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कश्मीरियों को भारत पर भरोसा क्यों नहीं?

तपन बोस | Updated on: 24 August 2016, 7:35 IST

मैं अखबारों के संपादकीय पृष्ठ पर कश्मीरी युवकों द्वारा किए जा रहे आंदोलन से जुड़े लेख हर दिन पढ़ रहा हूं. ये युवक सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम (अफ्स्पा) के साये में पले बढ़े हैं. ज्यादातर लेखों में कश्मीरी युवाओं में अलगाववाद की बात की जाती है लेकिन वे अक्सर इस बारे में बात करना भूल जाते हैं कि इस अलगाववाद की वजह क्या है?

ज्यादातर लेखक इस बात पर सहमत दिखाई देते हैं कि इन हिंसक आंदोलनों पर नियंत्रण हो और सशस्त्र बलों की मदद से ये आंदोलन शांतिपूर्ण ढंग से खत्म कर दिए जाएं, लेकिन मुझे लगता है कि सेना का इस्तेमाल करना इन युवकों को और अधिक अलग-थलग कर देगा.

अफ्स्पा कानून के तहत सशस्त्र बलों को असीमित अधिकार मिल जाते हैं, एक प्रकार से वे जनता पर किसी भी तरह की कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र हो जाते हैं. इससे आम कश्मीरी युवा बुरी तरह हताश हैं और इसी वजह से आज ‘मरो या मारो के संघर्ष’ पर उतारू हैं. 

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इन विरोध प्रदर्शनों को ‘हिंसा’ और ‘पाक प्रायोजित आतंकवाद’ की संज्ञा दी जा रही है. ऐसा कहकर एक तरह से सच्चाई से ही मुंह मोड़ा जा रहा है और कश्मीर के आज के इस हालात की असल वजह को समझने की कोशिश ही नहीं की जा रही.

वे ऐसी हालत में जी रहे हैं कि उनके साथ कभी भी कुछ भी हो सकता है और कोई उनकी मदद के लिए आगे नहीं आएगा

मैंने 20-30 साल की आयु के कुछ कश्मीरी युवाओं से बात की. एक युवक ने कहा, ‘वे ऐसी हालत में जी रहे हैं कि उनके साथ कभी भी कुछ भी हो सकता है और कोई उनकी मदद के लिए आगे नहीं आएगा.'

1990 से 1996 के बीच का दौर याद आता है. लोग कहते हैं उस दौर में सेना बेधड़क लोगों के घर, दुकान या आॅफिस में घुस जाया करती थी, बिना किसी वजह के लोगों को पीटना, कथित तौर पर औरतों के साथ मारपीट और शोषण के भी आरोप उस पर लगे. 

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इस दौरान युवकों को उठाकर ले जाने के कई आरोप सेना पर लगे, इनमें से कई तो वापस ही नहीं आए. इन युवकों ने ऐसे दिन भी देखे हैं, जब उनकी मांएं उनके पिता और भाइयों को ढूंढा करती थी और वो कभी मिले ही नहीं. कश्मीरियों की मौजूदा पीढ़ी ने अब तक भारत का ज्यादातर यही चेहरा देखा है.

वे भारतीय राजनेताओं पर विश्वास नहीं करते. उन्होंने देखा है कि बख्शी गुलाम मोहम्मद से लेकर मेहबूबा मुफ्ती तक कैसे कश्मीरी मूल के नेता नई दिल्ली के हाथों की कठपुतली बने हुए हैं. वे इतिहास से अच्छी तरह वाकिफ हैं. वे जानते हैं कि वे जवाहर लाल नेहरू ही थे, जिन्होंने अब्दुल्ला-नेहरू समझौता या 1952 का ‘नई दिल्ली समझौता’ लागू करने की मांग करने वाले शेख अब्दुलला को जेल में डाल दिया था. 

उन्होंने यह भी देखा है कि 1987 में फारुख अब्दुल्ला ने पुनः सत्ता में लौटने के लिए कैसे कांग्रेस से हाथ मिला लिया था जब इंदिरा गांधी द्वारा भेजे गए राज्यपाल जगमोहन ने उनकी सरकार बर्खास्त कर दी थी.

यह उसी हिन्दूवादी पार्टी का नया रूप है, जिसकी वजह से 1947-48 में जम्मू में हजारों मुसलमान मारे गए थे

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कई लेखक यह भी तर्क देते हैं कि नेहरूवादी ‘धर्म निरपेक्ष राष्ट्रवाद’ से कश्मीर समस्या के हल में मदद मिलेगी. अचरज है, हम यह क्यों भूल जाते हैं कि नेहरू ही थे, जिनके समय में कश्मीर के ‘भारतीयकरण’ की शुरूआत हुई थी. धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवादी कश्मीर को सदा से ही अखण्ड भारत का अंग मानते रहे हैं.

इस समय देश में लोकतांत्रिक ढंग से चुन कर आई ऐसी पार्टी की सरकार है, जो कट्टर है, मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री रह चुके हैं और 2002 के दंगों में बड़ी संख्या में मुसलमानों का नरसंहार रोकने में विफल रहे थे.

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कश्मीरी भली-भांति जानते हैं कि यह उसी हिन्दूवादी पार्टी का नया रूप है, जिसकी वजह से 1947-48 में जम्मू में हजारों मुसलमान मारे गए थे. और, अब पीडीपी ने उसी पार्टी के साथ गठबंधन कर लिया है. कश्मीरियों से कैसे उम्मीद की जा सकती है कि वे पीडीपी पर भरोसा करेंगे?

मुफ्ती का ‘घावों पर मरहम रखना’ और वाजपेयी के ‘इंसानियत’ के वादे खोखले निकले. मनमोहन सिंह की कुछ अलग हट कर सोच फर्जी साबित हुई और ‘कश्मीरियों के साथ बातचीत विफल ही रही.'

बहुसंख्यकवादी राष्ट्रवाद

इतिहास गवाह है कि राष्ट्रवाद आवश्यक रूप से एक बहुसंख्यकवादी विचारधरा है, भले ही यह धर्म निरपेक्ष हो, धार्मिक या पारम्परिक. यह एक ऐसी संस्था है, जिसे जनता से ज्यादा संपत्ति की चिंता है. शुरू से ही भारतीय राष्ट्रवाद कश्मीरीयत के दमन की कोशिश में रहा है, क्योंकि उसे लगता है कि कश्मीरी राष्ट्रवाद उसके अखंडता के दावे को खारिज करता है, यानी एक देश का राज.

राष्ट्र राज्य की अवधारणा पर हेजल के शब्दों हैं, ‘यह धरती पर भगवान की गश्त है.’ इनके पास हत्या करने का लाइसेंस है. मेरा मानना है कि कश्मीर में संकट के समय में उठाई जा रही आवाजें-आत्म-सम्मान का हक, स्वराज का हक, निडर होकर जीने का हक, यह सभी हर भारतीय की मांग है. कश्मीर के प्रति भारतीय सत्ता को नए नजरिए की जरूरत है. इसके लिए कश्मीर की जनता के साथ मिलकर तुरंत एक साझा मोर्चा बनाए जाने की आवश्यकता है. हमें कश्मीरियों के संघर्ष को अलगाववाद के तौर पर नहीं देखकर इस तरह से देखना होगा कि वे भी भारत के दमित लोग हैं. इसे अलग-थलग होकर देखने की बजाय देश में सच्चा लोकतंत्र लाने की दृष्टि से देखना होगा.

First published: 24 August 2016, 7:35 IST
 
तपन बोस @catchhindi

राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्मकार और डॉक्युमेंट्री निर्माता

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