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आखिर क्यों घाटी में पुलिस जवान आतंकियों के साथ सांठगांठ कर रहे हैं?

रियाज-उर-रहमान | Updated on: 9 February 2016, 22:08 IST
QUICK PILL
  • पिछले 10 महीनों के दौरान तीन पुलिस कर्मचारी आतंकियों से हाथ मिला चुके हैं. जनवरी महीने में कॉन्सेटबल शकूर अहमद पारे अपने सहयोगी की एके-47 लेकर फरार हो गया. पारे दक्षिण कश्मीर के बिजबेहरा में तैनात एसडीपीओ इरशाद अहमद राथेर का निजी सुरक्षा अधिकारी था.
  • पिछले साल मार्च महीने की शुरुआत में तत्काली सड़क और परिवहन मंत्री अल्तार बुखारी का गार्ड अपनी रायफल के साथ फरार हो गया. बाद में उसकी तस्वीर कंधे पर बंदूक टांगे नजर आई जिसमें वह हिजबुल के कमांडर बुरहान वानी के साथ नजर आ रहा था.

शनिवार को रियाज अहमद शाह अपनी सर्विस राइफल के साथ श्रीनगर के पुलिस स्टेशन रैनावारी से भाग गया. शाह रैनावारी पुलिस थाने में तैनात था. दो दिनों बाद शाह ने अपने हथियार के साथ बड़गाम में सरेंडर कर दिया. फिलहाल शाह से लापता होने के मामले में पूछताछ की जा रही है.

हालांकि घाटी में शाह की फरारी ने लोगों को संदेह करने पर मजबूर कर दिया है. ऐसा माना जा रहा है कि शाह ने आतंकवादियों से हाथ मिला लिया है. पिछले 10 महीनों के दौरान तीन पुलिस कर्मचारी आतंकियों से हाथ मिला चुके हैं. जनवरी महीने में कॉन्सेटबल शकूर अहमद पारे अपने सहयोगी की एके-47 लेकर फरार हो गया. पारे दक्षिण कश्मीर के बिजबेहरा में तैनात एसडीपीओ इरशाद अहमद राथेर का निजी सुरक्षा अधिकारी था.

शकूर के लापता होने से तीन हफ्ते पहले राथेर एक आतंकी हमले में गंभीर रूप से घायल हो गए थे. दो आतंकियों ने उन पर बेहद करीब से निशाना साधा था. एसडीपीओ को सीने, पेट और पैरों में गोली लगी. 

हमले के वक्त शकूर उनके साथ था लेकिन उसने हमले के दौरान एक भी गोली नहीं चलाई. इसकी वजह से पुलिस को उससे पूछताछ करने के लिए बाध्य होना पड़ा. पूछताछ के दौरान उसने पुलिस को बताया कि वह रायफल के हाथ से फिसल जाने की वजह से गोली नहीं चला सका.

पिछले साल मार्च महीने की शुरुआत में तत्काली सड़क और परिवहन मंत्री अल्तार बुखारी का गार्ड अपनी रायफल के साथ फरार हो गया. बाद में उसकी तस्वीर कंधे पर बंदूक टांगे नजर आई जिसमें वह हिजबुल के कमांडर बुरहान वानी के साथ नजर आ रहा था. 7 फरवरी को सुरक्षा बलों ने पुलिस से आतंकी बने सैयद मुफीद बशीर को मार गिराया जो स्पेशल पुलिस ऑफिसर हुआ करता था. 

सूचना मिलने के बाद सुरक्षा बलों ने पुलवामा के गुंडपुरा गांव का घेराव किया और बाद में हुई मुठभेड़ में वह मारा गया. पिछले साल मुफीद पुलवामा के पुलिस लाइंस से फरार हो गया था.

पुलिस ने आदेश जारी कर छुट्टी के दिनों में सुरक्षा बलों के साथ हथियार ले जाए जाने पर पाबंदी लगा दी है

इस तरह की घटनाएं पुलिस और सुरक्षा बलों के लिए बेहद चिंता का कारण बन जाती हैं. कश्मीर के इंस्पेक्टर जनरल सईद जाईद मुज्ताबा गिलानी ने संवाददाताओं को बताया, 'यह हमारे लिए वाकई में चिंता का विषय है और हम इस बारे में काम कर रहे हैं.' उन्होंने कहा, 'हम इस दिशा में पहले ही कुछ फैसला कर चुके हैं. हम अब इस बारे में उनकी काउंसलिंग करेंगे.'

