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निर्भया गैंगरेप से उपजे जनाक्रोश का पुलिस ने किया 'इस्तेमाल'

अनंत अस्थाना | Updated on: 22 December 2015, 17:31 IST
QUICK PILL
  • भारत में 16-18 साल के करोड़ों नाबालिगों को मिलने वाली सुरक्षा को एक झटके\r\n में हटाकर किशोर अपराधों के खिलाफ कड़े दंड का प्रस्ताव दिया जा रहा है. वर्ष 2000 में भाजपा ही इस बिल को ले आई थी.
  • साल 2009-10 तक इस विधेयक को पर्याप्त राजनीतिक स्वीकार्यता मिल गयी थी. \r\nजिसके कारण तत्कालीन यूपीए सरकार ने जुवेनाइल जस्टिस अमेंडमेंट बिल तैयार \r\nकिया.

दिल्ली में साल 2012 में चलती बस में हुए सामूहिक बलात्कार के नाबालिग दोषी की तीन साल की सज़ा 20 दिसंबर को पूरी हुई. इस ख़बर के सामने आते ही इस रिहाई के ख़िलाफ़ आवाज़ें उठने लगीं.

सवाल उठाने वालों का कहना है कि दोषी की रिहाई से पीड़ित लड़की ज्योति (पब्लिक डोमेन में निर्भया नाम से चर्चित) के अधिकारों और सामाजिक सुरक्षा की अनदेखी होती है. लेकिन सच ये है कि ऐसा नहीं है.

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भारत में 16-18 साल के करोड़ों नाबालिगों को मिलने वाली सुरक्षा को एक झटके में हटा लेने के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना ज़रूरी है. बीजेपी का ये पुराना एजेंडा है.

बहुत कम लोगों को याद होगा कि पिछली एनडीए सरकार ने ही जुवेनाइल जस्टिस एक्ट 2000 संसद में पेश किया था. इसे लाने में मुख्य भूमिका मेनका गांधी की मानी गयी थी.

एनडीए सरकार ने जुवेनाइल जस्टिस एक्ट 2000 पेश किया था. इसके पीछे मुख्य भूमिका मेनका गांधी की मानी गयी थी

प्रस्तावित विधेयक का शुरुआती मसौदा काफ़ी हद तक प्रगतिशील था. लेकिन जब ये अपने अंतिम रूप में सामने आया तो सरकारी मशीनरी के कुछ विभागों ख़ासकर पुलिस और निचली अदालतों ने इसके कुछ प्रावधानों को लेकर आशंका व्यक्त की. ऐसे लोगों की मांग थी कि नए क़ानून में बालिग माने जाने की उम्र 18 साल से घटाकर 16 की जानी चाहिए.

साल 2009-10 तक इस विधेयक को पर्याप्त राजनीतिक स्वीकार्यता मिल गयी थी. जिसके कारण तत्कालीन यूपीए सरकार ने जुवेनाइल जस्टिस अमेंडमेंट बिल तैयार किया.

बाल अधिकारों के लिए काम करने सामाजिक कार्यकर्ताओं ने बालिग माने जाने की उम्र कम किए जाने समेत प्रस्तावित विधेयक के कुछ अन्य पहलुओं पर आपत्ति जतायी.

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उसके बाद इस प्रस्तावित विधेयक के मसौदे में कुछ सकारात्मक बदलाव हुए. नए मसौदे कानूनी बन पाए इससे पहले ही यूपीए सत्ता से बाहर हो गयी और एनडीए क़रीब दस साल बाद वापस आ गयी.

जो लोग बालिग माने जाने की आयु सीमा कम करवाना चाहते थे उन्होंने अभी हार नहीं मानी थी. निर्भया सामूहिक बलात्कार मामले के बाद उन्हें अपने ख़्याल को अमलीजामा पहनाने का मौक़ा मिल गया. उन्होंने फिर से पुरानी मांग जोर-शोर से उठानी शुरू कर दी.

संसद में मेनका ने कुछ पुलिसवालों के हवाले से कहा कि 50 फ़ीसदी यौन अपराध नाबालिग करते हैं, यह पूरी तरह गलत है

मीडिया उनके लाउडस्पीकर के रूप में काम करता नज़र आने लगा. निर्भया मामले में शामिल किशोर की भूमिका को बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया गया ताकि आयु सीमा घटाने के पक्ष में जनमत तैयार किया जा सके.

एनडीए सरकार का प्रस्तावित विधेयक लोकसभा में पारित हो चुका है. अभी तक इसे राज्यसभा में मंजूरी नहीं मिली है. विधेयक के समर्थक मान रहे हैं राज्यसभा इस विधेयक की राह में अड़ंगा लगा रही है.

ये हैरत की बात है कि जिस मेनका गांधी को मौजूदा किशोर कानून का कर्ता-धर्ता माना जाता है उन्हीं मेनका गांधी ने राज्यसभा में यह प्रतिगामी जुवेनाइल जस्टिस बिल 2015 पेश किया है.

