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उत्तर प्रदेश: गठबंधन की यह बेकरारी कांग्रेस में क्यों है?

पाणिनि आनंद | Updated on: 24 June 2016, 14:04 IST

वे दोनों क्षेत्रीय पार्टियों, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के साथ संपर्क में हैं. उत्तर प्रदेश में कांग्रेस पार्टी भाजपा के खिलाफ धर्मनिरपेक्ष गठबंधन बनाने की कोशिश कर रही है, बिल्कुल उसी तर्ज पर जैसा उसने पिछले साल विधानसभा चुनाव में बिहार में महागठबंधन का प्रयाेग किया था.

कांग्रेस पार्टी यह अच्छी तरह से जानती है कि राज्य में उसके लिए सत्ता में आना लगभग असंभव है. फिर भी, वह उत्तर प्रदेश में बिहार की जीत को दोहराने की इच्छुक है. उसके लिए 2017 के चुनाव जीतना महत्वपूर्ण भी है, क्योंकि 2019 में मोदी को रोकने के लिए 2017 के चुनाव की बड़ी बूमिका होगी.

क्षेत्रीय दलों के बिना चुनाव में उतरने का फार्मूला भाजपा पर विजय प्राप्त करने के प्रयासों में कांग्रेस के लिए अप्रभावी साबित होगा. वे पिछले 7-8 महीनों से राज्य में गठबंधन करने की कोशिश में लगे हैं.

पहला प्रयास पिछले वर्ष दिवाली के त्योहार पर किया गया था जब अहमद पटेल ने बसपा नेता सतीश चंद्र मिश्रा के साथ बैठकें की थीं. फिर, इस बारे में कोई अंतिम निर्णय नहीं हो पाया था और वार्ता पटरी से उतर गई थी, क्योंकि सीटों के बंटवारे पर कोई आम सहमति नहीं बन पाई थी.

बसपा 300 सीटों से कम पर चुनाव लड़ने को तैयार नहीं थी और बाकी की 103 सीटें कांग्रेस और अन्य संभावित सहयोगी दलों के लिए छोड़ना चाहती थी.

अगर यह गठबंधन हो जाता है और कांग्रेस चुनाव जीत जाती हैं तो प्रमोद तिवारी महत्वपूर्ण व्यक्ति बन जाएंगे

ताजा घटनाक्रम यह है कि कांग्रेस गठबंधन के लिए समाजवादी पार्टी को भी साथ लाने की कोशिश कर रही है. सूत्रों के अनुसार राज्य के कांग्रेस सांसद प्रमोद तिवारी समाजवादी पार्टी के साथ बातचीत कर रहे हैं. पूरा गणित सपा के 20% आधार वोट बैंक, कांग्रेस के 12% वोट बैंक और दूसरों के 2-3 प्रतिशत वोट बैंक के इर्द-गिर्द घूम रहा है.

असल में, प्रमोद तिवारी इस गठबंधन के प्रयास को ब्राह्मण, यादव, मुस्लिम और जाट वोट बैंक को एक साथ लाने की कवायद के रूप में देखते हैं. इससे उनकी खुद की राजनीतिक भूमिका भी अधिक महत्वपूर्ण और सार्थक हो जाएगी. वे ऐसे व्यक्ति हैं, जिनको अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी में बहुत पसंद नहीं किया जाता. ऐसे में वे अपनी छवि और कद में सुधार लाने के लिए बेताब हैं.

अगर यह गठबंधन हो जाता है और वे चुनाव जीत जाते हैं तो तिवारी एक महत्वपूर्ण व्यक्ति बन जाएंगे. हालांकि, वे अपनी तरफ से इस तरह के किसी भी प्रयास से इनकार करते हैं. उन्होंने कैच से कहा, "राज्य में किसी भी गठबंधन के बारे में गुलाम नबी आजाद से पूछा जाना चाहिए, जो राज्य के प्रभारी हैं. मैं इस तरह के काम या इस पर किसी तरह की टिप्पणी के लिए अधिकृत नहीं हूं."

बेहतर फॉर्मूला

एक और फॉर्मूला वह है, जिस पर कांग्रेस बिहार की जीत के बाद से ही काम कर रही है. वे बसपा के साथ गठबंधन बनाने की कोशिश कर रहे हैं. दोनों के बीच समझौते की उम्मीद तब जागी, जब सोनिया गांधी ने अपने सबसे विश्वसनीय चेहरों में से एक गुलाम नबी आजाद को प्रभारी के रूप में राज्य में भेजा.

गुलाम को सहयोगी दलों के साथ उनके अच्छे संबंधों के लिए जाना जाता है और वे कश्मीर, तमिलनाडु, बिहार, असम सहित कई अन्य राज्यों में कांग्रेस के लिए अच्छा काम कर चुके हैं.

सूत्र बताते हैं कि आजाद ने बसपा के साथ बातचीत शुरू कर दी है और वे राज्य में अब तक का सबसे मजबूत गठबंधन बनाने की कोशिश कर रहे हैं. यह समीकरण दलित, ब्राह्मण और मुस्लिम वोटों को एक साथ लाने पर आधारित है. कई पर्यवेक्षकों का मानना है कि यदि ऐसा होता है तो यह भाजपा के लिए सबसे अधिक परेशान करने वाली खबर होगी.

आजाद ने खुद संकेत दिया है कि समान सोच वाली पार्टियों के साथ चुनावों के बाद गठबंधन से इनकार करने का कोई कारण नहीं है. कुछ पर्यवेक्षकों का अनुमान है कि भले ही बसपा और कांग्रेस के बीच कोई गठबंधन न हो, वे बहुमत का जादुई आंकड़ा हासिल करने के लिए सीटों पर तो एक सहमति बना ही सकते हैं.

First published: 24 June 2016, 14:04 IST
 
पाणिनि आनंद @paninianand

Senior Assistant Editor at Catch, Panini is a poet, singer, cook, painter, commentator, traveller and photographer who has worked as reporter, producer and editor for organizations including BBC, Outlook and Rajya Sabha TV. An IIMC-New Delhi alumni who comes from Rae Bareli of UP, Panini is fond of the Ghats of Varanasi, Hindustani classical music, Awadhi biryani, Bob Marley and Pink Floyd, political talks and heritage walks. He has closely observed the mainstream national political parties, the Hindi belt politics along with many mass movements and campaigns in last two decades. He has experimented with many mass mediums: theatre, street plays and slum-based tabloids, wallpapers to online, TV, radio, photography and print.

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