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एनएसजी में भारत के प्रवेश की राह का रोड़ा बना चीन

शीलकांत शर्मा | Updated on: 27 May 2016, 12:50 IST
(कैच न्यूज)

परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह में भारत की सदस्यता के लिये एनपीटी पर दस्तखत की शर्त रखकर चीन ने भारत समेत सबको चौंका दिया है. शर्त के रूप में एनपीटी पर दस्तखत की बात दरअसल चीन के अड़ियल रुख का इशारा है. चीन की यह कोशिश भारत कोे एनएसजी का हिस्सा बनने से रोकने का उसकी तमाम कोशिशों का एक और हिस्सा है. क्या चीन के भारत विरोध की जड़ें जियोपाॅलिटिकल हैं?

भारत पहले से ही परमाणु अप्रसार को लेकर एनएसजी के उद्देश्यों का पालन करता आ रहा है और वैश्विक निर्यात नियंत्रण मानकों, परमाणु अप्रसार लक्ष्यों और परमाणु निरस्त्रीकरण से संबंधित उसकी नीतियों पर हमेशा से खरा उतरता आया है. एनएसजी ने भारत के साफ रिकार्ड, प्रतिबद्धता और जिम्मेदार व्यवहार के मद्देनजर ही उसे 2008 में छूट प्रदान की थी.

इस छूट को मिले हुए करीब एक दशक होने जा रहे हैं. भारत ने तबसे आज तक ऐसा कुछ भी नहीं किया है जो उसके एनएसजी में प्रवेश के खिलाफ हों. देश की बढ़ती ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये यह जरूरी है कि भारत को एनएसजी में प्रवेश मिले.

अमरीका बिल्कुल स्पष्ट शब्दोंं में भारत के एनएसजी में शामिल होने की हिमायत करता रहा है

2011 में अमेरिका ने ‘‘फूड फाॅर थाॅट’’ नामक शोधपत्र में इस बात पर जोर दिया था के दिशानिर्देशों का पालन करना बहुत जरूरी है लेकिन एनएसजी में प्रवेश के लिए एनपीटी पर दस्तखत की अनिवार्यता नहीं है. अमेरिका के मुताबिक यह तमाम अन्य कारकों पर निर्भर है.

ये वे कारक हैं जो किसी भी देश के वैश्विक परमाणु अप्रसार के लक्ष्यों को हासिल करने में मदद करते हैं. इसके बाद से अमरीका बिल्कुल स्पष्ट शब्दोंं में भारत के एनएसजी में शामिल होने की हिमायत करता रहा है.

चीन और एनएसजी

एनएसजी के साथ चीन का जुड़ाव अपेक्षाकृत नया है. वह न तो एनएसजी का संस्थापक था और न ही उसके विकास के क्रम का हिस्सेदार रहा. इन सब वजहों के चलते चीन लंबे समय तक एनपीटी का हिस्सा ही नहीं रहा. उसने 1980 के दशक के मध्य में नपे-तुले कदमों के साथ एनपीटी की तरफ रुख करना तब शुरू किया जब उसे अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये परमाणु प्रौद्योगिकी को आयात करने की जरूरत आन पड़ी.

चीन ने 1988 में बहुत झिझक के साथ आईएईए के साथ समझौता किया था. यह समझौता सेफगार्डस एग्रीमेंट के तहत हुआ था जिसमें परमाणु हथियार संपन्न पी5 समूह के देश शामिल थे. चीन ने इसे स्वैच्छिक पेशकश के रूप में अपनाया गया था. हालांकि पी5 समूह के दूसरे देशो के उलट चीन के समझौते में एनपीटी का कोई उल्लेख नहीं है.

1992 में चीन का एनपीटी में शामिल होना भी उसकी सुविधा का मसला था. चाहे जो भी हो, आईएईए के साथ 1998 में चीन द्वारा किया गया समझौता जो उसके 1988 के सेफगार्डस एग्रीमेंट का ही एक अतिरिक्त प्रोटोकाॅल था में भी एनपीटी का कोई जिक्र या चीन की प्रतिबद्धता का कोई जिक्र नहीं है.

इसके नतीजे में एनपीटी के संदर्भ में आईएईए के साथ चीन की कोई कानूनी प्रतिबद्धता नहीं बनती है जबकि दूसरी तरफ पी5 की संधि में इसका स्पष्ट उल्लेख है.

संधि को स्वीकार करते हुए चीन ने साफ किया कि परमाणु हथियार से संपन्न देश होने के चलते वह किसी भी प्रकार के निगरानी के दायित्व से मुक्त रहेगा. विलय के समय ही चीन ने हथियारों की दौड़ और परमाणु निरस्त्रीकरण से संबंधित अनुच्छेद 6 को नजरअंदाज कर दिया.

इसके अलावा पी5 देशों की तुलना में 2010 की एनपीटी रिव्यू कांफ्रेंस से बहुत उम्मीदें थीं

इस बयान ने संधि की कानूनी प्रतिबद्धताओं को बयानबाजियों में सीमित कर दिया. यहां गौर करने वाली बात यह है कि उस समय दिसंबर 1991 में चीन ने औरपचारिक रूप से इस बात की घोषणा की थी कि वह चाहता है कि पहले सबसे बड़े परमाणु हथियारों से लैस देश अपने संसाधनों में कटौती करें.

निरस्त्रीकरण उस समय व्यापक स्तर पर स्वीकार्य था और दुनिया में इसे लेकर आशाएं भी थीं क्योंकि 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद वाशिंगटन और माॅस्को के बीच तनातनी समाप्ति की ओर थी. 

