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पुलिस कमिश्नर के रूप में बीएस बस्सी का फ्लॉप शो

सुहास मुंशी | Updated on: 19 February 2016, 8:39 IST
QUICK PILL
  • दिल्ली पुलिस कमिश्नर बीएस बस्सी के अनुसार पटियाला हाउस कोर्ट में पत्रकारों, छात्रों और टीचरों के संग मारपीट करने वाले वकील \'कचहरी के अधिकारी\' हैं.
  • बीएस बस्सी का कार्यकाल इस महीने समाप्त होने वाला है. उनका पूरा कार्यकाल गाहे-बगाहे विवादों में घिरा रहा. जाते जाते भी उन्होंने दिल्ली पुलिस का दामन दागदार किया. उनके आलोचक उनपर बीजेपी के लठैत के रूप में काम करने का आरोप लगा रहे हैं.

दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट के बाहर वकीलों ने छात्रों, टीचरों और पत्रकारों इत्यादि से मारपीट की. ये वकील तालिबानी स्टाइल में न वकील, न दलील, न अपील की शैली में खुद ही फैसला सुना देना चाहते थे. और उनका फैसला शायद ये था कि पीट-पीट कर मार डालो.

काले कोट पहनने वाले इन कथित देशभक्तों ने हर उस आदमी को मारा जो उनके विचारों में 'राष्ट्र-विरोधी' लग रहा था. भारतीय संविधान मे पुरुष और स्त्री को बराबरी का अधिकार मिला है शायद इसीलिए इन काले कोट वालों ने महिलाओं की भी पिटाई की.

जब ये काले कोट वाले 'आहत भावनाओं' के नाम पर लोगों की पिटाई कर रहे थे तो दर्जनों पुलिस वाले 'देशभक्ति के नंगे प्रदर्शन' को हाथ बांधे देख रहे थे. कुल मिलाकर राजधानी दिल्ली की एकक कचहरी के ठीक बाहर और कोर्ट के अंदर न्याय का पूरा जिम्मा भीड़ ने अपने हाथों में ले लिया और देश की तमा संवैधानिक संस्थाएं मुंह देखती रहीं.

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घटना से पहले भी कुछ वकीलों ने अदालत परिसर में लोगों के साथ मारपीट की थी. तब अदालत ने दिल्ली पुलिस को सुरक्षा व्यवस्था को लेकर ताकीद की थी. लेकिन ऐसा लगता है कि दिल्ली के पुलिस कमिश्नर बीएस बस्सी के कान पर भारत की सर्वोच्च अदालत के आदेश से भी जूं नहीं रेंगी.

जिन वकीलों ने कैमरे के सामने लोगों के संग मारपीट की और जिनकी तस्वीरें मीडिया में छप गईं उन्हें भी दिल्ली पुलिस नहीं पहचान सकी और उसने अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया.

कुछ वकीलों ने पटियाला कोर्ट के अंदर पत्रकारों और छात्रों के संग मारपीट की. पुलिस देखती रही

बीएस बस्सी से जब ये पूछा गया कि उनके पुलिस जवानों ने वकीलों को मारपीट से क्यों नहीं रोका तो वो बोले, "वकील कचहरी के अधिकारी होते हैं...उनके खिलाफ बलप्रयोग उचित नहीं होता."

'कचहरी के ये अधिकारी' बुधवार को काफी व्यस्त रहे. उन्होंने पत्रकारों, छात्रों और कुछ दूसरे वकीलों के संग मारपीट की. उन्होंने कोर्ट में पेशी के लिए गए जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार के संग भी मारपीट की.

ऐसा नहीं है कि बस्सी राज में दिल्ली पुलिस के जवान लाठी चलाना भूल गए हैं. महज चंद रोज पहले जब छात्र आरएसएस के दिल्ली मुख्यालय पर अहिंसक विरोध प्रदर्शन कर रहे थे तो पुलिस ने उन्हें दौड़ा दौड़ा कर पीटा.

लेकिन जब बस्सी के दफ्तर से करीब आधार किलोमीटर दूर 'कचहरी के अधिकारी' लोगों को मारते-पीटते रहे तो उन्हें उसमें रोकटोक करना उन्हें उचित नहीं लेगा.

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एक हमलावर ने दंभ के साथ कहा कि हमने पत्रकारों को दो दिन पीटा वो भी कैमरे के सामने और पुलिस एक भी आदमी को गिरफ्तार नहीं कर सकी. जब पत्रकारों को सोमवार को पीटा गया तो बस्सी ने कहा कि वो 'मामूली खरोंचे' हैं.

किसी भी पुलिस वाले का पत्रकारों या कन्हैया कुमार को बचाने के लिए आगे न आना क्या महज संयोग है? पटियाला हाउस अदालत में मौजूद हिंसक वकीलों की भीड़ को देखते हुए कन्हैया की सुरक्षा के लिए पुलिस के महज 10 जवान तैनात करना क्या बताती है?

