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शहाबुद्दीन की जेल वापसी: एक माफ़िया की धमकी चुनी हुई सरकार का नुकसान कर सकती है

अभिषेक पराशर | Updated on: 2 October 2016, 7:40 IST
QUICK PILL
  • राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के पूर्व सांसद और माफिया सरगना शहाबुद्दीन की जमानत खारिज होने की राजनीतिक कीमत जेडीयू को चुकानी पड़ सकती है.
  • शहाबुद्दीन के करीब दो हफ्तों तक जमानत पर बाहर रहने और फिर जेल जाने का सीधा फायदा आरजेडी को होता दिख रहा है. महागठबंधन की सरकार बनने के बाद मुस्लिम वोट बैंक को सरकार में उप-मुख्यमंत्री या फिर विधानसभा अध्यक्ष पद की उम्मीद थी. 
  • लेकिन लालू प्रसाद यादव ने अपने बेटे तेजस्वी यादव को उप-मुख्यमंत्री बनाकर मुस्लिम मतदाताओं की उम्मीदों को खत्म कर दिया. राजनीतिक लाभ की उम्मीद में मुस्लिमों का एक धड़ा स्वाभाविक कारणों से जेडीयू की तरफ झुकने लगा था जो अब फिर से आरजेडी की तरफ आ चुका है.

राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के पूर्व सांसद और माफिया मोहम्मद शहाबुद्दीन की जमानत खारिज होने की राजनीतिक कीमत जेडीयू को चुकानी पड़ सकती है. राजीव रौशन हत्याकांड में करीब 11 साल जेल में रहने के बाद जमानत पर रिहा होते ही शहाबुद्दीन ने नीतीश कुमार को निशना बनाते हुए उन्हें 'परिस्थितियों का मुख्यमंत्री' बताते हुए अपना नेता मानने से इनकार कर दिया था.

पटना हाईकोर्ट द्वारा शहाबुद्दीन को जमानत दिए जाने के बाद नीतीश कुमार चौतरफा राजनीतिक हमले से घर गए औऱ फिलहाल वे बचाव की मुद्रा में थे. 

विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली महागठबंधन की सरकार पर शहाबुद्दीन को जमानत दिए जाने का रास्ता बनाने का आरोप लगाया. बिहार सरकार द्वारा तत्काल शहाबुद्दीन की जमानत का विरोध नहीं किए जाने के फैसले ने विपक्ष के आरोपों को बल दिया.

बिहार सरकार को उस वक्त बेहद शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा जब सीनियर एडवोकेट प्रशांत भूषण ने शहाबुद्दीन की जमानत को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का फैसला लिया. बिहार सरकार जब शहाबुद्दीन की जमानत या फिर उसके खिलाफ सीसीए (क्राइम कंट्रोल एक्ट) लगाने के बारे में विचार ही कर रही थी तभी प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट में माफिया से नेता बने मोहम्मद शहाबुद्दीन की जमानत को चुनौती देने की घोषणा कर दी. 

मजबूरी में बिहार सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में उसकी जमानत का विरोध करने का फैसला लिया और अब कोर्ट के जमानत रद्द किए जाने के बाद शहाबुद्दीन फिर से जेल पहुंच चुका है.

शहाबुद्दीन के करीब दो हफ्तों तक जमानत पर बाहर रहने और फिर जेल जाने का सीधा राजनीतिक फायदा आरजेडी को होता दिख रहा है. महागठबंधन की सरकारर बनने के बाद मुस्लिम वोट बैंक को सरकार में उप-मुख्यमंत्री या फिर विधानसभा अध्यक्ष पद की उम्मीद थी. 

लेकिन लालू प्रसाद यादव ने अपने बेटे तेजस्वी यादव को उप-मुख्यमंत्री बनाकर मुस्लिम मतदाताओं की उम्मीदों को खत्म कर दिया. महागठबंधन को मिली ऐतिहासिक जीत में सबसे बड़ी भूमिका मुस्लिम और यादव वोट बैंक की थी और चुनाव बाद की स्थिति में मुस्लिम मतदाताओं के हाथ कुछ खास नहीं लगा है.