बीती चौथाई सदी में अमरीका और रूस ने अपने हजारों हथियारों के जखीरे में भारी कटौती करते हुए उसे 1500 तक ले आए लेकिन अभी भी यह संख्या इतनी कम नहीं थी कि चीन के लिये रास्ते खुल सकें. अगर फ्रांस और ब्रिटेन के हथियारों के जखीरे के संबंध में बात करें तो पश्चिमी आंकलन के अनुसार बीते एक दशक में ही पाकिस्तान उन्हें पीछे छोड़ने के मुहाने पर खड़ा है.

इसके अलावा पी5 देशों की तुलना में 2010 की एनपीटी रिव्यू कांफ्रेंस से बहुत उम्मीदें थीं. हालांकि परमाणु अप्रसार के इतिहास में चीन का कोई रिकार्ड नहीं मिलता है. इस वजह से इन टिप्पणियों को खारिज करना काफी मुश्किल है कि वैश्विक व्यस्था में चीन का रास्ता विरोध मुक्त रहा है.

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने जब कभी उत्तर कोरिया द्वारा अंतरराष्ट्रीय समुदाय की अवहेलना करते हुए परमाणु परीक्षण की ओर कदम बढ़ाया तब चीन का रुख कैसा था? उसने अमेरिका और 6 अन्य पक्षकारों को उत्तर कोरिया के साथ वार्ता करने की सलाह दी. एक तरह से उसने उत्तर कोरिया के इस परीक्षण के लिये जापान, दक्षिण कोरिया और अमरीका को जिम्मेदार करार देने का काम किया.

हाल ही में चीन के रुख को लेकर कुछ सुगबुगाहट सुनने को मिल रही है. वैश्विक स्तर पर ईरान के साथ हुई डील को लेकर जो राय बनी है वह उत्तर कोरिया के जनवरी 2016 के ‘‘हाइड्रोजन बम’’ और उसके बाद किये गए मिसाइल परीक्षणों के विपरीत है.

एनपीटी में चीन के रिकाॅर्ड को लेकर हुआ यह हमला पूरी तरह से कागजों पर आधारित है. लेकिन चीन के पाकिस्तान के साथ परमाणु सहयोग को अब भी नजरअंदाज किया जा रहा है क्योंकि शायद उसके ही फायदे के लिये बीजिंग ने अब एनएसजी में भारत के प्रवेश में अड़ंगा लगाया है.

चीन का एनएसजी को लेकर तीखा रवैया शायद इसलिए है क्योंंकि उसने एनएसजी को शायद ही इसी रूप में देखा है

चीन ने आखिरी बार जून 1998 में भारत द्वारा किये गए परमाणु परीक्षण के बाद अमरीका के साथ मिलकर भारत के लिये एनपीटी की मांग को उठाया था. उस समय चीन ने भारत को परमाणु परीक्षणों को लेकर ‘‘मुख्यधारा’’ के वैश्विक मापदंडों का उपदश दिया था. 

यह वे नियम थे जिन्हें 1996 में व्यापक परीक्षण प्रतिबंध संधि को अंतिम रूप देने से पहले ही तैयार किया गया था.

आज की स्थिति में न सिर्फ भारत और अमरीका के बीच बल्कि चीन और भारत के बीच भी बहुत अच्छे राजनयिक संबंध देखे जा सकते हैं. इसके बाद भारत और चीन के बीच काफी पानी बह चुका है और दोनों ही देश आपस में सालाना 75 बिलियन डाॅलर का जबर्दस्त व्यापार होने के अलावा दोनों देशों के नेता एक-दूसरे की यात्राएं भी कर रहे हैं और उच्चतम स्तर पर द्विपक्षीय वार्ताओं का दौर भी जारी है.

चीन का एनएसजी को लेकर तीखा रवैया शायद इसलिए है क्योंंकि उसने एनएसजी को शायद ही इसी रूप में देखा है जो कि दूसरे देश नहीं करते. जबकि अमरीका, फ्रांस, यूके और यहां तक कि जमर्नी, कनाडा, आॅस्ट्रेलिया और जापान जैसे देश एनएसजी को पूरा महत्व देते हैं और भारत के प्रवेश के पक्ष में हैं.

परमाणु सहयोग पर भारत-अमरीका समझौता होने से पहले ही अमरीकी कांग्रेस द्वारा भारत के पक्ष में एनएसजी को लेकर छूट प्रदान करना इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. जबकि दूसरी तरफ चीन को एनएसजी का सदस्य बनने से पहले ग्रैंडफादर क्लाॅज के अंतर्गत चश्मा 3 और 4 को पाकिस्तान के हवाले करने के बारे में स्पष्टीकरण देना पड़ा था.

बहरहाल इसके एक दशक बाद इसने इसका उल्लंघन करते हुए पाकिस्तान को कई परमाणु रिएक्टरों की आपूर्ति की और इस बारे में एनएसजी को सूचित करना भी जरूरी नहीं समझा. ऐसे में चीन का एनएसजी में भारत के प्रवेशका विरोध करना उसके दोहरे रवैये को ही दर्शाता है.

First published: 27 May 2016, 12:50 IST
 
शीलकांत शर्मा @catchhindi

लेखक राजनयिक हैं और वियना स्थिति संयुक्त राष्ट्र कार्यालय और आईएईए में भारत के स्थायी प्रतिनिधि हैं.

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