियों को बखूबी अंजाम दिया है, और अबतक वे पार्टी को बुरे दौर से निकालने में मददगार बनते रहे हैं. इसके अलावा वे हर कठिन स्थिति में कांग्रेस अध्यक्ष का बचाव करने में ङी सफल रहे हैं, चाहे इसके लिये उन्हें कुछ दोष अपने सिर ही लेने पड़े हों.

First published: 2 May 2016, 8:26 IST
 
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