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कुछ मुसलमानों को जाकिर नाइक जैसे लोग क्यों पसंद आते हैं?

रंगनाथ सिंह | Updated on: 10 July 2016, 10:09 IST

इस्लामी मान्यता के अनुसार अरब में इस्लाम आने से पहले के समय को 'जाहिलया' पीरियड कहा जाता है. इस्लामी विद्वानों का मानना है कि इस्लाम अरब लोगों के जीवन में 'इल्म' की रोशनी लेकर आया. लेकिन वो रोशनी तेरह सौ सालों बाद भी कुछ लोगों के ज़हन तक नहीं पहुंची है, जाकिर नाइक उनमें से एक हैं.

इस्लाम के जाहलिया पीरियड के जाकिर नाइक अकेले नमूने नहीं हैं. इस्लामी दुनिया में उनके जैसे कई हैं या हो चुके हैं. इनमें से जो उपदेशक अंग्रेजी जानते हैं वो अपने देश (या भाषा) की सीमाओं से परे भी लोगों को प्रभावित करने लगते हैं. जैसे जाकिर नाइक से कुछ बांग्लादेशी नौजवान प्रभावित हो गए, जिन्होंने बाद में ढाका में सामूहिक नरसंहार किया.

जाकिर की जिस चीज से 'भोलेभाले' मुस्लिम सबसे पहले प्रभावित होते हैं वो है उनकी याद्दाश्त. जाकिर, जाहिर तौर पर सभी धर्मों के ग्रंथों से कोटेशन हर्फ-ब-हर्फ कोट करते हैं. हालांकि मैंने कभी क्रॉस चेक नहीं किया कि उनके कोटेशन कितने सही होते हैं. फिर भी, मुझे उनकी याद्दाश्त पर शक़ करने की कभी जरूरत नहीं हुई क्योंकि दुनिया में ऐसे कई लोग हैं जिन्हें जीवन में पढ़ी हुई हर बात हर्फ-ब-हर्फ याद रहती है. कुछ लोगों को अपने जीवन के पिछले दस-बीस-पच्चीस साल की हर दिन की हर छोटी-छोटी बात याद है. 

अच्छी याद्दाश्त अच्छी चीज है, ये प्रभावित भी बहुत करती है और बौद्धिक दुनिया में इसका काफी महत्व भी है. फिर भी याद्दाश्त कभी गंभीर चिंतन और तार्किक विश्लेषण की जगह नहीं ले सकती. बीसवीं सदी के सबसे बड़े वैज्ञानिक आइंस्टीन तो कुख्यात भुलक्कड़ ही थे. याद्दाश्त के धनी जाकिर नाइक चिंतन और विश्लेषण के मामले में बहुत ही फिसड्डी साबित होते हैं. वो आज तक एक धार्मिक कठमुल्ले से आगे नहीं बढ़ पाए हैं.

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विलक्षण याद्दाश्त से सिर्फ इतना होता है कि 'असुरक्षा बोध' और 'पहचान के संकट' से घिरे हुए मुसलमानों (खासकर नौजवानों) को इस बात पर तुरंत यकीन हो जाता है कि जाकिर नाइक 'सभी धर्मों के बड़े जानकार' हैं क्योंकि वो सभी धर्मों के ग्रंथों को जबानी कोट कर सकते हैं.  मैंने कभी इस बात की भी पड़ताल नहीं की है कि जाकिर नाइक क्या सचमुच सभी धर्मों के ग्रंथों के जानकार हैं या उन्होंने अपने जरूरतों के हिसाब के कुछेक धर्मग्रंथों के कुछेक उद्धरण रट रखे हैं.

लेकिन ये सोचना भोलापन होगा कि मुसलमानों का एक वर्ग केवल याद्दाश्त की बाजीगरी के कारण जाकिर नाइक का फैन है. 

आम मुसलमान जाकिर नाइक या उन जैसे उपदेशकों से सबसे ज्यादा प्रभावित इसलिए होते हैं कि जाकिर जैसे लोग उन्हें दुनिया के "सर्वोत्तम" धर्म का अनुयायी होने का यकीन दिलाते हैं. जाकिर इन असुरक्षित और पहचान के संकट से घिरे हुए लोगों को अपने उद्धरणों और बौद्धिक नूरा कुश्तियों से यकीन दिलाते हैं कि 'इस्लाम' उनकी सभी समस्याओं का हल है और भविष्य में एक दिन इस्लाम की जीत होनी पक्की है.

