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जानिए क्यों एनएसजी में चीन ने किया भारत का विरोध

पिनाकी भट्टाचार्य | Updated on: 1 July 2016, 7:57 IST
(कैच न्यूज)

एनएसजी में भारत के शामिल होने की कोशिश असफल होने के बाद इसका इतना विश्लेषण किया गया है कि अखबारी कागज की कई रील खर्च हो गईं. लेकिन इनमें से अधिकांश विश्लेषण भू-राजनीति के दायरे में थे. स्पष्ट रूप से इसका दायरा इसे साफ परमाणु ऊर्जा की आड़ में पाकिस्तान और भारत को अलग-थलग करने की चीन की साजिशों पर केंद्रित था. लेकिन क्या वास्तव में दूर-दृष्टि रखने वाले चीनी योजनाकार उप महाद्वीपीय राजनीति के मुद्दे पर भ्रमित हैं?

नहीं. जानकारों का एक वर्ग मानता है कि विशिष्ट क्लब में भारत का प्रवेश अवरुद्ध करने के पीछे चीनी जिद, जिसे पूरी दुनिया ने देखा, का 'असली' कारण उससे अधिक गहरा है. इस मामले में तर्क है परमाणु व्यापार-प्रतिस्पर्धा में बढ़त बनाए रखने के लिए उसने ऐसा किया. अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के महानिदेशक द्वारा वर्ष 2010 की आम परिषद की बैठक में एजेंसी के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के सामने पेश की गई रिपोर्ट हमें बताती है कि 2008 में जिन 22 परमाणु रिएक्टरों का निर्माण शुरू हुआ, वे सारे सिर्फ तीन देशों में थे: चीन, दक्षिण कोरिया और रूस में.

दिलचस्प है कि आईएईए के डीजी की इसी रिपोर्ट से एक अविश्वसनीय या बार-बार दोहराया जाने वाला गलत तथ्य सामने आता है, जिसमें कहा गया है कि 2010 ही वह साल है जब चीन ने अपना पहला फास्ट ब्रीडर रिएक्टर बनाया था. नई दिल्ली में बैठे विशेषज्ञों का यह छोटा सा समूह इस तथ्य को रेखांकित करता है कि भारतीय फास्ट ब्रीडर टेस्ट रिएक्टर (एफबीटीआर) 1985 में ही खतरे में पहुंच चुका था.

पाकिस्तान से दोस्ती नहीं बल्कि परमाणु व्यापार-स्पर्धा में बढ़त बनाए रखने के लिए चीन ने एनएसजी में टांग अड़ाई

और दुनिया में केवल भारत और रूस ही ऐसे देश हैं जो एफबीआर के वाणिज्यिक उत्पादन शुरू करने की योजना बना रहे हैं. देश के शीर्ष परमाणु विशेषज्ञों में से एक भारत में संवेदनशील सामग्री निर्यात नियंत्रण कार्यक्रमों के बारे में कहते हैं, "एनएसजी में हमारी सदस्यता के प्राथमिक कारण पश्चिम के परमाणु ऊर्जा आपूर्तिकर्ताओं से प्रेरित हैं. लेकिन चूंकि भारत को एनएसजी से पश्चिम द्वारा प्रायोजित फुल स्कोप सेफगार्ड (एफएसएस) से छूट मिली हुई है, इसलिए नई दिल्ली द्वारा जनित परमाणु वाणिज्य भारत को आपूर्ति के लिए नहीं है. यह वास्तव में भारत में निर्मित परमाणु गुणवत्ता को अपनी वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में जोड़कर उपयोग करने से प्रेरित है."

