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इसलिए कांग्रेस को वाममोर्चे के साथ गठबंधन से बचना चाहिए!

आदित्य मेनन | Updated on: 21 January 2016, 23:11 IST
QUICK PILL
  • मार्क्सवादी नेता और पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने कहा है कि टीएमसी को सत्ता से बेदखल करने के लिए कांग्रेस को वामपंथी दलों के साथ आना चाहिए.
  • कांग्रेस यदि वामपंथी दलों के साथ हाथ मिलाने को राजी होती है तो यह अपने \r\nपांवों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा होगा और अपने दुर्ग में अपने दुश्मन को \r\nपनाह देने के समान होगा.

पश्चिम बंगाल में ममता राज पर विराम लगाने के लिए वामपंथी दलों ने नई संभानाएं तलाशना शुरू कर दिया है. वामपंथी दलों की पुरानी मित्र कांग्रेस का मकसद भी कुछ ऐसा ही है. ऐसे में दोनों दल निकट भविष्य में गठबंधन बना लें तो आश्चर्य नहीं होगा.

दोनों राजनीतिक दलों के कई नेता और समर्थक भी इस गठबंधन के समर्थन में हैं. कुछ नेताओं ने कहना भी शुरू कर दिया है कि यूपीए-एक जैसे सुनहरे दिनों में लौटने के लिए यह गठबंधन जरूरी है. तब वामपंथी दल केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार को बाहर समर्थन दे रहे थे.

इस दिशा में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की ओर से पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने पहल की है. उन्होंने कांग्रेस को गठबंधन का खुला न्यौता देते हुए अपील की है कि तृणमूल कांग्रेस को सत्ता से बाहर करने के लिए कांग्रेस को उनसे हाथ मिला लेना चाहिए. उन्होंने गठबंधन के लिए हाथ बढ़ाते हुए पिछले हफ्ते कांग्रेस से पूछा था: “इस जंग में आप किस ओर हैं?”

क्या कहते हैं आंकड़े?

वाम-कांग्रेस के बीच गठबंधन की शुरुआत पिछले साल अप्रैल में ही हो गई थी जब वामपंथी दलों ने सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस को मात देकर सिलीगुड़ी नगर निगम का चुनाव जीता था. इस चुनाव में कांग्रेस ने वामपंथी दलों का साथ दिया था, हालांकि वह साथ अपरोक्ष तरीके से दिया गया था. इसके छह महीने बाद अक्टूबर में फिर वही कहानी तब दोहराई गई, जब सिलीगुड़ी महाकुमा परिषद के चुनाव हुए. इस चुनाव में भी वामपंथी दलों ने (कांग्रेस की मदद से) विजय पताका फहराई.

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लेकिन इस तस्वीर का दूसरा पहलू भी है. बुद्धदेव भट्टाचार्य की अपील, यूपीए-एक के दौर की सुनहरी यादें और सिलीगुड़ी मॉडल में वामपंथी दलों की जीत के बावजूद यदि कांग्रेस वहां माकपा के साथ हाथ मिलाती है, तो उसके पास पाने को बहुत कुछ नहीं होगा. आंकड़े और जमीनी सच्चाई पर नजर दौड़ाएं तो नतीजा निकलता है कि गठबंधन का फायदा वाममोर्चे को होगा.

यदि 2014 के लोकसभा चुनावों के आंकड़ों पर नजर डालें तो तीन रोचक बातें सामने आती हैं

1. यदि बंगाल में वामपंथी दल और कांग्रेस हाथ मिला भी लें तो वे इतने ताकतवर नहीं हो पाएंगे कि आसानी से ममता को हरा दें.

2. पश्चिमी बंगाल में कांग्रेस की असली विरोधी ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस नहीं है, बल्कि वामपंथी दल हैं.

3. यदि भट्टाचार्य की अपील पर आगे बढ़कर कांग्रेस माकपा के साथ हाथ मिला भी लेती है तो कांग्रेस को कोई लाभ नहीं मिलने वाला.

इसी कारण इस गठबंधन को लेकर कांग्रेसी खेमे में कोई विशेष उत्साह नजर नहीं आ रहा.

2014 की तस्वीर

कुल सीटें: 42

तृणमूल कांग्रेस: 34 सीटें (वोटों में हिस्सेदारी 39.30%)

वामपंथी दल: 2 सीटें (वोटों में हिस्सेदारी 22.70%)

भारतीय जनता पार्टी: 2 सीटें (वोटों में हिस्सेदारी 16.80%)

कांग्रेस: 4 सीटें (वोटों में हिस्सेदारी 9.80%)

यदि 2014 के लोकसभा चुनाव में मिली सीटों पर नजर डाली जाए तो यह साफ दिखता है कि तृणमूल कांग्रेस ही दोबारा से धमाकेदार जीत की ओर बढ़ रही है. अन्य सभी दल मिलाकर भी उसका मुकाबला करते नजर नहीं आते.