पुलिस के डायरेक्टर जनरल के राजेंद्र ने आदेश जारी कर छुट्टी के दिनों में सुरक्षा बलों के साथ हथियार ले जाए जाने पर पाबंदी लगा दी है. सुरक्षा बलों को नजदीकी के पुलिस थानों में हथियार जमा कराए जाने का आदेश दिया गया है. 26 सालों के आतंक के इतिहास में यह पहली बार हो रहा है जब सुरक्षा बलों के कर्मचारी हथियारों के साथ भागकर आतंकियों से हाथ मिला रहे हैं.

आतंकियों की तरफ से सोशल मीडिया में डाले गए वीडियों और तस्वीरों में जेहाद को महिमामंडित कर दिखाया जाता है

हालांकि सुरक्षा विशेषज्ञ आतंकवादियों की तरफ से चलाए जा रहे आक्रामक कैंपेन की भूमिका को भी इसका कारण बताते हैं. आतंकवादियों की नई पीढ़ी पूरी तरह से टेक्नो फ्रेंडली है. पुलिस के एक अधिकारी ने बताया, 'सोशल साइट्स ने आतंकवाद को एक तरह से लाइव इवेंट बना दिया है. 

आतंकियों की तरफ से डाले गए वीडियों और तस्वीरों में जेहाद को महिमामंडित कर दिखाया जाता है.' उन्होंने कहा, 'इसकी चपेट में न केवल युवा आते हैं बल्कि कई बार पुलिस अधिकारी भी इस प्रोपेगेंडा का शिकार हो जाते हैं.' हालांकि दूसरे पुलिस अधिकारी ने ऑनलाइन प्रोपेगेंडा को बहुत अधिक तवज्जो नहीं दी. उन्होंने एसपीओ की नियुक्ति को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि ऐसे पुलिस अधिकारियों को बाद में नियमित कर कॉन्सेटबल बनाते हुए उनका प्रोमोशन कर दिया जाता है.

उन्होंने कहा, 'अधिकांश एसपीओ को उनकी पृष्ठभूमि की वजह से नियुक्त किया जाता है. वह आतंकी पृष्ठभूमि से भी जुड़े होते हैं क्योंकि उनसे सूचना मिलने की उम्मीद होती है.' उन्होंने कहा, 'ऐसा व्यक्ति दो फाड़ के बीच फंसा रहता है और फिर किसी मौके पर वह अपने पुराने दिनों की तरफ  लौट जाता है.'

पुलिस और आतंकियों के बीच का गठजोड़ राज्य में बहुत पुराना मामला नहीं है. 2012 में पुलिस ने 18 महीनों के दौरान 13 आतंकी हमले करने के आरोप में कॉस्टेबल अब्दुर्र राशिद शिगन को गिरफ्तान किया. 11 अगस्त 2012 को डीएसपी की हत्या करने के बाद शिगन ने अपना नाम बदलते हुए न्यूज एजेंसियों को और अधिक हमला करने की चेतावनी दी. सीएनएस को उसने बताया, 'हम सभी पुलिसकर्मियों के खिलाफ नहीं है. हम उन पुलिसकर्मियों का सम्मान करते हैं जो आंदोलन के प्रति समर्थन रखते हैं लेकिन हम उनका पीछा नहीं छोड़ेंगे जो हमे नुकसान पहुंचा रहे हैं.'

जून महीने में पुलिस ने आतंकियों से संबंध रखने के मामले में चार और पुलिसकर्मियों को गिरफ्तार किया. इनमें मुक्तसर अहमद शेख भी शामिल था जिसने अंडरकवर एजेंट के तौर पर काम करते हुए 2008 के मुंबई हमलों के जिम्मेदार आतंकियों को सिम कार्ड मुहैया कराया था.

शिगन की गिरफ्तारी के तुरंत बाद पुलिस ने पुलिस-सेना और आतंकियों के बीच के गठजोड़ का पर्दाफाश किया और इस मामले में चार लोगों को गिरफ्तार किया गया एक पुलिस का जवान, सेना का जवा और एक संदिग्ध आतंकी शामिल था.

हालांकि शाह के तुरंत ही आत्मसमर्पण किए जाने के बाद पुलिस को राहत तो मिली है लेकिन सुरक्षा बलों के लिए यह चिंता की बात है. बेशक छोटी संख्या में पुलिस के लोग आतंकियों से हाथ मिला रहे हैं लेकिन इस ट्रेंड को लेकर चिंता बनी हुई है. पुलिस के एक अधिकारी ने बताया, 'हम उम्मीद करते हैं कि आने वाले दिनों में कोई और पुलिस को छोड़कर आतंकियों से हाथ नहीं मिलाएगा. इसे रोकने के लिए हम कुछ उपाय भी कर रहे हैं.'

First published: 9 February 2016, 22:08 IST
 
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