पटना के एक वरिष्ठ पत्रकार बताते हैं, 'नई सरकार बनने के बाद मुस्लिम मतदाता लालू यादव से खिन्न थे. सरकार के मौजूदा स्वरूप में मुसलमानों की स्थिति से मुस्लिमों का एक बड़ा हिस्सा नाराज था जो नीतीश कुमार की तरफ झुकने लगा था.' 

ऐसे में शहाबुद्दीन को जब जमानत मिली तो उसने सबसे पहले यह बयान दिया कि उसके नेता लालू प्रसाद हैं. शहाबुद्दीन के इस बयान से मुस्लिम मतदाताओं में आरजेडी को लेकर ध्रुवीकरण हुआ. इसके अलावा भी लालू यादव ने मुस्लिमों की नाराजगी को भांपते हुए शहाबुद्दीन को पार्टी का महासचिव नियुक्त किया था. शहाबुद्दीन के बयान से यह साफ हो गया कि वो सरकार के साथ नहीं बल्कि लालू प्रसाद यादव के साथ हैं. 

शहाबुद्दीन के करीब दो हफ्तों तक जमानत पर बाहर रहने और फिर जेल जाने का सीधा फायदा आरजेडी को होता दिख रहा है

करीब दो हफ्तों तक बाहर रहने के दौरान शहाबुद्दीन ने कई बार नीतीश कुमार पर निशाना साधा. यहां तक कि जमानत रद्द होने के बाद जब उसने आत्मसमर्पण किया तो यह कहने में देर नहीं लगाई, 'हमारे समर्थक नीतीश कुमार को जवाब देंगे.'

उन्होंने कहा कि शहाबुद्दीन ने करीब 20 दिनों के भीतर छिटक रहे मुस्लिम मतदाताओं को आरजेडी के पक्ष में एकजुट कर दिया. उसने यह साफ कर दिया कि बिहार में मुस्लिमों की एक ही पार्टी है और लालू यादव की आरजेडी.

छवि और वोट दोनों का नुकसान

शहाबुद्दीन के जमानत पर बाहर आने से लेकर सुप्रीम कोर्ट में जमानत रद्द होने तक आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद इस मामले में बोलने से बचते रहे. वहीं उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने भी शहाबुद्दीन मामले में कुछ बोलने से परहेज किया.

आरजेडी के रुख से साफ हो गया कि शहाबुद्दीन की जमानत के खिलाफ की जाने वाली कार्रवाई नीतीश कुमार की कार्रवाई होगी और उसमें आरजेडी की सहमति नहीं होगी. यही वजह रही कि अटकलों के बावजूद शहाबुद्दीन के खिलाफ नीतीश कुमार ने सीसीए नहीं लगाया. 

सीसीए लगने की स्थिति में लालू यादव को अपना बचाव करना मुश्किल होता कि सरकार के फैसले में उनकी सहमति नहीं है. इसलिए बीच का रास्ता निकालते हुए जमानत को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का फैसला लिया गया. 

प्रशांत भूषण की घोषणा के बाद बिहार सरकार के लिए सुप्रीम कोर्ट में जाने का रास्ता आसान हो गया. सरकार यह बता सकती थी कि हमारे पास इसके अलावा कोई रास्ता नहीं था. यह स्थिति लालू यादव के लिए ज्यादा फायदेमंद रही क्योंकि सुप्रीम कोर्ट में सरकार की अपील के बाद पार्टी की तरफ से किसी हस्तक्षेप की उम्मीद नहीं की जा सकती.

वहीं नीतीश कुमार के इस फैैसले से पास आते मुस्लिम मतदाता एक बार फिर से लालू यादव के पक्ष में जा खड़ा हुआ. दूसरा लोगों के बीच यह संदेश गया कि नीतीश कुमार अब बड़े फैसले नहीं ले सकते. 

