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वीडी सावरकर के गुरु जिनके बड़े प्रशंसक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी हैं

चारू कार्तिकेय | Updated on: 6 October 2016, 15:38 IST
(मलिक सज्जाद/कैच न्यूज़)
QUICK PILL
  • संघ परिवार के पास ऐसी बौद्धिक क्षमता है कि वह शांतिवादियों और कट्टरपंथियों को एक साथ पूज्यनीय बना सकता है. 
  • श्यामजी कृष्ण वर्मा का ब्रिटिश राज से आजादी का संघर्ष भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संघर्ष से बिल्कुल अलग था. उन्होंने कांग्रेस से दूरी रखते हुए स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लिया था.
  • भाजपा और नरेंद्र मोदी की वर्मा के प्रति अगाध श्रद्धा है. इनके भक्तिभाव से यह बात लगभग साफ़ हो चुकी है. 

एक दशक से ज्यादा का वक्त हुआ जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पहली बार भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के इतिहास में से श्यामजी कृष्ण वर्मा का खोजकर निकाला था. मोदी तब गुजरात के मुख्यमंत्री थे और आरएसएस ने तब उग्र सुधारवादी, शिक्षाविद् और स्वतन्त्रता आन्दोलन के पितृ पुरुष श्याम जी को अपने परिवार की गैलेक्सी में शामिल कर लिया था. 

हालांकि तब भी श्याम कृष्ण वर्मा किसी पहचान के मोहताज नहीं थे. उनका निधन आजादी हासिल करने से काफी पहले स्विटजरलैंड में हुआ था. मोदी, भाजपा और आरएसएस के लोग तब से हर साल उनके जन्मदिवस पर भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते आ रहे हैं. चार अक्टूबर को मोदी ने हर साल की तरह इस साल भी उनके जन्म दिवस पर ट्वीट किया और श्रद्धांजलि दी.

मोदी की पर्सनल वेबसाइट से एक पोस्ट जारी हुई है जिसमें उन्होंने वर्मा को अपने आदर्श पुरुषों में से एक बताया है और यह भी बताया है कि किस तरह से वह लाखों भारतीयों के दिल और दिमाग में बसे श्यामजी वर्मा की विरासत को सम्भाल कर रखने की कोशिश कर रहे हैं.

मुख्यमंत्री मोदी का वर्मा के प्रति सेवा भाव

2003 में मोदी जिनेवा गए थे. वहां उन्होंने श्यामकृष्ण वर्मा और उनकी पत्नी की अस्थियों को भारत लाने की व्यवस्था की थी. आजादी के लगभग 55 साल बाद 22 अगस्त 2003 को श्यामजी और उनकी पत्नी की अस्थियों को जिनेवा से भारत लाया गया और फिर उनके जन्म स्थान मांडवी ले जाया गया. वर्मा की मौत 1930 में जिनेवा में हुई थी. 

तब से ही उनकी और उनकी पत्नी भानुप्रिया की अस्थियां स्विस बैंक में रखीं थीं. भाजपा ने तब मुम्बई के एक बड़ा आयोजन किया था जहां उनकी अस्थियों को रखा गया था और पार्टी के दिग्गज नेताओं तत्कालीन संघ प्रमुख के. सुदर्शन, तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष मनोहर जोशी, खुद मोदी और भाजपा सांसद किरीट सौमेय्या ने उनके द्वारा स्वतंत्रता आन्दोलन में किए गए उल्लेखनीय कार्यों को रेखांकित करते हुए श्रद्धांजलि दी थी.

गुजरात में मोदी के कार्यकाल में श्यामजी को हर साल श्रद्धांजलि देने का क्रम चलता रहा. वर्मा के जन्मस्थल मांडवी में उनकी याद में एक स्मारक भी बनाया गया. मोदी ने इस स्मारक का नाम क्रांति तीर्थ रखा और इंडिया हाउस की पूरे आकार की एक प्रतिकृति भी लगवाई. इंडिया हाउस की स्थापना लंदन में वर्मा ने भारतीय छात्रों के ठहरने के लिए की थी. जो धीरे-धीरे आगे चलकर भारतीय क्रांतिकारियों के लिए बैठक करने का एक लोकप्रिय और महत्वपूर्ण स्थान बन गया.

प्रधानमंत्री मोदी का श्रद्धांजलि देना जारी रहा

मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भी वर्मा को श्रद्धांजलि देने का उनका क्रम टूटा नहीं. वर्मा को केन्द्र में रखकर उनका यह अभियान चलता रहा. अंग्रेजों के विरोध में लेख लिखने के कारण वर्मा को लंदन में कानून की प्रेक्टिस करने से रोक दिया गया था. उनके राष्ट्रवादी लेखों और सक्रियता से ब्रिटिश सरकार चौकन्नी हो गई थी. 

उन्हें 'इनर टेम्पल' से निषेध कर दिया गया और उनकी सदस्यता भी 30 अप्रेल 1909 को खत्म कर दी गई. विश्वास किया जाता है कि 2015 की शुरुआत में एनडीए सरकार ने लंदन में रॉयल कोर्ट ऑफ जस्टिस के इनर टेम्पल से अनुरोध किया था कि श्यामजी पर लगा यह प्रतिबंध हटा लिया जाए.

मोदी जब नवम्बर 2015 में इंग्लैण्ड गए, तब उन्हें भारतीय बैरिस्टर कृष्ण वर्मा को मरणोपरान्त बार में फिर से बहाली का प्रमाण पत्र सौंपा गया. इस प्रमाण पत्र को कच्छ के बंदरगाह शहर मांडवी में वर्मा की याद में बने स्मारक क्रांति तीर्थ में रख दिया गया है. मूलतः यह माना जाता है कि मोदी ने वर्मा की विरासत का मायाजाल कच्छ क्षेत्र में भाजपा की मदद के लिए फैलाया है क्योंकि 2002 के चुनाव में भाजपा यहां अच्छा प्रदर्शन नहीं कर सकी थी. हालांकि, इसके अलावा आगे और कुछ भी है.