विधानसभा में वर्तमान स्थिति

कुल सीटें: 294

तृणमूल कांग्रेस: 216 सीटें

वामपंथी दल: 28 सीटें

भाजपा: 22 सीटें

कांग्रेस: 28 सीटें

2014 के लोकसभा चुनावों के आधार पर यदि कांग्रेस और वामपंथी दलों का गठबंधन मान कर आकलन करें तो विधानसभा चुनाव में इनकी जीत का आंकड़ा 41 सीटों तक पहुंच सकता है. लेकिन यदि दोनों दलों को एक-दूसरे के शत-प्रतिशत वोट मिल जाएं तो आंकड़े कुछ इस तरह नजर आएंगे:

कुल सीटें: 294

तृणमूल कांग्रेस: 181 सीटें

वामपंथी दल + कांग्रेस: 97सीटें

भाजपा: 16 सीटें

इन आंकड़ाें से फिर वही बात सामने आती है कि यदि कांग्रेस और वामपंथी दल हाथ मिला भी लेते हैं तब भी तृणमूल कांग्रेस आसानी से बहुमत के आंकड़े को पार कर लेगी.

तो फिर इस गठबंधन की कवायद क्यों?

राजनीतिक परिदृश्य देखकर साफ नजर आ रहा है कि बंगाल चुनाव को लेकर निराशा का भाव कांग्रेस की बजाय वामपंथी दलों में अधिक है. हो भी क्याें ना, 22.60 प्रतिशत वोट होने के बावजूद वामपंथी दल मात्र 28 विधानसभा सीटों पर जीत हासिल कर पाए हैं.

वामपंथी दलों के लिए यह गठबंधन सिर्फ प्रदेश स्तर पर ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि उनके लिए इसका राष्ट्रीय स्तर पर महत्व है. यदि वामपंथी दल कांग्रेस के साथ गठबंधन बनाने में सफल हो जाते हैं तो यह राष्ट्रीय राजनीति में उसका अकेलापन खत्म कर देगा. माकपा को पता भी है, इसके लिए यही एक रास्ता है.

वामपंथी दल ही मुख्य विपक्षी दल हैं कांग्रेस के लिए

पश्चिम बंगाल में कांग्रेस से जुड़ा एक अनूठा ट्रेंड है. 2014 के लोकसभा चुनाव में भले ही कांग्रेस के वोटों का प्रतिशत सबसे कम था, लेकिन फिर भी उसने वामपंथी दलों और भाजपा से अधिक सीटें जीतने में कामयाबी हासिल की थी.

इसका कारण यह है कि कांग्रेस का वोट बैंक कुछेक जिलों में सीमित है और कांग्रेस के लिए अच्छी बात यह है कि उसका वोट बैंक पक्का है. कांग्रेस प्रमुख रूप से उत्तर दिनाजपुर, मालदा, मुर्शीदाबाद और पुरूलिया के कुछ हिस्सों में मजबूत स्थिति में है.

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कुछ टुकड़ों को छोड़ दिया जाए तो राज्य के अन्य हिस्सों में कांग्रेस हाशिए पर है और उसकी उपस्थिति नाममात्र ही है.

पिछले लोकसभा चुनाव के आंकड़ों के हिसाब से देखें तो कांग्रेस सिर्फ 44 विधानसभा सीटों पर दूसरे नंबर पर रही थी. राज्य की अन्य 250 सीटों पर कांग्रेस की वोटों में हिस्सेदारी 10 प्रतिशत से भी कम थी.

जिन 44 सीटों पर कांग्रेस दूसरे नंबर पर रही थी, उनमें से 29 पर उसका सीधा मुकाबला वामपंथी दलों से था. इस चुनाव में मात्र 10 सीटाें पर उसका मुकाबका तृणमूल कांग्रेस से था और भाजपा ने तो और भी कम मात्र 5 सीटों पर उसे टक्कर दी थी.

लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के वोटों का प्रतिशत सबसे कम था, लेकिन उसने वामपंथी दलों से ज्यादा सीटें जीती

2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने छह सीटों पर जीत पाई थी, जिनमें रायगंज, मालदा उत्तर, मालदा दक्षिण, जंगीपुर, मुर्शीदाबाद और बहरामपुर शामिल थे. लेकिन इनमें से दो सीटें वह 2014 के चुनाव में गंवा बैठी. ये दोनों सीटें थीं रायगंज और मुर्शीदाबाद. ये दोनों सीटें माकपा ने उससे छीनी है. हैरानी की बात है कि पूरे राज्य में मात्र यही वे दो सीटें थीं, जिन पर वामपंथी दल जीत हासिल कर पाए थे, और दोनों कांग्रेस से.

