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क्यों अहिंसा के महान पुजारी महात्मा गांधी को नहीं मिल पाया नोबल शांति पुरस्कार

कैच ब्यूरो | Updated on: 2 October 2017, 9:40 IST

आज राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का जन्मदिन है. पूरा विश्व आज महात्मा गांधी को अहिंसक आंदोलन के प्रणेता के तौर पर याद कर रहा है. 

गांधी जी ने समूचे विश्व को शांति, बंधुत्व और अहिंसा का मंत्र दिया और यही वजह है कि आज यानी 2 अक्टूबर को पूरा विश्व अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस के तौर पर मनाता है. महात्मा गांधी ने अहिंसा के बल पर भारत की आज़ादी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. गांधी को नोबेल के शांति पुरस्कार के लिए पांच बार नामित किया गया लेकिन उन्हें कभी यह पुरस्कार नहीं दिया गया.

जबकि इस पुरस्कार के संस्थापक दुनिया के महानतम वैज्ञानिकों में शुमार अल्फ्रेड नोबेल चाहते थे कि यह पुरस्कार उन्हें जरूर मिले, जिन्होंने मानवता की सेवा के लिए बड़ा काम किया हो. नोबेल शांति पुरस्कार समिति भी यह बात स्वीकार कर चुकी है कि महात्मा गांधी को शांति पुरस्कार नहीं देना उस समय की एक बड़ी चूक थी. आखिर शांति का नोबेल पुरस्कार महात्मा गांधी को क्यों नहीं दिया गया जो आधुनिक युग के शांति के सबसे बड़े दूत माने जाते हैं.

नोबेल कमेटी ने इस बात पर कभी टिप्पणी नहीं की इसलिए आम तौर पर लोगों का यह ख़्याल रहा है कि नोबेल कमेटी गांधी जी को इस पुरस्कार से सम्मानित कर अंग्रेज़ी साम्राज्य की नाराज़गी मोल लेना नहीं चाहती थी, लेकिन इन आरोपों के संदर्भ में कुछ दस्तावेज़ यह उजागर करते हैं कि नोबेल कमेटी पर इस तरह का कोई दबाव ब्रितानी सरकार की तरफ से नहीं था.

महात्मा गांधी जी को लगातार 1937, 1938 और 1939 में नामांकित किया गया था. इसके बाद 1947 में भी उनका नामांकन हुआ. आख़िरी बार इन्हें 1948 में उन्हें नामांकित किया गया लेकिन महज़ चार दिनों के बाद उनकी हत्या कर दी गई. पहली बार नॉर्वे के एक सांसद ने उनका नाम सुझाया था लेकिन पुरस्कार देते समय उन्हें नज़रअंदाज़ कर दिया गया. उस समय के उपलब्ध दस्तावेज बताते हैं कि नोबेल कमेटी के एक सलाहकार जैकब वारमुलर ने इस बारे में अपनी टिप्पणी लिखी है.

उन्होंने लिखा है कि वह अहिंसा की अपनी नीति पर हमेशा क़ायम नहीं रहे और उन्हें इन बातों की कभी परवाह नहीं रही कि अंग्रेज़ी हुकूमत के ख़िलाफ़ उनका अहिंसक प्रदर्शन कभी भी हिंसक रूप ले सकता है. जैकब वारमुलर ने लिखा है कि गांधी जी की राष्ट्रीयता भारतीय संदर्भों तक सीमित रही, यहां तक कि दक्षिण अफ़्रीका में उनका आंदोलन भी भारतीय लोगों के हितों तक सीमित रहा. उन्होंने अश्वेतों के लिए कुछ नहीं किया, जो भारतीयों से भी बदतर ज़िंदगी गुज़ार रहे थे.

अब इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि जब मार्टिन लूथर किंग और नेल्सन मंडेला जैसे लोगों को शांति का नोबेल पुरस्कार दिया गया तो उन्होंने स्वीकार किया कि उन्होंने जो कुछ किया वो गांधी जी का ही प्रभाव था, उनकी शिक्षा थी.

1947 में शांति पुरस्कारों के लिए सिर्फ छह लोगों को नामांकित किया गया था. उनमें गांधी जी का नाम भी शामिल था, लेकिन भारत विभाजन के बाद गांधी जी के कुछ विवादास्पद बयान कुछ अख़बारों में छपे थे, जिसके कारण वह शांति पुरस्कार से वंचित रह गए. उस समय यह पुरस्कार मानवाधिकार आंदोलन क्वेकर को दे दिया गया था.

1948 में ख़ुद क्वेकर ने इस पुरस्कार के लिए गांधी जी का नाम प्रस्तावित किया. नामांकन की आख़िरी तारीख़ के महज़ दो दिन पूर्व गांधी जी की हत्या हो गई. इस समय तक नोबेल कमेटी को गांधी जी के पक्ष में पांच संस्तुतियां मिल चुकी थीं, लेकिन तब समस्या यह थी कि उस समय तक मरणोपरांत किसी को नोबेल पुरस्कार नहीं दिया जाता था.

हालांकि उस समय इस तरह की क़ानूनी गुंजाइश थी कि विशेष हालात में यह पुरस्कार मरणोपरांत भी दिया जा सकता है, लेकिन कमेटी के समक्ष तब यह समस्या थी कि पुरस्कार की रक़म किसे अदा की जाए क्योंकि गांधी जी का कोई संगठन या ट्रस्ट नहीं था. उनकी कोई जायदाद भी नहीं थी और न ही इस संबंध में उन्होंने कोई वसीयत ही छोड़ी थी.

हालांकि यह मामला भी कई क़ानूनी पेचीदगियों से भरा नहीं था जिसका कोई हल नहीं होता लेकिन कमेटी ने किसी भी ऐसे झंझट में पड़ना मुनासिब नहीं समझा. तब हालत यह हो गई कि 1948 में नोबेल पुरस्कार किसी को भी नहीं दिया गया.

कमेटी में अपनी प्रतिक्रिया में जो कुछ लिखा है उससे यह आभास होता है कि अगर गांधी जी को अचानक मौत का सामना नहीं करना पड़ता तो उस वर्ष का नोबेल पुरस्कार उन्हें ही मिलता. कमेटी ने कहा था कि किसी भी ज़िंदा उम्मीदवार को वह इस लायक़ नहीं समझती इसलिए इस साल का नोबेल पुरस्कार किसी को भी नहीं दिया जाएगा. इस बयान में ज़िंदा शब्द ध्यान देने योग्य है. इससे इशारा मिलता है कि मरणोपरांत अगर किसी को यह पुरस्कार दिया जाता तो गांधी जी के अलावा वह व्यक्ति और कौन हो सकता था. आज यह सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि क्या गांधी जी जैसी महान शख़्सियत नोबेल पुरस्कार की मोहताज थी?

First published: 2 October 2017, 9:40 IST
 
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