असली वजहः मोदी क्यों वर्मा को सेलिब्रेट करते हैं?

संघ परिवार के पास ऐसी बौद्धिक क्षमता है कि वह शांतिवादियों और कट्टरपंथियों को एक साथ पूज्य मान सकता है. हालांकि संघ परिवार महात्मा गांधी की अहिंसा की वकालत करता है. गांधीजी के प्रति लगाव की उसकी भावना मुख्य धारा के राजनीतिक दल में शामिल होने के लिए प्रयास करने और सत्ता हथियाने के लिए हाल में ही उत्पन्न हुई है. उसका मूल सम्बंध के बी हेगडेवार और एम एस गोलवलकर जैसे कट्टरपंथी विचारधारा वाले लोगों से है. 

बताते चलें कि वर्मा का ब्रिटिश राज से आजादी का संघर्ष भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संघर्ष से बिल्कुल अलग था. उनके विचार अलग थे और उन्होंने कांग्रेस से दूरी बनाकर रखी हुई थी. वह कांग्रेस की ब्रिटिश कमेटी में शामिल नहीं हुए थे, वरन उन्होंने अपने उद्देश्यों की खातिर इंडिया हाउस और इंडियन होम रूल सोसाइटी की तरह के संस्थानों की स्थापना की थी ताकि कांग्रेस के समानान्तर आगे बढ़ा जा सके. उन्होंने विदेश में सशस्त्र क्रांतिकारी विचारों के जरिए भारत की आजादी के संघर्ष पर जोर दिया था. 

वर्मा ने 'इंडियन सोशलिस्ट' नाम से एक जर्नल भी निकाला था. इस जर्नल में ब्रिटिश राज से मुक्ति के लिए रेडिकल कंटेंट होता था और सशस्त्र क्रांति के विचार वाले लेख होते थे. इस जर्नल में छपे अपने इन्हीं लेखों के कारण उन्हें 'इनर टेम्पल' में प्रेक्टिस करने से वंचित किया गया था.

सावरकर और ढींगराः वर्मा की विरासत

इंडिया हाउस के सदस्यों में ऐसे लोग थे जिन्होंने आगे चलकर बहुत ख्याति अर्जित की. इसमें सबसे ज्यादा प्रसिद्धि हासिल करने वाले विनायक दामोदर सावरकर थे. वर्मा के पेरिस जाने के बाद सावरकर ने उनका कार्यभार सम्भाला था. इंडिया हाउस आने वाले नियमित सदस्यों में एक मदन लाल ढींगरा भी थे. इंडिया हाउस उस समय क्रांतिकारियों का गढ़ बना हुआ था. इसमें आने वाले लोग कई क्रान्तिकारियों को मृत्युदण्ड दिए जाने से बहुत क्रोधित थे. 

एक कार्यक्रम में भाग लेने के लिए भारत सचिव के राजनीतिक सलाहकार सर विलियम हट कर्जन वायली जब अपनी पत्नी के साथ हॉल में घुसे, ढींगरा ने उनके चेहरे पर पांच गोलियां दाग दी. उसके बाद ढींगरा ने अपने पिस्तौल से स्वयं को भी गोली मारनी चाही किन्तु उन्हें पकड़ लिया गया. अदालत ने उन्हें मृत्युदण्ड का आदेश दिया और 17 अगस्त सन् 1909 को लन्दन की पेंटविले जेल में उन्हें फांसी पर लटका दिया गया.

भारतीय विद्या भवन की वेबसाइट पर छपे एक लेख के अनुसार वर्मा का राष्ट्रवाद की ओर झुकाव गांधी जी के रास्ते से काफी अलग था. गांधीजी के कार्यों से उन्हें शर्म महसूस होती थी. 1899 में दूसरा एंग्लो-बोअर-युद्ध छिड़ा. गांधीजी की पूरी सहानुभूति बोअर के साथ थी जो अपनी आजादी के लिए लड़ रहे थे. गांधीजी ने भारतीयों की एक एंबुलैंस टुकड़ी बनाई जो घायलों को अस्पताल पहुंचाने का काम करती थी. वर्मा इसे प्रो-ब्रिटिश एक्ट मानते थे.

मोदी की वर्मा के प्रति अगाध श्रद्धा है, पर अब यह स्पष्ट सा है कि मोदी और भाजपा वर्मा के प्रति जो भक्तिभाव दिखा रहे हैं, वह एक अन्य स्वतन्त्रता सेनानी की विरासत के समुचित श्रद्धा दिखाने की कोशिश नहीं है, बजाए इसके एक ऐसे आइकन को स्थापित करने के प्रयास किए जा रहे हैं जिनकी विरासत उस आख्यान का फैलाव ही होगा जिस पर संघ परिवार वाकई में भरोसा रखता है और उसका चित्रांकन करते हुए आम जन में पेश करना चाहता है.

First published: 6 October 2016, 15:38 IST
 
चारू कार्तिकेय @CharuKeya

Assistant Editor at Catch, Charu enjoys covering politics and uncovering politicians. Of nine years in journalism, he spent six happily covering Parliament and parliamentarians at Lok Sabha TV and the other three as news anchor at Doordarshan News. A Royal Enfield enthusiast, he dreams of having enough time to roar away towards Ladakh, but for the moment the only miles he's covering are the 20-km stretch between home and work.

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