कांग्रेस यदि वामपंथी दलों के साथ हाथ मिलाने को राजी होती है तो यह अपने पांवों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा होगा और अपने दुर्ग में अपने दुश्मन को पनाह देने के समान होगा.

कांग्रेस में अंदरूनी कलह

मजेदार बात यह है कि कांग्रेस का दुर्ग माना जाने वाला बहरामपुर ही एकमात्र ऐसी सीट है जिस पर इसका मुकाबला तृणमूल कांग्रेस से है. यह इलाका पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी का अजेय दुर्ग माना जाता है. चौधरी वहां से चार बार से सांसद हैं.

बहरामपुर लोकसभा क्षेत्र की सात विधानसभा सीटों में से पांच पर कांग्रेस का मुकाबला तृणमूल कांग्रेस से रहता है और बाकी दो सीटों पर वामपंथी दलों से. शायद यह भी एक कारण है कि चौधरी वामपंथी दलों के साथ गठबंधन के पक्षधर बन गए हैं क्योंकि उनके इलाके में वामदलों का खास वजूद नहीं है.

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हालांकि 2012 से तृणमूल कांग्रेस लगातार उनके क्षेत्र में अपनी राह बनाती जा रही है. स्पष्ट है कि चौधरी इसे अगले लोकसभा चुनाव के लिए चुनौती के तौर पर देख रहे हैं. इसी कारण पार्टी को महागठबंधन के लिए मनाने में लगे हुए हैं. एक तरफ चौधरी अपने विरोधियों को मात देने के लिए कांग्रेस और वामपंथी दलों के साथ गठबंधन की बात कर रहे हैं तो दूसरी तरफ पार्टी के अन्य नेता गठबंधन का विरोध कर रहे हैं.

उदाहरण के तौर पर मालदा उत्तर सीट से सांसद मौसम नूर और मालदा दक्षिण से सांसद अबू हसीम खान चौधरी का सीधा मुकाबला वामपंथी दलों के प्रत्याशियों के साथ होता है. ऐसे में यदि उनकी पार्टी वामपंथी दलों के साथ गठबंधन कर लेती है तो उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती अपने समर्थकों को संतुष्ट करना होगा कि उन्होंने विरोधियों के साथ हाथ क्यों मिला लिया?

बंगाल के कुछ हिस्सों को छोड़ दिया जाए तो अन्य हिस्सों में कांग्रेस हाशिए पर है और उसकी उपस्थिति नाममात्र ही है

कुछ ऐसा ही हाल पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस कमेटी के पूर्व अध्यक्ष मानस रंजन भुनिया का है. भुनिया वर्तमान में पश्चिम मेदिनीपुर जिले के सबंग से विधायक हैं. भुनिया की हालत भी काफी कुछ मालदा के गनी परिवार जैसी ही है. वे जब पहली बार 1982 में चुनाव जीते थे, तभी से उनकी टक्कर हमेशा वामपंथी दलों के साथ ही रही है. उनके लिए भी गठबंधन हजम करना मुश्किल होगा.

डील होगी या नहीं?

अब तक तृणमूल काडर के सबसे ज्यादा हमले सीधे उन कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने झेले हैं जो जमीन से जुड़े रहकर पार्टी के लिए काम करते हैं. वे महसूस करते हैं कि तृणमूल की दादागिरी रोकने के लिए कांग्रेस को वामपंथी दलों से हाथ मिलाना ही होगा. विशेषकर दक्षिणी बंगाल में यह सच्चाई और गहरा जाती है जहां कांग्रेस की उपस्थिति नाममात्र है और तृणमूल कांग्रेस बहुत ताकतवर है.

लेकिन केवल इस तर्क के सहारे गठबंधन को उचित नहीं ठहराया जा सकता. इसकी बजाय कांग्रेस, तृणमूल के साथ कोई छुपा हुआ समझौता कर सकती है जिसके तहत वो उन 44 सीटों पर अपने प्रदर्शन को सुधार कर अपनी स्थिति को मजबूत कर सकती है जिनपर वो पिछले चुनाव में दूसरे स्थान पर रही थी.

हो सकता है पश्चिमी बंगाल की विधानसभा में यह दूसरी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभर कर सामने आ जाए!

First published: 21 January 2016, 23:11 IST
 
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