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मेडिकल काउंसिल ऑफ़ इंडिया में किस बात की पर्देदारी है?

विशाख उन्नीकृष्णन | Updated on: 10 February 2017, 1:47 IST
QUICK PILL
  • केंद्रीय सूचना आयोग ने साल 2012 में मेडिकल काउंसिल ऑफ़ इंडिया को मेडिकल लापरवाही से जुड़े सभी मामलों को सार्वजनिक करने का निर्देश दिया था. लेकिन एमसीआई ने करीब एक साल से किसी मामलों को सार्वजनिक नहीं किया है.
  • एक मामले से जुड़ी आरटीआई के जवाब में एमसीआई ने जानकारी देने से मना कर दिया. एमसीआई की एथिक्स कमेटी के सदस्यों के अनुसार सूचना देना चेयरमैन का विशेषाधिकार है.

मेडिकल काउंसिल ऑफ़ इंडिया (एमसीआई) का काम देश में चिकित्सा के पेशे पर निगरानी रखना है. एक आम भारतीय यही चाहेगा कि इतनी जरूरी संस्था पूरी तरह पारदर्शी हो. लेकिन ज़मीनी सच्चाई इससे उलट है.

पारदर्शिता के मुद्दे पर एमसीआई आगे बढ़ने के बजाय पीछे जाता दिख रहा है. एमसीआई की एथिक्स कमेटी का काम है मरीजों के हित का ख़्याल रखना लेकिन इस संस्था ने अपनी बैठक के मिनट्स (विवरण) सार्वजनिक करने से इनकार कर दिया है. इतना ही नहीं आप ये जानकारी आरटीआई के माध्यम से भी नहीं पा सकते.

नतीजन डॉक्टरों और अन्य चिकित्साकर्मियों की लापरवाह और गलती के मामले जनता के सामने नहीं आ सकेंगे.

मेडिकल काउंसिल ऑफ़ इंडिया करीब एक साल से मेडिकल लापरवाही मामलों की जानकारी सार्वजनिक नहीं कर रहा है

'पब्लिक फॉर बेटर ट्रीटमेंट' (पीबीटी) मेडिकल लापरवाही से जुड़े मामलों के लिए काम करती है. पीबीटी ने पिछले महीने एमसीआई में आरटीआई के माध्यम से एक मामले से जुड़ी जानकारी मांगी थी. उन्हें जवाब मिला, "एथिक्स कमेटी के कामकाज की शैली में बदलाव किया गया है. अब एथिक्स कमिटी की बैठक का कोई ठोस विवरण नहीं तैयार किया जाता."

आरटीआई के जवाब में एमसीआई ने कहा,"ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि एथिक्स कमिटी को ऐसे मामलों पर विचार करना होता है जिनमें प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के तहत वादी-प्रतिवादी पक्ष के दायित्व और अधिकार जुड़े होते हैं. ऐसे मामलों की जानकारी को सार्वजनिक करने में कोई जनहित नहीं है."

एमसीआई का ये जवाब साल 2012 के केंद्रीय सूचना आयोग के उस निर्देश के सीधे-सीधे ख़िलाफ़ है जिसमें संस्था को मेडिकल लापारवाही के सभी मामलों और उनमें जांच की स्थिति को अपनी वेबसाइट पर सार्वजनिक करने के लिए कहा गया था.

मेडिकल काउंसिल ऑफ़ इंडिया के नए चेयरमैन के आने के बाद बदली मेडिकल लापरवाही को सार्वजनिक करने की नीति

एमसीआई की कामकाज की शैली में यह बदलाव नवंबर, 2013 में डॉक्टर जयश्री बेन मेहता के इसके चेयरमैन बनने के बाद आया है. उनके पद संभालने से पहले तक एथिक्स कमेटी नियमित तौर से बैठकों की जानकारी वेबसाइट पर सार्वजनिक करती थी.

पीबीटी के अनुसार क़रीब एक साल से एमसीआई डॉक्टरों के ख़िलाफ़ हुई शिकायतों पर चल रही जांच की स्थिति को सार्वजनिक नहीं कर रहा है.

पीबीटी के मिहिर बनर्जी कहते हैं, "एमसीआई मेडिकल लापरवाही के सबसे ज्ञात मामलों से जुड़ी जानकारी भी सार्वजनिक नहीं कर रही है. ऐसा लग रहा है कि वो कुछ छिपा रहे हैं."

कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि नई नीति से जाहिर है कि मेडिकल काउंसिल ज़रूर कुछ छिपा रहा है

जब कैच ने एथिक्स कमेटी के कई सदस्यों से बात करने की कोशिश की तो उन्होंने कहा कि संस्था के चेयरमैन ही इसपर आधिकारिक तौर पर बयान दे सकते हैं. हालांकि एमसीआई के चेयरमैन से संपर्क नहीं हो सका.

एथिक्स कमेटी के सदस्य डॉक्टर डी शांताराम कहते हैं, "बैठक का विवरण सार्वजनिक न करना चेयरमैन का विशेषाधिकार है."

आखिर करीब एक साल से एमसीआई की वेबसाइट पर किसी नए मामले की जानकारी सार्वजनिक क्यों नहीं की गयी है? इसपर शांताराम कहते हैं, "मेडिकल लापरवाही या चिकित्सकीय ग़लतियों के मामलों में आखिरी फैसला आने के बाद ही इसे सार्वजनिक किया जा सकता है इसलिए देर हो रही है."

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डॉक्टर एमसी गुप्ता अब वकालत का पेशा अपना चुके हैं. वो कहते हैं, "एमसीआई ज़रूर कुछ छिपा रही है."

गुप्ता इस बात से इत्तेफ़ाक नहीं रखते कि एथिक्स कमिटी की बैठक की जानकारी को सार्वजनिक करना एमसीआई के चेयरमैन का विशेषाधिकार है.

संस्था पर मेडिकल कॉलेजों, डॉक्टरों के रजिस्ट्रेशन और मेडिकल लापरवाही जैसे महत्वपूर्ण मामलों की निगरानी जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है. ऐसे संस्था में पारदर्शिता का अभाव अपने मूल जिम्मेदारी से मुकरने जैसा है.

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First published: 21 December 2015, 9:14 IST
 
विशाख उन्नीकृष्णन @catchnews

एशियन कॉलेज ऑफ़ जर्नलिज्म से पढ़ाई. पब्लिक पॉलिसी से जुड़ी कहानियां करते हैं.

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