भारत में निर्मित इस परमाणु सामग्री की कीमतों पर गहरी प्रतिस्पर्धा है. चीन दूसरा ऐसा गंतव्य है जहां कीमतें वास्तव में कम हैं, लेकिन उनके कार्यक्रम के साथ दो प्रमुख समस्याओं ने भारत के इसमें आगे कर दिया. ये समस्याएं हैं: नियंत्रित विखंडन के लिए मुश्किल परमाणु ईंधन चक्र पर चीनी क्षमताएं संदिग्ध हैं, और उनकी रिएक्टर इंजीनियरिंग को अपेक्षाकृत घटिया पाया गया है.

अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के महानिदेशक द्वारा वर्ष 2010 में जनरल काउंसिल को दी गई रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि 2020-2050 के बीच उत्पादन के लिए बड़े पैमाने पर वाणिज्यिक फास्ट ब्रीडर रिएक्टरों को तैयार किया जा रहा है और यह भारत, रूस, दक्षिण कोरिया और जापान में किया जा रहा है.

भारतीय विशेषज्ञों का यह समूह बताता है कि परमाणु ऊर्जा विकास के तीन चरण (यूरेनियम 235, प्लूटोनियम 244 और थोरियम 232) वाली योजना में से अंतिम दो के प्रसंस्करण में चीन कमजोर है. दूसरी ओर, प्लूटोनियम आइसोटोप पर भारत को पूरी तरह से महारत हासिल है और यूरेनियम प्रसंस्करण भी काफी बेहतर है.

भारत की तकनीकी समृद्धि अब भारत-अमेरिका सिविल न्यूक्लियर समझौते के रूप में सामने आ रही है

परमाणु ऊर्जा की कीमतों का मामला संवेदनशील होने के कारण, कम लागत वाले प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टरों और भारी पानी के दबाव वाले रिएक्टरों से प्रति गीगावाट बिजली उत्पन्न करने की प्रभावी लागत नीचे आ जाती है. भारत मिश्रित ऑक्साइड ईंधन पर भी काम कर रहा है. मिश्रित ऑक्साइड ईंधन 5 प्रतिशत पुनर्नवीनीकरण प्लूटोनियम को क्षीण यूरेनियम 235 के साथ मिलाकर ऑक्सीकरण की प्रक्रिया से बनाया जाता है.

वर्ल्ड न्यूक्लियर एसोसिएशन के समाचार पत्र का निष्कर्ष है कि, "वह देश (चीन) अभी भी ईंधन चक्र के सभी चरणों (निर्माण और पुनर्प्रसंस्करण के माध्यम से यूरेनियम खनन) के लिए कुछ हद तक विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भर है, लेकिन ज्यादातर यूरेनियम आपूर्ति के लिए वह विदेशियों पर निर्भर है."

यह स्थिति हमें बताती है कि दूसरों पर आश्रित चीन कभी नहीं चाहेगा कि भारत एनएसजी का सदस्य बने. सिर्फ प्रौद्योगिकी आपूर्ति करने वाले एक देश के रूप में ही नहीं, बल्कि वैश्विक परमाणु आपूर्ति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनने के लिए भी चीन कभी भारत को सदस्य नहीं बनने देना चाहेगा.

भारत के अनुसंधान और तकनीकी समृद्धि अब जाकर भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु ऊर्जा समझौते के परिणाम के रूप में सामने आ रही है, जो यह अनिवार्य करता है कि हमारा देश अपने काम के महत्वपूर्ण भागों को दुनिया के सामने आधिकारिक रूप से पेश करे. इससे पहले, परमाणु अनुसंधान एवं विकास कार्य पुख्ता और गोपनीय बने रहते थे.

वास्तव में एक महत्वपूर्ण परमाणु अप्रसार विशेषज्ञ के रूप में जॉर्ज परकोविच ने कहा था, 'भारतीय परमाणु कार्यक्रम के रहस्यों को एक निश्चित क्षेत्र से संबंधित वैज्ञानिकों के एक छोटे से समुदाय द्वारा गुप्त रखा गया था और उनमें से ज्यादातर एक ही गुट के थे.'

First published: 1 July 2016, 7:57 IST
 
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