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एसएआर गिलानी के समर्थन में कोई विरोध प्रदर्शन क्यों नहीं हो रहा?

आदित्य मेनन | Updated on: 10 February 2017, 1:51 IST
QUICK PILL

जेएनय के छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी के तीन दिन बाद 15 फरवरी को डॉक्टर एसएआर गिलानी को  गिरफ्तार किया गया.

गिलानी को दिल्ली स्थित प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरु की फांसी के विरोध में हुए एक आयोजन के संबंध में गिरफ्तार किया गया.

गिलानी पर भी 'राजद्रोह' का मामला दर्ज हुआ है लेकिन मीडिया में इसे उतनी तवज्जो नहीं मिली जितनी जेएनयू के छात्रों कन्हैया कुमार, उमर खालिद और अनिर्बान भट्टाचार्य के मामले को मिली.

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कैच न्यूज से बातचीत में गिलानी की बेटी नुसरत ने अफसोस जताया कि उनके पिता के समर्थन में कोई नहीं उतरा. जो लोग 'स्टैंडविथजेएनयू' से जुड़े हैं वो भी उनके मामले से दूरी बरतते नजर आ रहे हैं.

गिलानी को जब पहली बार गिरफ्तार किया गया था तब नुसरत बच्ची थीं. वो कहती हैं कि 2001 में संसद पर हुए हमले के आरोप से बरी होने के बाद भी उनके पिता की मुश्किलें खत्म नहीं हुईं.

पढ़ें बातचीत के प्रमुख अंशः

जेएनयू के छात्रों की तरह आपके पिता पर भी 'राजद्रोह' का आरोप है लेकिन उनके बारे में ज्यादा चर्चा नहीं हो रही है?


हां, लोगों का ध्यान पूरी तरह जेएनयू पर है. जिस तरह कन्हैया कुमार और जेएनयू के दूसरे छात्रों के लिए हुआ, उनकी रिहाई के लिए कोई प्रदर्शन नहीं हुआ. इसमें कोई शक नहीं कि जेएनयू के छात्रों को गलत फंसाया गया है. मेरे पिता का मामला भी ज्यादा अलग नहीं है.

लोग शायद इसलिए उनके समर्थन में आने से बच रहे हैं क्योंकि वो कश्मीरी मुसलमान हैं. और वो 2001 में भारतीय संसद पर हुए हमले के मामले में अभियुक्त थे. इसलिए वो आसान शिकार हैं. लोग डरते हैं कि उनके समर्थन में आने से उन्हें नुकसान उठाना पड़ सकता है.

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हम चाहे जितना भी इनकार करे ये सच है कि प्रतिरोध की आवाज उठाने वाले कश्मीरी मुसलमान को हमेशा ही राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरे के रूप में देखा जाता रहेगा. ये हमारे ज़हन में बैठ चुका है और मीडिया का एक तबका इसे बार बार याद दिलाता है.

लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर जब बात होगी, तो आप दोहरा रवैया नहीं अपना सकते. अगर जेएनयू के मामले में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता खतरे में है तो मेरे पिता के मामले में भी ऐसा ही है.

क्या आप प्रेस क्लब में हुए कार्यक्रम के बारे में कुछ बता सकती हैं, जिसे लेकर उन्हें गिरफ्तार किया गया है?


उन्हें प्रेस क्लब में हुई पब्लिक मिटिंग के पांच दिन बाद 15 फरवरी को गिरफ्तार किया गया. उनपर राजद्रोह के अलावा आपराधिक षडयंत्र और गैर-कानूनी मीटिंग का भी आरोप है.

ऐसा कार्यक्रम पहली बार नहीं हुआ है. 2013 में अफजल गुरु को फांसी दिए जाने के बाद ये कार्यक्रम कई बार हो चुका है. इसलिए ये समझना मुश्किल है कि इस बार ऐसी कार्रवाई क्यों हुई.

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दिल्ली पुलिस ने एक हिंदी चैनल पर समाचार देखने के बाद स्वतःसंज्ञान लेते हुए एफआईआर दर्ज की. जेएनयू मामले को उछालने में भी इस चैनल की अहम भूमिका रही है.

