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पीएम मोदी की डिग्री से जुड़ी सूचना देना कानूनन जरूरी है?

सौरव दत्ता | Updated on: 1 May 2016, 22:26 IST
QUICK PILL
  • केंद्रीय सूचना आयोग ने दिल्ली विश्वविद्यालय और गुजरात विश्वविद्यालय को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की क्रमशः बीए और एमए की डिग्री के संबंध में आरटीआई का जवाब देने के लिए कहा है.
  • दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने सीआईसी पर इस मामले में उठाया था सवाल. दिल्ली विश्वविद्यालय पहले \"राष्ट्रीय सुरक्षा\" का हवाला देकर ऐसी जानकारी देने से मना कर चुका है.

भारत जैसे देश "लोकतंत्र" में जहां गहरी सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक असमानता हो वहां किसी नेता या पीएम की शैक्षणिक डिग्री कितना महत्व रखती है?

राजनीति विज्ञानी और समाजशास्त्री इस सवाल पर नकारात्मक जवाब देंगे. लेकिन इससे ही जुड़ा एक और सवाल है कि क्या राजनेताओं को गोपनीयता, छल और धोखाधड़ी की छूट दी जानी चाहिए?

कम से कम केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) यही मानता है. सीआईसी के प्रमुख प्रोफेसर एम श्रीधर आचार्युलु ने दिल्ली विश्वविद्यालय और गुजरात विश्वविद्यालय को सूचना का अधिकार (आरटीआई) के तहत नरेंद्र मोदी की शैक्षणिक योग्यता के बारे में मांगी गई जानकारी मुहैया कराने का आदेश दिया है.

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दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने एक पत्र लिखकर सीआईसी से इस जानकारी को सार्वजनिक करने की मांग की थी. केजरीवाल खुद भी आरटीआई एक्टिविस्ट रह चुके हैं. उन्होंने सीआईसी से मांग की कि वो "साहस और निष्पक्षता" का परिचय देते हुए मोदी की शैक्षणिक योग्यता से जुड़े सवाल का जवाब दिलवाए.

अरविंद केजरीवाल ने सीआईसी से नरेंद्र मोदी की डिग्री से जुड़ी जानकारी दिलवाए जाने की मांग की थी

ये अनुमान लगाना व्यर्थ है कि सीआईसी ने केजरीवाल के दबाव में ये फैसला लिया है या नहीं लेकिन इस संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता. पहले भी न्यायिक और अर्ध-न्यायिक संस्थाओं पर राजनीतिक दबाव के आगे झुक जाने का आरोप लगता रहा है.

पिछले साल प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) और दिल्ली विश्वविद्यालय ने इस बाबत आरटीआई के तहत पूछे गए सवालों का जवाब देने से इनकार कर दिया था. पीएमओ ने अपने जवाब में कहा कि उसके पास इस बाबत कोई जानकारी नहीं है. वहीं दिल्ली विश्वविद्यालय ने कहा कि "राष्ट्रीय सुरक्षा" को ध्यान में रखते हए वो सूचना नहीं दे सकती.

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मोदी की डिग्री का मामला इसलिए भी ज्यादा तूल  पकड़ रहा है क्योंकि इससे पहले मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी की डिग्री और चुनावी हलफनामे को लेकर काफी विवाद हो चुका है.

कानूनी तौर पर पीएमओ ने कुछ भी गलत नहीं किया है. क्योंकि आरटीआई के सेक्शन 2(जे) के अनुसार संबंधित अधिकारी को "सूचना के अधिकार" की सीमा तय करने का अधिकार है. इस कानून की भाषा इतनी अस्पष्ट है कि सूचना अधिकारी के पास सूचना से जुड़े किसी भी सवाल का जवाब देने से मना करने का अधिकार है. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने सूचना के अधिकार को अभिव्यक्ति की आजादी के मौलिक अधिकार के अंतर्गत माना है.

नरेंद्र मोदी का मामला स्मृति ईरानी जैसा नहीं है. शैक्षणिक योग्यता के बारे में दिए उनके हलफनामे में कोई असंगति नहीं है. उन्होंने 2007 और 2012 के गुजरात विधानसभा के चुनाव तथा 2014 के लोकसभा चुनाव में अपनी शैक्षणिक योग्यता के बारे मे एक समान जानकारी दी है.

"नरेंद्र मोदी ने दिल्ली विश्वविद्यालय से 1978 में बीए और गुजरात विश्वविद्यालय से 1983 में एमए किया"

पब्लिक डोमेन में उपलब्ध जानकारी के अनुसार उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से 1978 में बीए और गुजरात विश्वविद्यालय से 1983 में एमए किया है. हालांकि उन्होंने किन विषयों की पढ़ाई की इसकी जानकारी नहीं दी गई है.

साल 2003 में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया की संसदीय चुनाव लड़ने के लिए स्नातक होना अनिवार्य होना चाहिए. जिसके बाद केंद्र सरकार ने जनप्रतिनिधि कानून में बदलाव करके अदालत के इस फैसले को निष्प्रभावी कर दिया.

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पिछले साल दिसंबर में सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा सरकार के उस फैसले को स्वीकृति दे दी जिसके अनुसार पंचायत चुनाव लड़ने के लिए न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता निर्धारित की थी. राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने अदालत के इस फैसले को 'भेदभाव करने वाला' बताया.

मोदी सरकार पर पहले भी आरटीआई को कमजोर करने का आरोप लगता रहा है. मसलन, पीएमओ ने पीएम मोदी के विदेश दौरों पर सरकारी खजाने से होने वाले खर्च का ब्योरा देने से मना कर दिया.

इसी तरह पीएम मोदी की शैक्षणिक योग्यता के बारे में भी अजीब गोपनीयता बरती जा रही है. ऐसे में सीआईसी के फैसले के खिलाफ केंद्र सरकार क्या रुख लेती है, इससे सार्वजनिक जीवन में जवाबदेही और पारदर्शिता का भविष्य तय होगा.

First published: 1 May 2016, 22:26 IST
 
सौरव दत्ता @SauravDatta29

Saurav Datta works in the fields of media law and criminal justice reform in Mumbai and Delhi.

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