Home » इंडिया » Why is Nitish backing Modi on note ban? It's political opportunism
 

दिल्ली की कुर्सी के लिए क्या समाजवाद क्या दक्षिणपंथ

आशुतोष | Updated on: 9 December 2016, 7:53 IST
(फाइल फोटो)

मैं काफी समय से नीतीश कुमार को जानता हूं. मैंने उन्हें हमेशा रहस्यमय पाया है, बल्कि उनकी चुप्पी भी पहेली रही है. एक बार मैं उनके दूसरे कार्यकाल के विधानसभा चुनावों के दौरान टीवी के लिए उनका इंटरव्यू ले रहा था. मैंने उनसे पूछा, ‘आप पूरी जिंदगी सांप्रदायिक ताकतों के विरुद्ध लड़ते रहे हैं और अब अपनी सरकार चलाने के लिए भाजपा के साथ गठबंधन कर लिया?’ वे इस सवाल पर सहज नहीं थे. 

इंटरव्यू के बाद जब हम अनौपचारिक बातचीत कर रहे थे, उन्होंने माना कि उनके पास और कोई विकल्प नहीं था. मुझे मरहूम रामकृष्ण हेगड़े की याद हो आई, उनसे भी मैंने यही सवाल किया था, जब उन्होंने अपनी पार्टी बनाई थी और भाजपा के साथ गठबंधन किया था. उन्होंने साफ माना कि उस समय देवगौड़ा प्रधानमंत्री बन गए थे और उन्हें जनता दल से बाहर कर दिया गया था. तब उनके पास अपने राजनीतिक करियर को बचाने के लिए कोई विकल्प नहीं था, सिवाय भाजपा के पास जाने के. 

दोनों नेता भारतीय राजनीति की समाजवादी परंपरा से थे. दोनों ही भाजपा की सांप्रदायिक राजनीति की मन ही मन मुख़ालिफ़त करते थे. आरएसएस के विचारों से नफरत करते थे क्योंकि उसकी कोशिश सांप्रदायिकता के आधार पर विभाजन करने की रहती है. पर समाजवाद का क्षय और पार्टी के विघटन के बाद दोनों अपने वैचारिक मतभेद वाली पार्टी से जुड़ गए. यह भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी त्रासदी है. 

आज एक बार फिर नीतीश कुमार भाजपा की ओर मुड़ते नज़र आ रहे हैं. हालांकि अभी देखना है कि यह महज दिखावा है या एक नया गठबंधन आकार ले रहा है. नितीश आज प्रधानमंत्री मोदी की नोटबंदी की नीति की खुलकर तारीफ कर रहे हैं, जबकि विपक्ष के सभी नेता सोच रहे थे कि वे इस कदम का विरोध करेंगे. ममता बनर्जी ने उन्हें ‘गद्दार’ बताया. पर उन पर कोई असर नहीं हुआ.

शतरंज का खिलाड़ी

नीतीश को मैं जानता हूं, इसलिए कह सकता हूं कि वे ऐसे राजनेता हैं, जो कभी जल्दबाजी में फैसले नहीं लेते. वे एकदम शांत और सुनियोजित हैं. उनके फैसले हमेशा सोचे-समझे होते हैं. वे हर पहलू को परखते हैं और कुछ भी कहने से पहले, अगले दो कदमों का पहले से अनुमान लगा लेते हैं. वे शतरंज के खिलाड़ी की तरह अपनी चाल चलते हैं. इसलिए इस तथ्य का खंडन करता हूं कि प्रधानमंत्री मोदी की नोटबंदी की तारीफ उनका भिन्न व्यवहार है. 

नीतीश के मोदी के साथ बहुत ही उदासीन रिश्ते रहे हैं, बावजूद इसके कि वे बिहार में भाजपा के सहयोग से सरकार चला रहे थे. तब भी जब वे वाजपेयी सरकार में कैबिनेट मंत्री थे. लालू यादव से अलग होने और जॉर्ज फर्नांडीस के साथ समता पार्टी बनाने के बाद, नब्बे के दशक की शुरुआत में उन्होंने राज्य में भाजपा के साथ जाली गठबंधन किया. और जब भाजपा ने केंद्र में सरकार बनाई, एनडीए में शामिल हो गए.

जॉर्ज फर्नांडीस वरिष्ठ सदस्य और नीतीश के मेंटॉर थे और सबसे ज्यादा भरोसेमंद. अटल बिहारी वाजपेयी के खास संकटमोचक. नीतीश उनकी छाया में रह रहे थे, पर सत्ता के फल का आंनद ले रहे थे. हालांकि वे लालू यादव, राम विलास पासवान और शरद यादव जैसे अपने दोस्तों से काफी पीछे थे. उनके ये दोस्त नब्बे की शुरुआत और बाद में भी मंडल आयोग की वजह से उनसे ज्यादा चर्चा में थे.