अकादमिक जगत में कुरआन की अक्सर कोट की जाने वाली एक आयत का सरल अनुवाद होगा, "मेरा धर्म मेरे लिए और तुम्हारा धर्म तुम्हारे लिए." लेकिन जाकिर नाइक जैसे लोग ये बात आज तक स्वीकार नहीं कर पाए हैं. जाकिर नाइक के सारे भाषणों का सार इतना है कि इस्लाम दुनिया के बाकी धर्मों से श्रेष्ठ है और एक दिन पूरी दुनिया इस्लाम को स्वीकार करेगी.

जाकिर नाइक: उदारता और इस्लाम के बीच घालमेल

जाकिर नाइक और उनके अनुयायी आज तक ये बात नहीं समझ पाए हैं कि अगर आप सामने वाले के धर्म को नीचा या कमतर बताते हैं तो आप सर्वधर्म समभाव में यकीन नहीं रखते. जाकिर नायक अपने भाषणों में मूर्ति पूजा और मंदिर को धार्मिक पिछड़ेपन का प्रतीक बताते हैं.

जाकिर कुछेक हिंदुस्तानी धर्मग्रंथों को कुछेक कोटेशन के मनमाने प्रयोग से ये साबित करने की कोशिश करते हैं कि भारतीय देवी-देवता भी कुरआन में बताए गए पैगंबरों में से हैं. या फिर फलां धर्म में जिस कल्कि अवतार का जिक्र है वो मोहम्मद ही थे. जाकिर नाइक जब भगवद्पुराण में कल्कि अवतार का जिक्र करते हैं तो कुछ यूं करते हैं जिससे सुनने वालों को लगे कि एक भारतीय पुराण में जिस अवतार की बात कही गई है वो मोहम्मद ही थे.

नाइक की भाषणबाजी में खोया आम मुसलमान ये नहीं जान पाता कि भारत में 18 महापुराणों समेत ढेरों अन्य पुराण हैं

जाकिर नाइक की भाषणबाजी में खोया आम मुसलमान ये नहीं जान पाता कि भारत में 18 महापुराणों समेत ढेरों अन्य पुराण हैं. कुछेक लोग तो पुराणों की संख्या सौ से ऊपर मानते हैं. और हर पुराण किसी न किसी देवता को सर्वश्रेष्ठ बताता है.

जाकिर नाइक जिस भागवद्पुराण को कोट करते हुए कहते हैं कि कल्कि अवतार सफेद घोड़े पर बैठे तलवार लिए विश्व विजय करेगा तब उनके सुनने वालों को ये बात कत्तई याद नहीं आती कि खुद मोहम्मद ने अपने जीवनकाल में मक्का-मदीना इलाके से बाहर कोई लड़ाई नहीं लड़ी थी. इस्लाम अरब जगत से मोहम्मद की मृत्यु के बाद ही फैला. 

जाकिर नाइक और उन जैसे इस्लामी उपदेशक इस्लाम को केवल मूर्ति पूजा करने वाले (हिंदू , बौद्ध या जैन इत्यादि) से ही श्रेष्ठ नहीं मानते. वो अहले-किताब (इस्लाम, ईसाई और यहूदी) में भी असली और सच्चा इस्लाम को ही मानते हैं. कुरआन में कहा गया है कि ईसाई और यहूदी अपनी 'असल शिक्षाओं' को भूल चुके हैं. जाकिर नाइक इसे कुछ यूं पेश करते हैं जैसे इस्लाम ही सच्चा ईसाई और यहूदी धर्म है. और जो लोग इस समय यहूदी और ईसाई हैं वो दरअसल 'इस्लाम से महरूम' हो चुके लोग हैं.

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जाकिर नाइक की धार्मिक सर्वोच्चता के दंभपुर्ण दावे को सबसे ज्यादा बल इससे मिलता है कि अपने उदय के महज कुछ सौ सालों के भीतर दुनिया के बड़े भौगोलिक इलाके पर इस्लाम को मानने वाले हुक्मरानों का शासन हो गया. जिनका प्रभाव अगले कई सौ सालों तक बरकरार रहा. बाद में दुनिया में मुसलमान शासकों के दबदबे को ब्रिटेन और फ्रांस जैसे उपनिवेशवादी देशों ने तोड़ दिया. 1922 में तुर्की के ओटोमन साम्राज्य के खात्मे के साथ ही दुनिया का आखिरी बड़ा मुस्लिम साम्राज्य खत्म हो गया. 

