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'मुझे अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में पढ़ने पर फख्र नहीं है'

लमत आर हसन | Updated on: 10 February 2017, 1:51 IST

कई साल पहले मैं अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) की छात्रा थी. मैंने अपनी जिंदगी के पांच साल वहां गुजारे. अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि वो मेरे जीवन के बेहद बुरे पांच साल थे.

कई दूसरी लड़कियों की तरह मुझे भी एएमयू में तालीम के साथ-साथ तहजीब सीखने के लिए भेजा गया था.

मेरे माता-पिता खुले विचारों के थे फिर भी वो सोचते थे बोर्डिंग स्कूल में पढ़ने के कारण मेरे ऊपर जो प्रभाव पड़े हैं वो एएमयू में दूर हो जाएंगे. आखिर, नौवीं कक्षा में ही मैंने उनसे पूछा था कि "अगर मुस्लिम लड़के गैर-मुस्लिम से शादी कर सकते हैं तो मुस्लिम लड़कियां क्यों नहीं?"

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मेरे ख्याल से उन्हें मेरे जिस सवाल ने सबसे अधिक परेशान किया वो ये था, "क्या मैं सेक्स चेंज करा सकती हूं."

मैंने बस यूं ही वो सवाल पूछ लिया था. मैं अपनी खिड़की से बाहर लड़कों को सूरज ढलने के बाद भी साइकिल चलाते देखती थी. मुझे लगा कि लड़का होना ज्यादा मजेदार होता है. और मैंने इसके कुछ समय पहले ही सेक्स चेंज के बारे में एक खबर पढ़ी थी.

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के मुख्य लाइब्रेरी में स्नातक की लड़कियां नहीं जा सकतीं

मेरे सवालों से मेरे माता-पिता परेशान हो गए. दसवीं की बोर्ड परीक्षा के बाद मेरे पिता मुझे अलीगढ़ ले गए. उन्हें खुद के अलीगैरियन (एएमयू का छात्र) होने पर हमेशा फख्र रहता था.

एएमयू पहुंचने के करीब दो महीने बाद अब्दुल्ला हाल में मैं स्कर्ट पहने हुए देखी गई. अब्दुल्ला हाल एएमयू का सबसे पुराना और बड़ा महिला कैंपस है. हाल की वार्डेन ने मुझसे कहा, "पढ़ने लिखने वाली 'अच्छी' लड़कियां ऐसे कपड़े नहीं पहनती."

मैं उनकी बात समझ नहीं पायी. करीब दो महीने पहले तक स्कर्ट मेरी स्कूल यूनिफॉर्म थी. दसवीं की परीक्षा में मेरे ठीक-ठीक नंबर थे. स्कूल की मेरी सारी दोस्तें भी स्कर्ट पहना करती थीं.

मुझसे दुपट्टे के साथ सलवार-कमीज पहनने के लिए कहा गया. मैंने उससे पहले कभी सलवार-कमीज नहीं पहना था. अलीगढ जाने से पहले मेरे पास कोई सलवार-कमीज नहीं थी. मेरी मां ने एएमयू जाते समय चार जोड़े सलवार-कमीज बनवा कर मेरे सामान में रखवाया. उन्होंने कमीज के कंधे पर स्ट्रैप भी लगवाए थे ताकि दुपट्टा ठीक से रहे.

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मुझे एमएमयू में अनगिनत बार ठीक से दुपट्टा न लेने के लिए टोका गया. रैगिंग के दौरान मुझसे अक्सर कहा जाता था कि "इसे तो बच्ची बनने का शौक है."

उस समय मैं अक्सर अकेले में रोते-रोते ही सोती थी. इन सबसे गुजरने वाली मैं अकेली नहीं थी. कुछ दूसरी लड़कियों को भी 'तहजीबदार' न होने के लिए अपमानित होना पड़ता था.