अब तक पुलिस प्रेस क्लब के कार्यक्रम में किसी तरह की देश विरोधी गतिविधि के सबूत नहीं दे सकी है. मेरे पिता पुलिस के लिए आसान शिकार हैं.

आपने कहा डॉक्टर गिलानी आसान शिकार हैं, जबकि भारतीय कोर्ट ने संसद पर हमले मामले में उन्हें बरी किया था?


उस मामले से बरी हो जाने के बाद भी मेरे पिता का मीडिया ट्रायल चलता रहा. वो दक्षिणपंथी संगठनों के भी निशाने पर रहे हैं.

एबीवीपी ने कई बार उनके कार्यक्रमों में गड़बड़ी फैलाने की कोशिश की है. वो कहते हैं कि वो संसद पर हमले में शामिल थे और अदालत से बचने में कामयाब हो गए. क्यो ये पाखंड नहीं है? जब अफजल गुरु के मामले में वो कहते हैं कि उचित कानूनी प्रक्रिया का पूरा पालन किया गया और हमें अदालत के फैसले का सम्मान करना चाहिए तो मेरे पिता को बरी करने के फैसले का वो सम्मान क्यों नहीं करते?

जब आपके पिता पहली बार गिरफ्तार हुए थे तो आपकी उम्र क्या थी और उसके बाद आपको किन हालात से गुजरना पड़ा?


जब वो गिरफ्तार हुए तो मैं आठ साल की थी. वो दो साल 22 महीने जेल में रहे. उनके बरी हो जाने से हमें बड़ी राहत मिली लेकिन हमारी मुश्किलें पूरी तरह खत्म नहीं हुईं. उनके साथ हम जब भी कहीं जाते थे तो लोग 'गद्दार' या 'आतंकवादी' कह के ताना मारते थे. इसलिए वो अकेले बाहर जाने को प्राथमिकता देते थे.

फरवरी, 2005 में वकील नंदिता हक्सर के दफ्तर के बाहर उनपर हमला हुआ था?


हां, उनपर पांच गोलियां चलायी गई थीं. अभी दो गोलियां उनके बदन में ही हैं जिन्हें निकाला नहीं जा सका.

आपके अनुसार हमले के पीछे कौन था?


कुछ साल पहले टाइम्स ऑफ इंडिया अखबार में एक रिपोर्ट में आई थी जिसमें इसके पीछे खुफिया एजेंसियों का हाथ होने का संदेह जताया गया था. हालांकि इस बारे में आगे कुछ नहीं पता चला.

कन्हैया कुुमार पर पटियाला हाउस अदालत में जिस तरह हमला हुआ और अधिकारियों ने जिस तरह उसकी अनदेखी की उससे पता चलता है कि ऐसे मामलों में प्रशासन कैसे बरताव करता है.

क्या आपके पिता के संग जो हुआ उसी से आप वकील बनने को प्रेरित हुईं?


हां, बिल्कुल. मैं बचपन में संसद हमले की अदालती कार्यवाही में जाती थी. अपने पिता के अलावा मैंने कई दूसरे राजनीतिक बंदियों को भी देखा है जिनपर मनगढ़ंत आरोप लगाए गए थे.

क्या आपका परिवार कभी कश्मीर जाने के बारे में सोचता है?


मेरे पिता दिल्ली में रहकर संघर्ष करना चाहते हैं. वो यहां नौकरी करते हैं और वो अपना एक्टिविज्म जारी रखना चाहते हैं, खास तौर पर राजनीतिक बंदियों के लिए.
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लेकिन मैं कश्मीर वापस जाना चाहती हूं और वहां काम करना चाहती हूं. मैं गैर-कानूनी गिरफ्तारियों और मानवाधिकारों के हनन के खिलाफ काम करना चाहती हूं.

हमने काफी कुछ सहा है लेकिन मैं पीड़ित के रूप में नहीं जानी जाना चाहती. मैं चाहती हूं कि लोग मुझे फाइटर के रूप में जानें.

First published: 2 March 2016, 11:58 IST
 
आदित्य मेनन @adiytamenon22

एसोसिएट एडिटर, कैच न्यूज़. इंडिया टुडे ग्रुप के लिए पाँच सालों तक राजनीति और पब्लिक पॉलिसी कवर करते रहे.

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