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इस एक कानून के पारित होने की सूरत में भारत ने बाल संरक्षण के क्षेत्र में पिछले 150 सालों में जो कुछ हासिल किया है वह सब खत्म हो जाएगा. ये बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत महिलाओं के संरक्षण की अपनी जिम्मेदारी बच्चों के सिर डाल रहा है.

निर्भया सामूहिक बलात्कार मामले के बाद भारतीय सुप्रीम कोर्ट में जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के ख़िलाफ़ याचिकाओं की बाढ़ आ गयी. एनजीओ प्रयास से जुड़े पूर्व आईपीएस अफ़सर अमोद कंठ ने मामले में हस्तक्षेप किया. उन्होंने तर्क दिया कि ऐसे किशोर अपराध मामलों का सकारात्मक हल आफ्टरकेयर प्रोग्राम के विस्तार के माध्यम से ही संभव है.

दुखद है कि उनकी बात किसी ने नहीं सुनी. सुधार विधेयक में 'आफ़्टरकेयर' के नाम पर महज 'एक बार वित्तीय मदद' का प्रावधान है. वो भी सिर्फ ऐसे किशोरों को जो चाइल्ड केयर होम से निकले हों.

जो लोग विधेयक का विरोध कर रहे हैं उन्हें बलात्कार पीड़िता के अधिकारों का विरोधी बताया जा रहा है.

'जुवेनाइल जस्टिस' और 'बाल संरक्षण' से जुड़े कानून का जिन लोगों पर असर होगा वो राजनीतिक रूप से प्रभावी नहीं है क्योंकि भारत में वोट देने के लिए न्यूनतम उम्र 18 साल है. शायद इसीलिए नाबालिगों से जुड़े कानून भारतीय कानून निर्माताओं की प्राथमिकता में नहीं है.

अमेरिका में 1980 के दशक में ऐसे ही माहौल में कड़े जुवेनाइल कानून बनाए गये जिनका खमियाजा वहां के बच्चों को भोगना पड़ा

सच्चाई ये है कि सरकार की छह सालों की उपेक्षा को देखने के बाद ऊपरी न्यायालय ने इस मामले में हस्तक्षेप किया. साल 2006 में पहली बार चीफ़ जस्टिसों की कांफ्रेंस में जुवेनाइल जस्टिस का एजेंडा शामिल किया गया. ये बैठक हर तीन साल पर होता है.

साल 2006 के बाद से लगभग सभी हाईकोर्ट ने और अब सुप्रीम कोर्ट ने भी जुवेनाइल जस्टिस लॉ की निगरानी के लिए जजों के पैनल नियुक्त किए हैं. भारतीय अदालतें नाबालिगों को मामले में ज़रूरी संवेदनशीलता और पारदर्शिता बनाए रखने के लिए सरकार पर दबाव बनाती रही हैं.

निर्भया मामले के बाद उभरे जनाक्रोश का लाभ लेने के लिए अब सरकार इस संवेदनशील मामले पर तुरत-फुरत नया कानून बना देना चाहती है.

मीडिया भी इसमें सरकार की मदद कर रहा है. शायद दोनों को इस कानून के दूरगामी प्रभावों को अंदाजा नहीं है. ऐसी स्थिति में हमें इतिहास से थोड़ा सबक लेना चाहिए. 1980 के दशक में अमेरिका में कुछ रुढ़िवादी बुद्धिजीवियों, मीडिया और जनभावनाओंके दबाव के चलते किशोर न्याय व्यवस्था में प्रतिगामी बदलाव किए गये. उस समय भी कड़ा कानून न बनने की स्थिति में किशोर अपराधों में आने वाली बाढ़ का तर्क दिया गया था.

किशोर अपराधों की जिस बाढ़ की बात की जा रही थी वो अमेरिका में कभी नहीं आयी लेकिन अमेरिकी बच्चों को इसका गंभीर परिणाम भुगतना पड़ा.

साल 2011-12 में दिल्ली हाई कोर्ट ने तिहाड़ जेल से क़रीब 200 बच्चों को छोड़ने का आदेश दिया था

इस समय भारतीय राजनेता इस पूरे मामले की गहरायी को समझ नहीं पा रहे हैं. वो उन लोगों पर यकीन कर बैठे हैं जो लोककल्याण से जुड़े कानूनों को गैर-जरूरी बताते हैं.

लोकसभा में संशोधन विधेयक पर बहस करते हुए मेनका ने बताया था कि उनके पद ग्रहण करने के कुछ समय बाद ही कुछ पुलिस अधिकारी उनसे मिलने आए. उन्होंने उन्हें बताया कि "50 प्रतिशत यौन अपराध नाबालिग करते हैं."

आंकडों से साफ़ है कि इस धारणा का सच्चाई से दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं है. सवाल ये है कि आखिर पुलिस महकमे के कुछ लोग मौजूदा प्रावधान को लेकर इतना असहज क्यों है.

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किसी नाबालिग को किशोर न्याय व्यवस्था के तहत संरक्षण दिलाने का मुख्य दायित्व पुलिस का है. लेकिन पुलिस लोक कल्याण के इस कार्य के प्रति अनिच्छुक है. इसीलिए पूरे देश में कई पुलिसवाले नाबालिगों को भी बालिगों के लिए बनायी गयी न्याय व्यवस्था में धकेलते नज़र आते हैं.

कई नाबालिगों को जुवेनाइल जस्टिस सिस्टम के तहत मामला चलाए जाने के लिए लम्बी लड़ाई लड़नी पड़ती है. जिनके पास ऐसी कानूनी ल़ड़ाई लड़ने की हिम्मत और संसाधन नहीं होते वो जेल में सड़ते हैं.

निर्भया मामले में जब जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ने अभियुक्त को 'किशोर' करार दिया तो पुलिस ने उसके ख़िलाफ़ आगे अपील नहीं की

साल 2011-12 में दिल्ली हाई कोर्ट ने स्वतःसंज्ञान लेते हुए दिल्ली की तिहाड़ जेल से क़रीब 200 बच्चों को छोड़ने का आदेश दिया. अदालत ने पुलिस को इन बच्चों को जेल भेजने वाले 182 पुलिसवालों पर कार्रवाई करने के लिए भी मजबूर किया.

जब देश की राजधानी में बाल अधिकारों की हालात ऐसी है तो बाक़ी हिस्से में इसकी स्थिति की बस कल्पना की जा सकती है.

निर्भया मामले को लेकर भड़के जनाक्रोश को पुलिस ने एक मौक़े की तरह देखा. हमने देखा कि पुलिस 'सूत्रों' के हवाले से मीडिया में नाबालिगों के अपराध में शामिल होने पर बढ़ा-चढ़ा कर दावे किए गये.

नाबालिगों के बारे में छपी ऐसी ज़्यादातर ख़बरें सच से दूर होती हैं लेकिन जनता में एक उन्माद पैदा करने में सफल रहती हैं. इनका मक़सद भी यही होता है. नाबालिगों द्वारा किए जाने वाले अपराधों की 'संख्या के बढ़ते जाने' की ख़बरों के बीच आम नागरिकों को इसपर ठहर कर सोचने का मौक़ा ही नहीं मिलता.

निर्भया मामले में दोषी नाबालिग को जब जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ने 'किशोर' घोषित किया तो पुलिस ने उस फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील नहीं की थी. जुवेनाइल मामलों को देखने वाला कोई भी अनुभवी वकील पुलिस के इस फैसले पर चकित होगा.

बलात्कार और हत्या से जुड़े ज़्यादातर मामलों में किसी किशोर अभियुक्त के बालिग-नाबालिग होने का दावा कोर्ट में लम्बा खिंचता है. उम्र निर्धारण से जुड़े कानून और प्रक्रिया काफी उलझी हुई और अस्पष्ट है. ऐसे में कई बार एक अपील भर से जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड का फ़ैसला पलट जाता है.

पुलिस ने निर्भया मामले से उपजे जनाक्रोश का इस्तेमाल मौजूदा जुवेनाइल जस्टिस सिस्टम में बदलाव कराने के लिए किया

एक मामले में जेल में 13 साल गुजारने के बाद एक अभियुक्त ये साबित कर पाया कि घटना के वक़्त वो नाबालिग था. ऐसे ही एक नाबालिग को उम्र क़ैद की सज़ा हो गया जबकि वो अदालत में ये साबित करता रहा कि वो घटना के वक़्त नाबालिग था.

फिर पुलिस ने इस मामले में जुवेनाइल बोर्ड के फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील क्यों नहीं की? क्योंकि अगर अभियुक्त को अदालत बालिग घोषित कर देती तो जुवेनाइल जस्टिस के ख़िलाफ़ आक्रोश नहीं पैदा होता.

पुलिस ने इस मामले को एक नज़ीर बनाया जिसकी मदद से आम लोगों की नज़र में जुवेनाइल जस्टिस के ख़िलाफ़ माहौल बनाया जा सका. उनकी ये रणनीति कामयाब रही.

सोमवार को राज्यसभा में कई राजनीतिक पार्टियां संसोधन विधेयक के समर्थन में उभरे जन उन्माद के आगे झुकती दिखीं. ऐसा लगने लगा है कि ये संसोधन विधेयक राज्यसभा में भी पारित हो जाएगा.

अगर ऐसा होता है तो ये बहुत बड़ी भूल होगी. भारत में बाल अधिकारों पर ये कुठाराघात होगा. इससे सरकारें अपरिपक्व बच्चों के प्रति अपनी जिम्मेदारी से आसानी से छुटकारा पा जाएंगी. और इससे बड़ी त्रासदी क्या होगी कि ये सब 'न्याय' के नाम पर हो रहा है.

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First published: 22 December 2015, 17:31 IST
 
अनंत अस्थाना @9_asthana

पेशे से वकील हैं. किशोरों से जुड़े मामलों के विशेषज्ञ.

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