कॉलेज में मुझे इंग्लिश की क्लास सबसे अच्छी लगती थी. हमें शानदार टीचर पढ़ाते थे. एएमयू के पांच साल के वक्फे में बस यही एक चीज है जिसे याद करके मैं अच्छा महसूस कर पाती हूं.

बाकी विषयों में मेरा मन ज्यादा नहीं लगता था. ज्यादातर टीचर नोट्स लेकर आते थे और क्लास में उन्हें बोल-बोल कर पढ़ते थे. फिर क्लास खत्म.

मैं डर के मारे कोई सवाल नहीं पूछ पाती थी क्योंकि इसके जवाब में मुझे ये सुनना पड़ सकता था कि "बहुत स्मार्ट बन रही हैं आप."

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मुझे अब तक याद है कि हमें पंचवर्षीय योजना पढ़ाने वाली टीचर किस तरह सालों पुराने नोट्स को क्लास में दोहरा कर चली जाती थीं. कोई डर के मारे सवाल नहीं पूछता था.

बीए फर्स्ट ईयर तक मेरी गिनती 'अच्छी लड़कियों' में होती थी क्योंकि मैं चोरी-छिपे कैंपस से बाहर नहीं जाती थी. बाहर जाने के लिए इजाजत लेने की प्रक्रिया इतनी लंबी-चौड़ी थी कि कई लड़कियां इनके बिना ही चुपके से बाहर चली जाती थीं.

वहां मेरा कोई "भाई" भी नहीं था तो छुट्टी के दिन भी मुझसे मिलने कौन आता.

बीए फाइनल ईयर में मुझे अब्दुल्ला हाल के एक हॉस्टल की हेड गर्ल बनाया गया. ये कोई हैरानी की बात नहीं थी. तब तक मुझे लड़कियों पर नजर रखना सिखाया जा चुुका था. उन लड़कियों पर भी जो सलवार-कमीज पहनती थीं. उनपर भी जिनकी ख्वाहिशें हॉस्टल से बाहर जाने के बाद उड़ान भरने लगती थीं. फिर एक दिन मुझसे गलती हो गयी.

आखिरी साल की परीक्षा से करीब तीन महीने पहले मैं अपनी एक बैचमेट की बर्थडे पार्टी में चली गयी. मैं रात को उसी के घर रुक गयी. उसके बाद मानों पहाड़ टूट पड़ा. मुझपर 'गैर-मुसलमान' के संग दोस्ती रखने का आरोप था.

उस एक लम्हे में मुझे फिर से अहसास करा दिया गया कि स्कर्ट या पैंट पहनने वाली लड़कियां कितनी बुरी होती हैं. उस घटना से ये नतीजा निकाला गया कि दूसरी 'बुरी लड़कियों' की तरह मेरे भी 'भाई' हैं, मैं भी नशा वगैरह करती हूं और मैं उन तमाम बुराइयों में लिप्त हूं जो ऐसी लड़कियों में होती हैं. 

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उसके बाद मैं हेडगर्ल नहीं रही. मेरे माता-पिता को बुलाया गया. मेरी मां को समझ में ही नहीं आया कि दिक्कत किस बात की है और किसी 'गैर-मुस्लिम' से दोस्ती करना गलत क्यों है. जाने से पहले मां ने मेरे 'गैर-मुस्लिम' दोस्त के माता-पिता को मेरा अतिरिक्त अभिभावक बना दिया.

एएमयू में बिताए पांच साल के दौरान मैंने कुछेक बार ही प्रोवोस्ट का दरवाजा खटखटाया होगा. एक बार मैं घुड़सवारी करना चाहती थी. एक और बार सिविल सर्विस की तैयारी के लिए कोचिंग सेंटर में एडमिशन लेना चाहती थी. प्रोवोस्ट ने अपना चश्मा ठीक करते हुए मुझे और मेरी दोस्त को ऊपर से नीचे तक देखा और कहा, "जाकर पहले अखबार पढ़ो."

हद तो तब हो गयी जब मुझे जवाहरलाल नेहरू विश्वविदयालय (जेएनयू) की एमए की प्रवेश परीक्षा के लिए दिल्ली जाने की इजाजत नहीं मिली. ये बात मैं आज तक नहीं भूल पायी और न ही इसके लिए उन्हें माफ कर पायी.

बहरहाल, दो साल बाद मैं जेएनयू में एडमिशन पाने में कामयाब रही और मेरी दोस्त सिविल सर्विस में चुन ली गयी.

ये दुखद है कि इतने सालों में शायद एएमयू में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है.

नवंबर, 2014 में एएमयू के वाइस-चांसलर लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) ज़मीरुद्दीन शाह ने स्नातक की लड़कियों को यूनिवर्सिटी की मुख्य लाइब्रेरी में जाने की इजाजत देने से मना कर दिया. उन्होंने कहा, "अगर ऐसा किया गया तो लाइब्रेरी में उनके पीछे चार गुना ज्यादा लड़के वहां पहुंचने लगेंगे."

बाद में उन्होंने सफायी देते हुए कहा कि ये जगह की कमी का मामला है न कि अनुशासन का.

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में पढ़ीं कुछ महिलाएं अपने बच्चों को पढ़ाई के लिए वहां नहीं भेजना चाहतीं

एएमयू में लड़कियों को 'गैर-इस्लामी' कपड़े पहनने के लिए उत्पीड़ित किया जाता है. यौन शोषण की शिकायत करने पर उन्हें परेशान किया जाता है.

साल 2006 में असमा जावेद नाम की एक लड़की ने शिकायत की थी कि "उसके प्रोफेसर उसे अपने घर बुलाते हैं और पैसा देने की बात भी कहते हैं." उसे धमकी दी गयी और कहा गया कि वो अपनी शिकायत वापस ले ले.

एक अन्य मामले में फरहा खानम नाम की लड़की को जींस-टीशर्ट पहनने के लिए धमकाया गया. पत्रकारिता की छात्र फरहा ने वीसी से शिकायत की थी कि दो मोटसाइकिल सवार लड़कों ने उसकी शाल खींच ली थी.

अभी हाल ही में समलैंगिक प्रोफेसर श्रीनिवास रामचंद्रन सिरास को एएमयू से निकाल दिया गया. सिरास ने उसके कुछ महीने बाद आत्महत्या कर ली.

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दुनिया के हर कोने में मौजूद अलिगैरियन खुद पर गर्व करते हैं. यहां के पूर्व छात्रों के कई फोरम हैं. सर सैय्यद अहमद खान की जयंति (17 अक्टूबर) समारोह में काफी अलिगैरियन शामिल होते हैं.

हाल ही में मैं ऐसी कुछ महिलाओं के साथ थी जिन्होंने एएमयू से पढ़ाई की थी. मेरे लिए ये सुखद आश्चर्य का विषय था कि उनसब को अपने एएमयू के दिनों को लेकर ज्यादा फख्र नहीं था.

उन सबका मानना था कि वहां जाना टाइम मशीन में पीछे जाने जैसा था. उन सबको लगता था कि अगर वो एएमयू के बजाय कहीं और पढीं होती तो जिंदगी में ज्यादा बेहतर किया होता.

ये और भी हैरत की बात थी कि उनमें से कोई भी अपने बच्चों को पढ़ाई के लिए एएमयू नहीं भेजना चाहती थीं.

पता नहीं, सर सैय्यद अहमद को कब्र में ये सब सुनकर कैसा लग रहा होगा. उन्होंने तालीम का जो तसव्वुर किया था उसका ये हाल देखकर वो न जाने क्या सोचते होंगे.

First published: 3 March 2016, 6:03 IST
 
लमत आर हसन @LamatAyub

संवाददाता, कैच न्यूज़

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