जाकिर नाइक या उन जैसे लोग मुसलमान सल्तनतों के किस्से सुनाकर लोगों को ये यकीन दिलाने की कोशिश करते हैं कि इस्लाम पर अमल किया जाए तो पूरी दुनिया फतह की जा सकती है. अतीत में ऐसा हो चुका है और भविष्य में भी ऐसा होना है. सरलमति श्रोता उनकी इस बात पर यकीन कर लेते हैं कि 'इस्लाम' ही वो ताकत थी जिसकी वजह से दुनिया में इस्लाम को मानने वाले शासकों का इतने लंबे समय तक दबदबा रहा.

उन्हें इस बात का बिल्कुल अंदाज नहीं होता कि सैन्य जीत में सामाजिक, आर्थिक, भौगोलिक और सामरिक पहलू का शायद धर्म से ज्यादा योगदान होता है. (युद्ध में धर्म की भूमिका को लेकर मुसलमान ही नहीं उन्नीसवीं सदी के भारतीयों धर्मसुधारकों को भी लगता था कि हमारा देश धार्मिक शक्ति के कमजोर होने की वजह गुलाम हुुआ.) 

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नाइक सल्तनतों के किस्से सुनाकर यकीन दिलाते हैं कि इस्लाम पर अमल से पूरी दुनिया जीती जा सकती है

आखिर इस्लाम की इस विश्वविजयी और दोबार विश्व विजयी बनने की संभावना की व्याख्या से जाकिर नाइक के प्रशंसकों को क्या मिलता है? इसका सीधा-सरल उत्तर है कि उन्हें अपनी-अपनी 'हीनताग्रंथियों' से फौरी राहत और भविष्य के लिए एक उम्मीद मिलती है. 

बनारस या ढाका या कराची में रहने वाले मुसलमान को ऐसा इस्लाम एक अंतरराष्ट्रीय पहचान देता है. एक ऐसी पहचान जिसका स्वर्णिम अतीत था और जिसका सुनहरा भविष्य भी निश्चित है. और कुछेक लोग (खासकर पहचान के संकट से जूझ रहे नौजवान) उस पहचान और भविष्य की तामिर के लिए घातक औजार बनने को भी तैयार हो जाते हैं.

और ये कोई पहली बार नहीं हो रहा है. इतिहास गवाह है कि किसी 'बड़े मक़सद' के लिए जान तक दे देने का जुनून उम्र के एक दौर में आदमी के नस नस में दौड़ता है. भारतीय क्रांतिकारी भगत सिंह ने नौजवानों की इस फितरत पर बहुत ही कवित्वपूर्ण लेख लिखा है. ऐसे में अगर पहचान के संकट से जूझ रहे नौजवान मुस्लिम उग्रवादियों के झांसे में आ रहे हैं तो ये कोई नई बात नहीं है. नौजवानों के प्राकृतिक जोशो-जुनून का इस्तेमाल पहले भी कई नेता या उपदेशक करते रहे हैं.

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लेकिन इस समस्या का समाधान क्या है? एक तरह से समाधान सीधा और सरल है.

जिस दिन जाकिर नाइक जैसे मुस्लिम उपदेशकों ने ये मान लिया कि इस्लाम दुनिया का 'सर्वश्रेष्ठ' धर्म नहीं, बल्कि दुनिया के "सर्वश्रेष्ठ धर्मों में एक" है, और सभी धर्म आपस में बराबर हैं. उसी दिन उनके चाहने वालों में कम से कम ऐसे लोग तो नहीं शामिल होंगे जो कुरआन की आयतों से लिटमस टेस्ट करके मासूमों की जान लेंगे.

जिस दिन जाकिर नाइक जैसे उपदेशकों ने मान लिया कि अब दुनिया में अतीत की तरह 'इस्लामी शासन' दोबारा नहीं आएगा, और हर धर्म में किसी ने किसी रूप में एक ऐसी कल्कि की कल्पना की गई है जो दुनिया को सभी दुखों से मुक्ति दिला देगा, उस दिन अलग-अलग देशों के नौजवान किसी 'धार्मिक राम राज्य' के निर्माण के लिए जान लेना-देना छोड़ देंगे.

और अंत में ये कहना जरूरी है कि इस समाधान की जरूरत केवल मुसलमानों को ही नहीं, बल्कि दुनिया के सभी बड़े धर्मों या विचारधाराओं को है. धार्मिक पुनरुत्थानवाद चाहे किसी भी धर्म या देश का हो वो मूलतः मानवताविरोधी ही होता है.

First published: 10 July 2016, 10:09 IST
 
रंगनाथ सिंह @singhrangnath

पेशा लिखना, शौक़ पढ़ना, ख़्वाब सिनेमा, सुख-संपत्ति यार-दोस्त.

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