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योर ऑनर, खबरों में जज का नाम क्यों नहीं लिखा जाना चाहिए?

सौरव दत्ता | Updated on: 28 August 2016, 8:18 IST

मद्रास हाईकोर्ट ने हाल ही में व्यवस्था दी है कि पत्रकार अदालती मामलों की रिपोर्टिंग करते समय न्यायाधीशों के नाम का उल्लेख नहीं करें जबतक कि बहुत ही आवश्यक न हो. हालांकि कोर्ट ने अपने इस वाक्यांश को पारिभाषित नहीं किया है और इसे संदेह, अनिश्चितता यहां तक कि खतरों की अतिसंवेदनशीलता के आधार पर पत्रकारों पर छोड़ दिया है. 

मीडिया पर इस प्रतिबंध की वजह यह है कि न्यायाधीश निर्णय देते समय अपनी व्यक्तिगत धारणा या सिद्धान्तों को आड़े नहीं आने देते और निष्पक्ष रूप से निर्णय देते हैं और उनके विचार उनके फैसलों पर हावी नहीं होते.

थोड़ी-बहुत जानकारी रखने वाला कोई भी व्यक्ति इस तथ्य पर गौर करेगा कि हमारे यहां लीगल सिस्टम किस तरह काम करता है और यह मानने से इनकार नहीं करेगा कि न्यायाधीशों के निर्णय उनकी विचारधाराओं के आग्रहों-पूर्वाग्रहों को प्रभावित होते हैं. 

गुलबर्ग फैसला: न्याय की उम्मीद में निराश नज़रें

सचमुच में, इसे परखने के लिए सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड न्यायाधीश के सिवाय और कोई अथॉरिटी नहीं हो सकती. सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड न्यायाधीश ने स्वीकार किया है कि उनके द्वारा दिए गए कुछ -गलत-फैसले के पीछे उनका वैचारिक झुकाव था. इसके लिए उन्होंने माफी भी मांगी.

न्यायाधीशों के वैचारिक बंधन का उनके निर्णयों पर असर पड़ता है, इस विचार पर क्रिटिकल लीगल स्टडीज में विस्तार से अध्ययन किया गया है.

अफजल समाज के लिए नासूर बन चुका है, इसलिए उसकी जिन्दगी समाप्त हो जानी चाहिए

सुप्रीम कोर्ट के कुछ निर्णयों से इस बात की पुष्टि भी होती है. आपातकाल के दौरान एडीएम जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा बहुमत से दिए फैसले में नागरिकों को संविधान प्रदत्त उनके मौलिक आधिकारों और स्वतंत्रता के अधिकारों से वंचित कर दिया गया था. केवल एक न्यायाधीश एचआर खन्ना ने अपनी असहमति जताई थी.

अदालत जाने की आजादी क्या न्याय की गारंटी है?

हाल का अफजल गुरु का मामला है. अफजल को फांसी की सजा सुनाते हुए अदालत ने टिप्पणी की थी कि समग्र तौर पर समाज को तभी संतुष्ट किया जा सकता है, जब उसे मौत की सजा दी जाए. अफजल समाज के लिए नासूर बन चुका है, इसलिए उसकी जिन्दगी समाप्त हो जानी चाहिए. इस आधार पर हम उसकी मौत की सजा को बरकरार रखते हैं.

अमरीका में भी, 1943 में वहां के सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा था कि दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान जापानियों की नजरबंदी का आधार संदेह, संशय से अधिक उनकी देशभक्ति, विदेशियों के प्रति घृणा थी.

1941 में ब्रिटिश हाउस ऑफ लॉर्ड्स ने लिवरसिड्गे बनाम एंडरसन मामले में बहुमत से व्यवस्था दी थी कि जब युद्ध के दौरान बंदूकें आग उगल रही हैं, तब कानून शांत पड़ा है. हाउस ऑफ लॉर्ड्स के केवल एक सदस्य लॉर्ड एटकिन्स ने इससे असहमति जताई थी.

न्याय के मंदिर से लापता न्यायमूर्ति

स्पष्ट रूप से ये निर्णय एक्जीक्यूटिव की सुप्रीमेसी पर जजों की उनकी वैचारिक स्थिति का बोध कराते हैं. सिद्धान्त है कि अदालत को केवल कानून का विवेचन करना चाहिए, इसमें परिवर्तन के लिए नहीं कहना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट का फर्ज कानूनों को बेबस करने का है कि वह संवैधानिक सिद्धान्तों और आदर्शों के प्रभावी होने को सीमा में रखे.

यदि निर्णयों और आदेशों को प्रेस से रोका जाता है और कोई भी इंटरनेट कनेक्शन के जरिए उसे हासिल कर लेता है

कोई आश्चर्य नहीं जब वरिष्ठ वकील रेबिका जॉन हाईकोर्ट द्वारा प्रेस पर प्रतिबंध पर गुस्से से तमतमाती हुई कहती हैं कि यदि जनता में आए निर्णयों और आदेशों को प्रेस से रोका जाता है और कोई भी इंटरनेट कनेक्शन के जरिए उसे हासिल कर लेता है तो ऐसे में पत्रकारों पर प्रतिबंध का क्या औचित्य रह जाएगा. वह कहती हैं कि यह निर्णय पूरी तरह से मनमाना और अव्यावहारिक है.

सीनियर एडवोकेट जॉन आगे कहती हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने भी सहारा बनाम सेबी मामले में कोर्ट की रिपोर्टिंग पर व्यवस्था देते हुए कुछ गाइडलाइंस (इसे प्रतिबंध पढ़ा जाना चाहिए) तय की है. हालांकि पत्रकारों ने इसका विरोध किया है, पर नियामक संस्था प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया मूकदर्शक बनी हुई है. 

सुप्रीम कोर्ट की क्षेत्रीय शाखाएं न्याय की दिशा में ऐतिहासिक कदम हो सकती हैं

क्या मीडिया और लीगल स्कॉलर्स के लिए मद्रास हाईकोर्ट के इस डायरेक्टिव मुद्दे को उठाना लाजिमी नहीं है? इस सबके बाद भी जैसा कि वरिष्ठ वकील महमूद प्रेचा ने कहा है कि न्याय को निष्कपट और पारदर्शी होना चाहिए. जनता को यह जानने की जरूरत है कि किसने इस तरह का निर्णय दिया, कारण क्या रहा और क्यों दिया?

First published: 28 August 2016, 8:18 IST
 
सौरव दत्ता @SauravDatta29

Saurav Datta works in the fields of media law and criminal justice reform in Mumbai and Delhi.

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