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यह खुशी की बात है, सुप्रीम कोर्ट ने व्हाट्सएप पर प्रतिबंध की अपील को खारिज कर दिया

चारू कार्तिकेय | Updated on: 30 June 2016, 12:57 IST
QUICK PILL
  • सुप्रीम कोर्ट ने मोबाइल मैसेजिंग एप व्हाट्सएप, हाइक समेत अन्य एप्स पर प्रतिबंध लगाने वाली याचिका को खारिज कर दिया है.
  • कोर्ट ने याचिकाकर्ता से कहा कि अगर आपको यह जरूरी लगता है तो आप इस मुद्दे को लेकर टीडीसैट के पास जा सकते हैं.
  • आरटीआई एक्टिविस्ट सुधीर यादव ने व्हाट्सएप के एंड-टू-एंड इनक्रिप्शन फीचर के खिलाफ याचिका दायर की थी. यादव का कहना था कि इस फीचर को शुरू किए जाने के बाद सरकार अपराधियों और आतंकियों के बीच की बातचीत को सुन नहीं सकती.

मैं आपको नहीं जानता लेकिन मैं सुप्रीम कोर्ट के व्हाट्सएप पर प्रतिबंध लगाए जाने के फैसले से बेहद खुश हूं. इसलिए नहीं क्योंकि मैं इस एप का बहुत ज्यादा इस्तेमाल करता हूं बल्कि इसलिए कि यह फैसला निजता के अधिकार का सम्मान करता है.

आरटीआई एक्टिविस्ट सुधीर यादव ने व्हाट्सएप के एंड-टू-एंड इनक्रिप्शन फीचर के खिलाफ याचिका दायर की थी. व्हाट्सएप ने यह फीचर इसी साल अप्रैल महीने में शुरू किया था. इस फीचर की जरूरत को साधारण तौर पर ऐसे समझा जा सकता है कि इसके बाद कोई भी व्हाट्सएप पर दो लोगों के बीच होने वाली निजी बातचीत को रिकॉर्ड नहीं कर सकता. यह फेसबुक के साथ भी है. व्हाट्सएप का मालिकाना हक अब फेसबुक के पास है.

यादव का कहना था कि इस फीचर को शुरू किए जाने के बाद सरकार अपराधियों और आतंकियों के बीच की बातचीत को सुन नहीं सकती. उन्होंने कहा कि सरकार को व्हाट्सएप के इनक्रिप्शन की वजह से किसी बातचीत को सुनने में सैंकड़ों साल जाएंगे और इससे आतंकियों को मदद मिलेगी. 

व्हाट्सएप के अलावा यादव की याचिका में वाइबर, टेलीग्राम, हाइक और सिग्नल जैसे एप में भी ऐसे फीचर के होने की शिकायत की गई थी. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता को टेलीकॉम डिस्प्यूट्स सेटलमेंट एंड अपीली ट्राइब्यूनल में जाने की सलाह दी.

वेब आधारित मोबाइल एप्लिकेशन एंड-टू-एंड फीचर का इस्तेमाल कर रही हैं ताकि निजी बातचीत को सुरक्षित किया जा सके. आज के युग में हमारी जिंदगी दोस्तों और अपने परिचितों के साथ होने वाली बातचीत पर आधारित है.

आरटीआई एक्टिविस्ट सुधीर यादव ने व्हाट्सएप के एंड-टू-एंड इनक्रिप्शन फीचर के खिलाफ याचिका दायर की थी

इस बातचीत के लीक होने की आशंका अक्सर मुझे डराती रहती है. आप याद कीजिए जब गूगल आपसे कहता है कि आप अपने एप्वाइंटमेंट में देरी से चल रहे हैं. क्या आपको कभी लगता था कि गूगल आपकी निजी बातचीत को देख रहा है जिसके मुताबिक आपको किसी से मिलना है. इस आशंका से बचने के लिए इनक्रिप्शन बेहद जरूरी था.

गूगल अभी भी इन्क्रिप्शन जैसा फीचर मुहैया नहीं कराता है. जीमेल सुरक्षित नहीं है. कंपनी ने मई में नया मैसेंजर अलो पेश किया है. हालांकि यह एप इनक्रिप्शन को सपोर्ट करता है. लेकिन यह बाइ डिफॉल्ट डिसएबल रहता है. मतलब यह कि गूगल आपकी बातचीत का रिकॉर्ड रख सकता है और अगर आप ऐसा नहीं चाहते हैं तो आपको इस फीचर को एक्टिवेट करना होगा.

ऐसा नहीं है कि आतंक संबंधी चिंताएं वाजिब नहीं हैं और यह हमारी निजता के मुकाबले कम प्राथमिकता का मामला है. वास्तव में आतंकी इस तरह के एप का इस्तेमाल भी कर रहे हैं. हालांकि उनकी बातचीत को रिकॉर्ड करना महज एक जरिया है. लेकिन यह जानना जरूरी है कि आतंकियों को इन एप के जरिये हथियार और फंड की सप्लाई नहीं होती है.

वैश्विक सुरक्षा एजेंसियां आतंक के पीछे की राजनीति को पकड़ने की दिशा में बेहतर कदम उठाएंगी. तब तक मैं यह कहूंगा कि आपको मेरा ईमेल और मैसेज पढ़ने की जरूरत नहीं है.

First published: 30 June 2016, 12:57 IST
 
चारू कार्तिकेय @CharuKeya

Assistant Editor at Catch, Charu enjoys covering politics and uncovering politicians. Of nine years in journalism, he spent six happily covering Parliament and parliamentarians at Lok Sabha TV and the other three as news anchor at Doordarshan News. A Royal Enfield enthusiast, he dreams of having enough time to roar away towards Ladakh, but for the moment the only miles he's covering are the 20-km stretch between home and work.

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