इन हमलो के मुख्य सूत्रधार माने जा रहे विक्रम सिंह चौहान की बीजेपी नेताओं के साथ खिंचाई गई तस्वीरें मीडिया में प्रमुखता से छप चुकी हैं. सोमवार को पत्रकारों, छात्रों और टीचरों के संग मारपीट में शामिल चौहान पटियाला कोर्ट में डंडा लिए नजर आ रहे थे. वो अपने साथी वकीलों को "राष्ट्र-विरोधियों" पर हमले के लिए उकसा रहे थे.

कन्हैया कुमार पर हमले को उनके एक साथी ने यूं बयां किया, "हाथ जोड़कर खड़ा था साला. इतनी लात मारी की साले का पेशाब निकल गया...नहीं मानो तो दिखाऊं कहां उस कुत्ते ने पेशाब किया. हसे दया की भीख मांग रहा था जब लात घूंसे पड़ रहे थे उसे."

बस्सी जिस तरह की हरकतें कर रहे हैं उसे देखते हुए उनके आलोचक उन्हें बीजेपी का लठैत कहने लगे हैं

करीब 50 वकीलों ने कन्हैया की पिटाई की. उन्होंने उनके चेहरे और पेट पर लात-घूंसों की बारिश कर दी. मेरे समेत वहां मौजूद तमाम पत्रकारों ने अपनी आंखों से ये मंजर देखा.

सीनियर एडवोकेट राजीव धवन पांच सीनियर वकीलों की उस टीम में शामिल थे जिसे सुप्रीम कोर्ट ने पटियाला हाउस मे हुई हिंसा का आकलन करने के भेजा था. इस टीम ने सुप्रीम कोर्ट में जाकर बताया कि जब वो लोग पटियाला हाउस पहुंचे तो उन्हें भी गालियां दी गईं और उन्हें 'पाकिस्तानी' कहा गया.

अगले कुछ दिनों में बस्सी की दिल्ली के पुलिस कमिश्नर के रूप में सेवा समाप्त होने वाली है. उनकी जगह कौन लेगा इसकी भी घोषणा हो चुकी है. बस्सी के आलोचकों का कहना है कि रिटायरमेंट करीब होने के कारण ही बस्सी बीजेपी के लठैत की तरह काम कर रहे हैं. और शायद यही वजह है कि वो कन्हैया और पत्रकारों के संग हुई मारपीट को बड़े शायराना तबीयत के साथ 'मामूली झड़प' बताते हैं.

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ऐसे में पिछले कुछ समय से बस्सी जिस तरह की हरकतें कर रहे हैं उसे देखते हुए उनके आलोचक उन्हें बीजेपी का लठैत कहने लगे हैं.

जब मीडिया में इस तरह की खबरें आईं कि जेएनयू के विवादति वीडियो में नारा लगाने वाले एबीवीपी के कार्यकर्ता था तो बस्सी ने चट-पट उन्हें क्लीन-चिट दे दी. जाहिर है वो फैसला करने में उनकी तेजी का मुकाबला केवल चौहान जैसे वकील ही कर सकते हैं.

ये कहना अतिश्योक्त नहीं होगी कि दिल्ली के पुलिस कमिश्नर ने जाते जाते दिल्ली पुलिस के 70 हज़ार जवानों की साख पर बट्टा लगा दिया. बस्सी अभी तक जिन वीडियो सबूतो की बात करते रहे हैं उन्हें खुद आईबी खारिज कर चुकी है.

कन्हैया की गिरफ्तारी के इतने दिनों बाद भी पुलिस को उसके खिलाफ अब तक कुछ नहीं मिला. और नतीजा ये है कि बस्सी के दिल में कन्हैया के लिए दया उमड़ आयी और वो बोले, 'निजी तौर पर मुझे लगता है कि कन्हैया जैसे नौजवान को....शायद जमानत दे देनी चाहिए.'

पिछले कुछ सालों में बस्सी ने कई मौकों पर दिल्ली पुलिस को जनता की नजरों में शर्मसार किया और जाते जाते भी वो ये करना नहीं भूले. वो सकता है कि उनकी इस 'सेवा' का फल उन्हें मिल जाए लेकिन जनता क्या करे जब बाड़ ही खेत चरने लगे. आखिर उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी तो बस्सी के सिर पर थी.   

First published: 19 February 2016, 8:39 IST
 
सुहास मुंशी @suhasmunshi

He hasn't been to journalism school, as evident by his refusal to end articles with 'ENDS' or 'EOM'. Principal correspondent at Catch, Suhas studied engineering and wrote code for a living before moving to writing mystery-shrouded-pall-of-gloom crime stories. On being accepted as an intern at Livemint in 2010, he etched PRESS onto his scooter. Some more bylines followed in Hindustan Times, Times of India and Mail Today.

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