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कोलंबिया में शांति समझौता हो सकता है तो बस्तर में क्यों नहीं?

शिरीष खरे | Updated on: 6 July 2016, 7:42 IST

हाल ही में लैटिन अमरीकी देश कोलंबिया में 50 वर्ष पुराने सरकार और विद्रोही संगठन रिवोल्यूशनरी आर्म्ड फोर्सेस ऑफ कोलंबिया (एफएआरसी) के बीच चल रहे गृहयुद्ध को रोकने के लिए दोनों पक्षों के बीच एक स्थायी संघर्ष विराम लागू करने पर सहमति बनी. 

सवाल है कि जब इतने उग्र बलों के साथ समझौता करने में कोलंबिया सरकार को सफलता मिल सकती है तो क्या माओवाद प्रभावित बस्तर में ऐसा नहीं हो सकता है?

इस शांति समझौते के अगले दिन यानी 24 जून, 2016 को केंद्रीय गृह सचिव राजीव महर्षि की अध्यक्षता में हुई बैठक में बताया गया कि बीते साल माओवादी ऑपरेशन के दौरान बस्तर की जमीन पर 65 से ज्यादा लोगों ने दम तोड़ा. यहां साल-दर-साल माओवादी घटनाओं में 30 से 40 फीसदी तक इजाफा हो रहा है. हर 40 लोगों पर एक सुरक्षाबल तैनात है, जो कश्मीर से भी बुरी स्थिति दर्शाता है. 

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26 जून, 2016 को रांची में केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने देश से माओवाद को जल्द खत्म कर देने का दावा किया. उन्होंने माओवादियों से चेतावनी के लहजे में कहा अब उनके दिन गिने चुने हैं. 

सवाल है कि सरकार बड़े पैमाने पर सशस्त्र बलों के बूते यदि माओवाद का खात्मा करना चाहती है तो यह समस्या सिमटने का नाम क्यों नहीं ले रही? 

दरअसल, कोलंबिया के विपरीत बस्तर में ये 5 कारण हैं जो शांति समझौते में बाधा डाल रहे हैं:

1) अविश्वास

भारत में हुईं वार्ताओं की कोशिशों के दौरान केंद्र सरकार पर आंध्र-प्रदेश के माओवादी नेताओं को धोखे से मारने का आरोप है. 2010 में राज्य और माओवादियों के बीच मध्यस्थता कर रहे स्वामी अग्निवेश ने बातचीत के लिए तैयार माओवादी नेता आजाद को धोखे से मारे जाने की आशंका जताते हुए इस प्रकरण में उच्च स्तरीय जांच की मांग की थी. 

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बस्तर के माओवाद पर रिपोर्टिंग कर चुके वरिष्ठ पत्रकार आलोक पुतुल का कहना है, "आज हालत यह है कि सरकार माओवादियों से बातचीत के पहले बंदूक छोडने की बात कहती है, जबकि माओवादियों का कहना है कि हमने बंदूक छोड़ दी तो आप बात ही क्यों करोंगे?"

स्थिति जो भी हो, लेकिन भारत सीमा पर शांति बहाली के लिए यदि पाकिस्तान से बात कर सकती है तो माओवादियों से बातचीत भी संभव है.

2) कानूनों का उल्लंघन

छत्तीसगढ़ में सरकार वन और खनन संबंधी कानूनों को लागू कराने को लेकर सवालों के घेरे में है. इसी बीच अब केंद्र की मोदी सरकार पर आरोप है कि वह जंगलों को निजी कंपनियों के हवाले करने के लिए वनाधिकार कानून में संशोधन कराने की तैयारी कर रही है.

सरकार संसाधनों के संरक्षण से जुड़ी नीतियों को लागू करके नैतिक आधार पर माओवादियों को बातचीत के लिए मजबूर कर सकती है. मगर वह इस ओर कदम नहीं बढ़ा रही है. 

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सामाजिक कार्यकर्ता बेला भाटिया कहती हैं, "सरकार बस्तर के विकास के लिए बिजली, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य की बात तो करती है, लेकिन जल, जंगल और जमीन जो कि संघर्ष के केंद्रीय मुद्दे हैं, उन्हें आदिवासियों से छीनने पर उतारू है. सरकार संवाद के लिए माहौल तक बनाने को तैयार नहीं. एक दशक में बस्तर के भीतर अलगाव इस हद तक बढ़ गया है कि हमें समझ नहीं आ रहा हम बलात्कार के कितने प्रकरण उजागर करें."

3) तीसरे पक्षों पर सख्ती

कई विशेषज्ञों का कहना है कि कोलंबिया में 3-4 वर्षों के दौरान बिना बाधा कई दौर की बातचीत के लिए शांति के पक्षधर हर व्यक्ति, समूह, संस्था, देश और संयुक्त राष्ट्र संघ ने हस्तक्षेप किया. मगर बस्तर के मामले में देश के भीतर ही तीसरे किसी भी पक्ष दखलांदाजी सहन नहीं की जा रही है.

हर मुठभेड़ के बाद बस्तर संभाग के पुलिस महानिरीक्षक शिवराम प्रसाद कल्लूरी कहते हैं, 'हम ये लड़ाई जीत रहे हैं', लेकिन बस्तर के कई ग्रामीण उनके दावों को नकार रहे हैं. 

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हालत यह है कि सुरक्षाबलों और माओवादियों के आक्रामक रुख के कारण पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता तक बस्तर के जंगलों में नहीं घुस पा रहे हैं. 

आम आदमी पार्टी के प्रदेश संयोजक संकेत ठाकुर के मुताबिक, "सरकार माओवादी हिंसा को कानून व्यवस्था की समस्या से ऊपर उठकर देखना ही नहीं चाहती."

4) माओवादियों का असर सीमित

कोलंबिया के गोरिल्ला युद्ध ने पूरे देश की शासन व्यवस्था और काम-काज को ठप कर दिया था. वहां लड़ने और मरने वालों की संख्या बस्तर में माओवाद के मुकाबले कई गुना अधिक थी.

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक वहां आपसी संघर्ष में 2 लाख 60 हजार लोग मारे गए, 45 हजार लोग लापता हुए और लगभग 70 लाख लोग विस्थापित. मगर माओवादी दक्षिण छत्तीगसढ़ के कुछ जंगलों तक सीमित हैं. वे दिल्ली या रायपुर जैसे शहरों से चलने वाली शासन-व्यवस्था को प्रभावित नहीं कर सकते. 

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गांधीवादी कार्यकर्ता हिमांशु कुमार का मत है, 'सरकार यदि चंद अमीरों के लिए गरीबों की बड़ी आबादी के संसाधनों को छीन रही है तो इससे माओवाद की जमीन तैयार हो रही है और सरकार खुद ही उन्हें नैतिक चुनौती पैदा करने का मौका दे रही है.' 

हिमांशु बताते हैं कि माओवाद का असर बड़े शहरों की बजाय बस्तर के जंगलों तक सीमित है और सरकार जंगलों में खुद ही शासन चलाना नहीं चाहती. इसलिए समझौते को लेकर उसकी कोई दिलचस्पी नहीं है.

5) माओवाद और सरकार की राजनीति

माओवादी अपनी लड़ाई को मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था बदलने के लिए लड़ रहे हैं. छत्तीसगढ़ के पूर्व डीजीपी विश्वरंजन कहते हैं, "माओवादियों के दस्तावेज और बयानों पर ध्यान दीजिए. वे कहते हैं कि जब तक उनका देश के लोकतंत्र और संविधान में भरोसा स्थापति नहीं होगा, संवाद की स्थिति बन पाना मुश्किल है."

विश्वरंजन आगे कहते हैं, "माओवादी किसी एनजीओ या सामाजिक कार्यकर्ता के कहने पर तो आत्मसमर्पण करेंगे नहीं. वे तो अपने नेता गणपति की बात सुनेंगे. मगर गणपति के दिमाग में तो संविधान के ढांचे में रहकर बात करने की इच्छा है नहीं."

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दूसरी तरफ, 1998 में गृह-मंत्रालय ने 4 राज्यों को माओवाद से पीड़ित माना. अब कहा जा रहा है कि 16 राज्य माओवाद की चपेट में हैं. कुछ जानकारों की राय में राज्यों के भीतर माओवाद के नाम पर राहत राशि का लाभ उठाने की होड़ मची है.

वहीं, कई जगह अपनी जमीनों को बचाने के लिए सरकारों को नौजवानों का प्रतिरोध झेलना पड़ रहा है.  इसे रोकने के लिए सरकारों द्वारा कारर्पोरेट हित में आजकल हर जगह 'माओवाद' शब्द प्रचलन में लाया जा रहा है. 'माओवाद' शब्द को सरकार हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर रही है.

First published: 6 July 2016, 7:42 IST
 
शिरीष खरे @catch_hindi

विशेष संवाददाता, राजस्थान पत्रिका

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