फिर भी नीतीश के साथी उन्हें बहुत मानते थे. नितीश की नजर शुरू से बिहार पर थी और वे लालू की जगह मुख्यमंत्री बनना चाहते थे. उस समय लालू अन्य पिछड़ी जातियों के ‘डार्लिंग’ थे और उनकी अल्पसंख्यकों के साथ सीधी राजनीतिक केमिस्ट्री थी. उन्हें हटाना किसी के लिए आसान नहीं था. 

लालू ने बिहार पर 15 साल राज किया और नितीश को मौका नहीं मिला. वे इतने बेकरार थे कि उन्होंने भाजपा के साथ मिलकर तख्तापलट किया और मुख्यमंत्री बन गए, पर केवल एक हफ्ते के लिए क्योंकि विधानसभा में बहुमत के लिए पर्याप्त विधायकों की संख्या नहीं हो सकी. 

पर उसके बाद बिहार में लालू के लिए नाराजगी शिखर पर थी. नीतीश के आने से कानून और व्यवस्था की पुनर्स्थापना हुई, हाइवे और अंदरूनी इलाकों में सडकें नजर आने लगीं. बिहार फिर से मोटर चलाने लायक हो गया, साइकिल चलातीं युवतियां बिहार का नया प्रतीक बन गई थीं. गांवो में उजाड़ पड़े स्वास्थ्य केंद्रों में लोगों की भीड़ और डॉक्टरों से चहल-पहल रहने लगी.

नीतीश उम्मीद की किरण बन कर आए. पत्रकार के तौर पर मैंने कई चुनावों को कवर किया है, पर जिस तरह का समर्थन नीतीश को मिला, ऐसा मैंने कहीं नहीं देखा. 

आलोचकों का टोटा

2010 में बिहार विधानसभा चुनावों में मैं राज्यभर में घूमा. मुझे एक भी शख्स ऐेसा नहीं मिला, जो नितीश की आलोचना करता हो. मुझे कुछ लोग ऐसे जरूर मिले, जो उनकी सरकार और उसके काम से खुश नहीं थे, पर व्यक्ति के तौर पर नितीश की आलोचना करने वाला कोई नहीं था. उन्हें ऐसी शख्सियत माना जा रहा था, जिन्होंने लालू यादव राज के अंधेरे युग से बिहार को बाहर निकाला. उनका भाजपा के साथ गठबंधन सही और मजबूत चल रहा था. पर 2014 के चुनावों में उन्होंने अपनी किस्मत अकेले आज़मानी चाही. 

संकेत दिया कि अगर मोदी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बने, तो उनके लिए भाजपा के साथ बने रहना असंभव होगा. और उन्होंने जो कहा, वही किया. लोगों ने सोचा कि नीतीश केंद्र में मोदी के धर्मनिरपेक्ष के विकल्प के तौर पर खुद को लाने की कोशिश कर रहे हैं, अगर 2014 के फैसले से त्रिशंकु संसद बनती है तो. यह भी सोचा गया कि भाजपा के साथ आठ साल सरकार चलाने के बाद वे उससे मुक्ति चाहते हैं और स्वतंत्र सरकार चलाना चाहते हैं.

लोकसभा चुनावों में मोदी की जीत हुई और नीतीश ने अपनी मूर्खता महसूस की. उन्होंने महसूस किया कि उनके लिए अपने बल पर सत्ता में आना असंभव होगा. उन्होंने तुरंत लालू यादव को गले लगाया, जो दो दशक तक कट्टर दुश्मन रहे थे. वे नितांत प्रैक्टिकल थे. मीडिया उनके खिलाफ हो गई. कहा, ये खुद को खत्म कर रहे हैं. उनकी पूरी राजनीति लालू यादव के घोर विरोध की रही है. उन्होंने हमेशा खुद को भ्रष्टाचार का जबरदस्त विरोधी बताया है. और लालू तो भ्रष्टाचार के पर्याय थे और जेल में रहे. 

पर इस बार नीतीश ने बिहार में मोदी का घोर विरोध किया और शानदार बहुमत से वापसी की. दिल्ली के बाद यह मोदी की दूसरी बड़ी हार थी. बिहार में जीतने के बाद वे अपने पंख पूरे भारत में फैला रहे थे. उन्होंने मोदी के विरोधी दलों के साथ महागठबंधन किया. उन्होंने विपक्ष की पार्टियों और नेताओं के साथ बैठकें और रैलियां रखीं.

