Home » इंडिया » Catch Hindi: why indian mps are not at ease with rti and pil?
 

आरटीआई और पीआईएल से क्यों भागते हैं हमारे नेता?

चारू कार्तिकेय | Updated on: 10 February 2017, 1:49 IST

अगर सूचना का अधिकार (आरटीआई) न होता तो देश को ये कभी पता नहीं चलता कि 2010 में नागरिक उड्डयन मंत्री प्रफुल पटेल के परिवार के चलते एयर इंडिया को बड़े एयरक्राफ्ट का इंतजाम करना पड़ा था. पटेल के लिए ये कोई बड़ी बात नहीं है. वरना वो संसद में ये न कहते कि आरटीआई का ग़लत इस्तेमाल किया जा रहा है और ये क़ानून जल्दबाजी में बनाया गया है.

11 साल पहले यूपीए सरकार ने आरटीआई कानून बनाया था. उस समय प्रफुल की पार्टी एनसीपी उसका अंग थी. ऐसे में ये बात थोड़ी हैरान कर देने वाली है कि वो अब जाकर इसपर खीझ रहे हैं कि कोई भी 10 रुपये देकर सरकार से किसी भी तरह की जानकारी मांग सकता है.

पढ़ेंः सूचना आयोग की रिपोर्ट आरटीआई पर मंडराते खतरे का इशारा है

पटेल को इस बात पर बहुत नाराजगी है कि आरटीआई का उपयोग करके कोई पनवाड़ी या चायवाला देश के मिसाइल कार्यक्रम के बारे में सूचना मांग सकता है. उन्होंने सरकार से इस कानून को बदलने की मांग की.

एनसीपी के प्रफुल पटेल ने राज्य सभा में आरटीआई के खिलाफ निकाली भड़ास

28 अप्रैल को आरटीआई पर राज्य सभा में हुई बहस में पटेल आखिरी वक्ता थे. हालांकि इस कानून के खिलाफ राय जाहिर करने वाले वो पहले या अकेले वक्ता नहीं थे.

मूलतः सदन में इस बात पर चर्चा होने वाली थी विभिन्न सरकारी विभाग आरटीआई के तहत सूचना देने में किस तरह आनाकानी करते हैं. लेकिन पटेल ने अपने पहले के वक्ता से सूत्र लेते हुए अपना भाषण को आरटीआई के दुरुपयोग और कमियों पर केंद्रित कर दिया.

कांग्रेसी सांसद राजीव शुक्ला ने आरटीआई के पेशेवर उगाही करने वालों के हाथों हो रहे दुरुपयोग का मुद्दा उठाया. समाजवादी पार्टी के सांसद नरेश अग्रवाल ने यहां तक कह दिया कि आरटीआई कानून अमेरिका के दबाव में बनाया गया था ताकि खुफिया सरकारी सूचनाओं को लीक कराया जा सके. अग्रवाल सदन में जानना चाहते थे कि क्या किसी पड़ोसी देश में ऐसा कोई कानून है.

पढ़ेंः अनुराग ठाकुर शायद भूल गए हैं कि वो जनप्रतिनिधि भी हैं

अग्रवाल की रुचि केवल पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका के बारे में ही जानकारी पाने की थी. ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल के अनुसार ये सभी देश में भ्रष्टाचार के मामले में भारत से भी आगे हैं. शायद अग्रवाल को इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता.

सरकार ने विपक्ष द्वारा आरटीआई की आलोचना को दोनों हाथों से गले लगाया. केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह इस पर सहमत थे कि आरटीआई का इस्तेमाल सरकारी अफ़सरों को धमकाने के लिए किया जा रहा है. उन्होंने विपक्ष को आश्वासन दिया कि सरकार इसपर मुद्दे पर विचार करेगी.

आरटीआई पर सवाल


आरटीआई द्वारा संवेदनशील जानकारियों के लीक होने के बारे में पटेल और अग्रवाल बेबुनियाद है. खुद मंत्रीजी उन्हें बताया कि आरटीआई की धारा 8 और 24 के तहत देश की संप्रभुता और अखण्डता के साथ ही राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी जानकारियों को आरटीआई के अधिकार क्षेत्र से बाहर रखा गया है.

ये भी याद रखना चाहिए कि खुद सरकार पर आरटीआई की धारा 8 और 24 के दुरुपयोग के आरोप लगातार लगते रहे हैं.

पढ़ेंः बुरे फंसे पूर्व चीफ जस्टिस केजी बालाकृष्णन

राजनीतिक पार्टियों का आरटीआई का विरोध कोई नई बात नहीं है. कई आरटीआई कार्यकर्ता और सूचना आयुक्त ये कहते रहे हैं राजनीतिक दलों को आरटीआई के अंतगर्त लाना चाहिए क्योंकि वो सार्वजनिक चंदे का उपयोग करते हैं.

सीआईसी और सुप्रीम कोर्ट की अनुशंसा के बावजूद कोई भी राजनीतिक दल आरटीआई के तहत नहीं आना चाहता

लेकिन राजनीतिक दलों ने अपनी आय और खर्च का ब्योरा देने के मामले में देश के मुख्य सूचना आयुक्त(सीआईसी) औ सुप्रीम कोर्ट तक को धता बता दिया.

जब सीआईसी ने राजनीतिक दलों को आरटीआई के तहत लाने की कोशिश की तो तत्कालीन यूपीए सरकार ने इस कानून में बदलाव करके मामले को रफा-दफा कर दिया था.

उसके बाद 2015 में एनडीए सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि सीआईसी का निर्णय गलत था और राजनीतिक दलों को आरटीआई के तहत लाने से उनका कामकाज प्रभावित होगा.

पीआईएल से भी दिक्कत


कई सांसदों के लिए आरटीआई एकमात्र चिंता का विषय नहीं है. जनहित याचिका (पीआईएल) भी उनके लिए काफी बड़ी समस्या है.

आम जनता के लिए भले ही ये कानून बेहतर लोकतंत्र की दिशा में बढ़े कदम हों, राजनीतिक दलों और नेताओं को ये ज्यादा नहीं सुहाते.

1980 के दशक में जब पीआईएल की शुरुआत हुई तभी से देश में कई ऐतिहासिक फैसले इसके तहत आए हैं.

अभी हाल ही में 122 टेलीकॉम कंपनियों को 2-जी स्पेक्ट्रम दिए जाने से जुड़ा घोटाला और कोयला घोटाला पीआईएल की वजह से खुले. वहीं पूर्व मुख्य न्यायाधीश केजी बालकृष्णन, हिमाचल प्रदेश के सीएम वीरभद्र सिंह और यूपी की पूर्व सीएम मायावती के खिलाफ ताज-कॉरिडोर का मामला भी पीआईएल का परिणाम है.

पढ़ेंः बुरे फंसे पूर्व चीफ जस्टिस केजी बालाकृष्णन

भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड(बीसीसीआई) और इंडियन प्रीमियर लीग(आईपीएल) से जुड़ी पीआईएल के बाद बीजेपी सासंद और बीसीसीआई के सचिव अनुराग ठाकुर ने यहां तक कह दिया कि इसकी वजह से बोर्ड को भारी नुकसान हुआ है.

जाहिर है कि पटेल, अग्रवाल और ठाकुर की चिंताएं कमोबेश एक जैसी हैं. वो सासंद और सामंत के बीच का फर्क नहीं समझ पा रहे हैं. वो अभी तक ये स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं कि लोकतंत्र की अंतिम शक्ति आम जनता में निहित है जो इन लोगों को सांसद चुनती है.

इसलिए चाहे वो चायवाला हो या पनवाड़ी उसे किसी भी सरकारी नुमाइंदे से सवाल पूछने का पूरा हक़ है. ऐसे नेताओं को ये नहीं भूलना चाहिए कि इस लोकतंत्र की वजह से ही आज एक चायवाला पीएम है और कौन जाने अगला नंबर किसी पनवाड़ी का हो!

First published: 3 May 2016, 8:40 IST
 
चारू कार्तिकेय @charukeya

असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़, राजनीतिक पत्रकारिता में एक दशक लंबा अनुभव. इस दौरान छह साल तक लोकसभा टीवी के लिए संसद और सांसदों को कवर किया. दूरदर्शन में तीन साल तक बतौर एंकर काम किया.

पिछली कहानी
अगली कहानी