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प्यारे मोहनदास पाई, खुद की टैक्स छूट से कमाई, और बच्चों को ज्ञान की दवाई

नीरज ठाकुर | Updated on: 17 February 2016, 8:42 IST

दूसरों को उपदेश देना अब कुछ लोगों का पसंदीदा शौक़ बनता जा रहा है. मिसाल के तौर पर मोहनदास पाई को ही ले लीजिए.

मोहनदास पाई इंफोसिस के पूर्व सीएफओ (चीफ फाइनेंस आफिसर) और एचआर हेड रहे हैं. उन्होंने दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) विवाद पर एक लेख लिख कर बताया कि जेएनयू के छात्रों को क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए.

पाई ने लिखा, "अगर छात्रों को राजनीति करनी है तो उन्हेें अपनी पढ़ाई का पूरा खर्च उठाना चाहिए."

जाहिर है कि उनकी राय अयाचित और कपटपूर्ण है. दरअसल जेएऩयू को मिलने वाली सब्सिडी पर सवाल उठाकर पाई देश में फलफूल रही हजारों प्राइवेट यूनिवर्सिटियों की पैरवी कर रहे हैं.

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ये निजी संस्थान लंबे समय से भारत की शिक्षा व्यवस्था के निजीकरण की मांग करते रहे हैं. पाई खुद भी ऐसी एक प्राइवेट यूनिवर्सिटी के बोर्ड मेंबर हैं.

पाई ने लिखा है, "पुराकालीन या अतिवादी वाम को सब्सिडी देने के लिए करदाताओं के पैसे का इस्तेमाल को किसी तरह सही नहीं ठहराया जा सकता."

मोहनदास पाई ने लिखा है कि अगर छात्रों को राजनीति करनी है तो उन्हेें अपनी पढ़ाई का पूरा खर्च उठाना चाहिए

छात्रों और विश्वविद्यालयों को मिलने वाली छूट पर पाई ने इतना लंबा ज्ञान दिया लेकिन उन्होंने आईटी इंडस्ट्री को करीब दो दशक तक टैक्स छूट मिलने के बारे में कुछ नहीं लिखा है.

अगर टैक्स में छूट की बात चलेगी तो आईटी इंडस्ट्री को मुंह की खानी पड़ेगी.

खुद पाई ने अपनी ज्यादातर दौलत आईटी इंडस्ट्री से कमाई है. इस इंडस्ट्री को भारत सरकार ने साल 1991 से 2011 तक टैक्स छूट दे रखी थी.

सरकार ने सॉफ्टवेयर टेक्नोलॉजी पार्क्स ऑफ इंडिया (एसटीपीआई) योजना के तहत विभिन्न आईटी कंपनियों को कारपोरेट टैक्स पर 25 से 33 प्रतिशत तक की छूट दे रखी थी. इन कंपनियों को सस्ते दर पर ज़मीन भी मुहैया करायी गई थी.

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सरकार ने जब जब इस टैक्स छूट को हटाना चाहा तो पाई की इंफोसिस समेत तमाम आईटी कंपनियों ने इस छूट की समय सीमा बढ़ाने का अनुरोध किया.

आईटी कंपनियो को टैक्स छूट से कितना प्यार है ये आप बस इसी से समझ सकते है कि जब 2011 में ये टैक्स छूट खत्म हुई तो तमाम आईटी कंपनियां अपना कारोबार कारपोरेट पार्कों से हटाकर स्पेशल इकॉनमिक ज़ोन (एसईज़ेड) में ले गईं.

वजह? एसईज़ेड में सरकार ने अगले दस सालों तक ऐसी ही टैक्स छूट देने की व्यवस्था कर रखी है. 

पाई इंफोसिस में 1994 से 2011 तक रहे. कुल मिलाकर वो एक ऐसे उद्योग से संबंध रखते हैं जो लगातार टैक्स छूट लेती रही है.

आईटी इंडस्ट्री को मिलने वाली छूट को पाई शायद भूल गए हों लेकिन जेएनयू के छात्रों को ज्ञान देते समय उन्हें समूचे कारपोरेट जगत को मिलने वाली टैक्स छूट की भी याद नहीं आई.

पाई को मालूम होना चाहिए कि कारपोरेट सेक्टर देश के टैक्स देने वालों पर बोझ बन गया है. देश के बैंकों के नॉन-परफॉर्मिंग एसेट का सबसे बड़ा हिस्सा कारोपोरेट जगत का है.

प्राइवेट यूनिवर्सिटियां चाहती हैं कि सरकारी यूनिवर्सिटियों को मिलने वाली छूूट खत्म कर दी जाए. पाई एक प्राइवेट यूनिवर्सिटी के बोर्ड मेंबर हैं

इस समय भारत के सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का बैड लोन करीब 3.15 लाख करोड़ रुपये हो चुका है. ये राशि भारत सरकार के 2015-16 के प्लान्ड एक्सपेंडिचर का करीब 68 प्रतिशत है.

नतीजतन, भारत के सार्वजनिक क्षेत्र के बैकों को पिछले साल की आखिरी तिमाही में 12 हजार करोड़ रुपये का नुकसान हुआ.

पाई को जेएनयू की राजनीति पर गुस्सा क्यों आता है?

पाई और उनके जैसों लोगों को जेएनयू को मिलने वाली छूट से ज्यादा वहां की छात्र राजनीति से दिक्कत होती है.

कच्चे-पक्के तरीके से जेएनयू के वामपंथी छात्र समता, सामाजिक न्याय और संपत्ति के न्यायसंगत वितरण का मुद्दा उठाते रहे हैं. इन विचारों से कारपोरेट जगत की रातों की नींद उड़ जाती है.

पाई को जेएनयू की वामपंथी राजनीति 'पुराकालीन' लगती है क्योंकि वो प्राइवेट सेक्टर में भी एससीएसटी और ओबीसी को आरक्षण देने की मांग कर रहे हैं.

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साल 2006-07 में यूपीए सरकार ने वामपंथी दलों के दबाव में प्राइवेट सेक्टर को इन वर्गों के लिए अफरमेटिव एक्शन लागू करने पर विचार करने के लिए कहा था.

अभी तक कारपोरेट सेक्टर ने इस दिशा में कोई पहल नहीं की है. कारपोरेट जगत के पाई जैसे लोग ऐसे किसी कानून को लेकर आशंकित रहते हैं.

ऐसे में जो संस्थान और विचारधारा इस तरह की मांग करें उन्हें बंद करने में किनका हित छिपा है?

कारपोरेट जगत के नुमाइंदे के तौर पर पाई को कभी ये भी बताना चाहिए कि भारतीय कारपोरेट जगत में कितने एससी, एसटी और ओबीसी हैं.

या वो यही बता दें कि जब वो इंफोसिस के एचआर हेड थे तो उनकी कंपनी ने वंचित वर्ग के स्किल डेवलपमेंट के कितने कार्यक्रम आयोजित किए थे?

जब तक पाई और उनके जैसे लोग इन सवालों का जवाब नहीं देते तब तक देश के बहुसंख्यक वंचितों के लिए 'पुराकालीन' जेएनयू और वामपंथ की जरूरत बनी रहेगी.

(ये निजी विचार हैं, जरूरी नहीं कि संस्था इससे सहमत हो)

First published: 17 February 2016, 8:42 IST
 
नीरज ठाकुर @neerajthakur2

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बिज़नेसवर्ल्ड, डीएनए और बिज़नेस स्टैंडर्ड में काम कर चुके हैं.

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