इस पूरे प्रकरण में बीजेपी को भी लोगों के बीच अपनी पैठ मजबूत करने में मदद मिली. बीजेपी ने शुरू से ही शहाबुद्दीन के खिलाफ मोर्चा खोले रखा. बीजेपी शहाबुद्दीन के खिलाफ सीसीए लगाए जाने की मांग करती रही थी. 

सरकार अगर शहाबुद्दीन के खिलाफ सीसीए लगाती तो इसका फायदा बीजेपी को होता. हालांकि सुप्रीम कोर्ट में भी शहाबुद्दीन केे जमानत रद्द किए जाने का लाभ उसे मिला क्योंकि वह इस मसले को सरकार पर बेहद हमलावर थी. 

नीतीश की निजी दुश्मनी

बेशक नीतीश कुमार ने शहाबुद्दीन की जमानत के खिलाफ जाकर अपनी सुशासन की छवि को फिर से मजबूूत करने की कोशिश की है. लेकिन इस सच से इनकार नहीं किया जा सकता कि कुमार के सुशासन वाली छवि की सबसे अधिक कीमत शहाबुद्दीन को चुकानी पड़ी थी. 

2000 के विधानसभा चुनाव में आरजेडी को 124 सीटें मिली थीं जबकि एनडीए को 121. कांग्रेस को इस चुनाव में 23 सीटें मिली थी और वह किंगमेकर की भूमिका में थी. 

27 फरवरी 2000 को एनडीए ने नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया और फिर राज्यपाल ने नीतीश कुमार को सरकार बनाने का निमंत्रण दे डाला. सबसे बड़ी पार्टी होने की वजह से आरजेडी ने इसका विरोध किया. पार्टी ने इसके खिलाफ राज्य में बंद का आह्वान किया और इस दौरान कई जगह हिंसा भी हुई. 

यहीं से शहाबुद्दीन की भूमिका शुरू हुई और वह नीतीश की राह में रोड़ा बन गए. सात दिनों की नीतीश सरकार विधानसभा में विश्वासमत हासिल नहीं कर पाई और इसकी वजह रहे शहाबुद्दीन. 

शहाबुद्दीन ने पटना के पाटलिपुत्र होटल में कांग्रेस के सभी विधायकों को बंधक बना लिया था. कुछ कांग्रेसी विधायकों ने वहां से निकलने की कोशिश की लेकिन सिवान से आए शहाबुद्दीन के गुंडों ने उन्हें निकलने नहीं दिया. नीतीश कुमार को आखिरकार मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा.

2005 में जब एनडीए की सरकार आई और नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने अपराधियों के खिलाफ तेज गति से ट्रायल की शुरुआत को प्राथमिकता पर रखा. शहाबुद्दीन के खिलाफ करीब 30 मामलों में सुनवाई शुरू हुई. 

कुमार के पहले 10 सालों के कार्यकाल में लोग शहाबुद्दीन का नाम तक भूल गए. महागठबंधन की सरकार बनने के बाद शहाबुद्दीन जेल से बाहर आया लेकिन 20 दिनों के भीतर ही उसे फिर से जेल जाना पड़ा.

नितीश कुमार के साथ अपनी निजी खुन्नस का मुजाहिरा शहाबुद्दीन ने जेल से निकलने के बाद दो मौकों पर किया. जेल जाते-जाते भी उन्होंने नीतिश कुमार को चुनौती दे दी. यह गठबंधन की राजनीति में शामिल दो दलों की भाषा न होकर विपक्षी की भाषा थी.

नितीश इस चुनौती से कैसे निपटेंगे, देखना दिलचस्प होगा. शहाबुद्दीन के जेल से आने औऱ जाने के बीच सबसे अअधिक उनकी प्रतिष्ठा धूमिल हुई है.

First published: 2 October 2016, 7:40 IST
 
अभिषेक पराशर @abhishekiimc

चीफ़ सब-एडिटर, कैच हिंदी. पीटीआई, बिज़नेस स्टैंडर्ड और इकॉनॉमिक टाइम्स में काम कर चुके हैं.

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