दिल्ली की इच्छा

तो इस तरह मोदी के विरोध में उनका यह अचानक यू-टर्न, आकस्मिक घटना थी. क्या वे वाकई मोदी की ओर रुख कर सकते हैं? क्या वे धर्मनिरपेक्ष गुट से नाउम्मीद हो गए हैं? या वे अपनी भ्रष्टाचार विरोधी मुजाहिद की छवि को बचाने की कोशिश कर रहे हैं, जो लालू यादव के साथ गठबंधन से खराब हो गई थी.

सरकार बनाने के बाद कानून और व्यवस्था को लेकर उनकी मीडिया में खिंचाई हुई, जो उनके शुरुआती अवतार का सशक्त पहलू था. या वे खुद को फिर से ऐसा नेता बनाना चाहते हैं, जो दोनों पार्टियों को मान्य हो, 'भाजपा विरोधी और कांग्रेस-विरोधी वामपंथी.'

नीतीश की इच्छा राष्ट्रीय भूमिका की है और अगर 2019 में वे मुख्यमंत्री बनते हैं, तो उन्हें 13 साल हो जाएंगे. उनका मानना है कि शिखर पर पहुंचने के लिए उनमें सारी जरूरी चीजें हैं. मोदी की तरह ही वे खुद को साफ-सुथरा, भष्टाचार का कोई दाग नहीं होने का दावा कर सकते हैं. वे सोचते हैं कि उन्होंने खुद को श्रेष्ठ प्रशासक सिद्ध किया है. वे बिहार की तस्वीर बदलने का दावा कर सकते हैं. 

वे अक्सर कहते हैं कि बिहार से ज्यादा गुजरात पर राज करना आसान है. उनका सीधा-सा तर्क है. जब मोदी मुख्यमंत्री बने, गुजरात पहले से विकसित राज्य था इसलिए गुजरात को और आगे ले जाना बड़ी बात नहीं थी, पर बिहार को प्रगति की राह पर वापस लाना बहुत मुश्किल था और उन्होंने उसे गर्व से किया. 

वे यह भी दावा करते हैं कि उनका विकास का मॉडल मोदी के उलट सबको साथ लेकर चलता है. वे यह भी कहते हैं कि भाजपा के साथ उनका प्रेम होने के बावजूद उन्होंने बिहार को गुजरात की तरह सांप्रदायिक आग में नहीं झोंका, जैसा कि 2002 में मोदी के राज में हुआ. वे इसका दावा भी करते हैं कि उन्हें गठबंधन सरकार चलाने का खुद पर भरोसा है और वे राजनीति के दोनों रंगों के साथ चले, 'हिंदुत्व के साथ भी और धर्मनिरपेक्ष के साथ भी.' 

जहां तक मैं नीतीश को जानता हूं, तो आत्मविश्वास के साथ कह सकता हूं कि उनका हाल का उदाहरण लालू और उसके परिवार को मैसेज देने तक सीमित नहीं है. यह मैसेज बिहार की सीमाओं से परे और लोगों के लिए भी है. वे खुद को राष्ट्रकर्मी के रूप में पेश कर रहे हैं, जो आधुनिक राजनीति की संकुचित और दिखावे की सोच से मजबूर नहीं है. वे डेमोक्रेट हैं, जिनकी किसी से कोई दुर्भावना नहीं है. वे मोदी के साथ भी काम कर सकते हैं, जिनके साथ कड़वाहट और वैचारिक मतभेद का इतिहास रहा है.

उनकी रणनीति बिलकुल राजनीतिक है, विशाल हृदय के वेश में अवसरवादी. दोनों हाथों में लड्डू रखना चाहते हैं. और इस कला में वे माहिर हैं. वे बिहार के तीसरी बार मुख्यमंत्री बने, बावजूद इसके कि उनकी पार्टी का विस्तार एक चौथाई है. 

वे जानते हैं कि अगर मोदी को 2014 जैसा बहुमत नहीं मिलता है, तो उन्हें 2019 में दोनों विकल्प मिल सकते हैं. वे खुद को त्रिशंकु संसद के लिए तैयार कर रहे हैं. पर सवाल यह है कि क्या वे एच.डी.देवगौड़ा की तरह खुशकिस्मत होंगे? पर राजनीति में सबकुछ संभव है. खुद को भविष्य के लिए तैयार करने में कुछ गलत नहीं है.

First published: 9 December 2016, 7:53 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी