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ये 50 दिन की बात नहीं, बैंक और एटीएम के बाहर क़तारें लंबे समय तक बनी रहेगी

मनोज पंत | Updated on: 11 February 2017, 5:45 IST
QUICK PILL
  • मोदी सरकार जिसे विमुद्रीकरण कह रही है, दरअसल वह करेंसी का रिप्लेसमेंट है. दोनों में एक बहुत मोटा फ़र्क़ है. यह नोटबंदी नहीं बल्कि नोट बदली है.
  • देश की जनता इसे विमुद्रीकरण मानकर भविष्य के लिए सुंदर सपने देख रही है तो उसे निराश होना पड़ेगा. 
  • बैंकों और एटीएम के बाहर रुपए निकालने के लिए क़तारे अभी कुछ महीने तक यूं ही लगी रहेंगी. इसका कोई लाभ होगा या नहीं, इसकी भी कोई गारंटी नहीं है. 

नोटबंदी को तीन हफ्ते हो चुके हैं और विपक्षी दल और आम लोग अब सड़कों पर हैं. बैंकों पर लंबी क़तारें लगी हुई हैं जिसके खत्म होने के आसार नहीं नज़र आ रहे हैं. बावजूद इसके आर्थिक मुद्दों पर जो शब्दाडम्बर है, उसे अलग किया जाना जरूरी है. इस मुद्दे पर जो गलतफहमियां हैं, उसे भी साफ़ किया जाना ज़रूरी है.

पहली बात तो यह है कि नोटबंदी का संदर्भ बाज़ार में चल रही करेंसी की कीमत में कमी से लिया जाता है. जैसे 100 रुपए का नया नोट पुराने 1,000 रुपए के नोट से बदला सकता है. मगर आमतौर पर यह उच्च मुद्रा स्फीति (मुद्रा स्फीति दर 500 फीसदी या अधिक होने पर) होने पर ही किया जाता है. यह तब होता है जहां पुरानी मुद्रा अपना सभी मूल्य गवां देती है. 

यह तरीका आमतौर पर 1970 के दशक में लैटिन अमरीका के कुछ देशों में अपनाया गया था. इसके बाद 1990 के दशक में रूस में तब अपनाया गया था, जब रूस सोवियत संघ से अलग हुआ था. लिहाज़ा, सरकार ने 8 नवम्बर को जो घोषणा की है, वह विमुद्रीकरण नहीं है बल्कि करेंसी का रिप्लेसमेन्ट (सीआर) है. 

1- नोटबंदी नहीं जनाब नोटबदली

सवाल यह है कि क्या सीआर का स्वागत किया जाना चाहिए? यह ज़रूरी नहीं है. अर्थशास्त्रियों की नज़र से देखा जाए तो ब्लैक इनकम से आय की दूसरी गतिविधियां सृजित हो जाती हैं. एक आकलन है कि रियल इस्टेट की 40 फीसदी काली राशि मजदूरी भुगतान, निर्माण सामग्री आदि में खर्च की जाती है. ठीक उसी तरह से जिस तरह से बाकी 60 फीसदी रकम खर्च की जाती है. हालांकि, इसमें बैंकिंग सुविधा नहीं ली जाती है और इस तरह से करों से बचने का रास्ता निकाल लिया जाता है. 

भारत में ब्लैक इनकम का जो कम से कम अनुमान किया गया है, वह जीडीपी का लगभग 20 प्रतिशत है. अगर ब्लैक इनकम को हटाने में सीआर 100 फीसदी कारगर है. तब जीडीपी का यह 20 फीसदी स्वतः ही लुप्त हो जाएगा. इसके जीडीपी पर पड़ने वाले प्रभाव पर पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पहले ही टिप्पणी कर चुके हैं. हालांकि, विकास दर पर पड़ने वाले इसके वास्तविक असर को ज्यादा गहराई से देखे जाने की जरूरत है. 

हर किसी को जीडीपी में और विकास दर पर लघुकालीन गिरावट को देखने के लिए तैयार रहना चाहिए. विरोधाभास तो यह है कि सीआर का जो नकारात्मक प्रभाव होगा, वह कम होगा और कालेधन को उजागर करने में कम सफल होगा.

2- जनता का दर्द बना रहेगा

यह कहना कि करेंसी रिप्लेसमेन्ट से जो तकलीफ होगी, वह कम समय के लिए होगी, यह भी सही नहीं है. स्व. अलफ्रेड मार्शल ने कहा था, 'आप एक तोते को एक अर्थशास्त्री के रूप में प्रशिक्षित कर सकते हैं. उसे सिर्फ दो ही शब्द सिखाने हैं- मांग और आपूर्ति.' लिहाज़ा, सीआर से केवल कालेधन की आवक पर असर पड़ता है. फिर भी, कालेधन की मांग बनी रहती है.

सीआर का स्थाई रूप से असर पड़े, इसके लिए ज़रूरी है कि सीआर को तुरन्त लागू कर इस मांग में कमी लाई जाए. इसके लिए सबसे अच्छा रास्ता यही है कि सरकार लाइसेंसों और कॉन्ट्रैक्ट्स के जोखिम न उठाए. एक महत्वपूर्ण क्षेत्र रियल इस्टेट और स्टाम्प ड्यूटी का है. यह राज्य का विषय है और कोई भी यह प्रयास करने की दिशा में जागरूक नहीं हैं कि इस मुद्दे पर राज्यों के बीच समन्वय स्थापित हो. 

उदाहरण के लिए इमारतों के लिए समय सीमाबद्ध लाइसेंस देकर या स्टाम्प ड्यूटी में कमी कर यह काम किया जा सकता है. अगर अगले चार या पांच साल के लिए यह काम कर लिया जाता है तो कालाधन चलन में आ जाएगा और फिर वर्तमान का जो संकट है, उसे वहन नहीं करना पड़ेगा.

3- डिजिनल इकोनॉमी की तैयारी?

करेंसी रिप्लेसमेन्ट से डिजिटल इकोनॉमी का सृजन होगा. इसका जोर-शोर से प्रचार किया जा रहा है. लेकिन लगता है कि इसका मोबाइल पेमेन्ट ऑपरेटरों जैसे पेटीएम, फ्रीचार्ज आदि से ध्रुवीकरण कर लिया गया है. हालांकि, यह तथ्य भुला दिया जाता है कि मोबाइल से भुगतान तभी हो सकता है जब इंटरनेट की सुविधा उपलब्ध हो. मोबाइल फोन पर इंटरनेट की सुविधा लेना काफी खर्चीला है, वाईफाई सुविधा लेना भी काफी महंगा है और इसके लिए स्मार्टफोन खरीदना होता है. 

साल 2015 में ट्राई ने एक सर्वे कराया था. उसके मुताबिक भारत में इंटरनेट सब्सक्राइबर्स का प्रतिशत सिर्फ 24 था. ग्रामीण क्षेत्रों में तो और भी कम था 12 फीसदी से भी कम. औसतन, एक मोबाइल फोन यूजर लगभग 120 रुपए खर्च करता है. 

जो लोग इकोऩॉमी में 'डिजीटाइजेशन' की बात करते हैं, वे यह भूल जाते हैं कि भारत में मोबाइल फोन का इस्तेमाल लोग बातचीत करने के लिए करते हैं, उनके लिए यह संचार का माध्यम है. इससे वे लेनदेन नहीं करेंगे. ऐसे में डिजीटाइजेशन करने में अगले चार-पांच साल का समय लग जाएगा और एक बार फिर सीआर का वक्त आ जाएगा. 

4- बढ़ सकती है ब्याज दर

सीआर से धन की आपूर्ति में इजाफा होता है और इससे ब्याज दर कम होती है. यह बात तब तक सही है जब तक कि 8 लाख करोड़ रुपए की जो जमा है, वह बैंकिंग सिस्टम के पास बनी रहे. हालांकि रिजर्व बैंक ने जो हायर कैश रिजर्व रेशो की घोषणा की है, उससे सभी बढ़ी हुई करेंसी सिस्टम से बाहर हो जाएगी. इससे बैंकों के पास धन की आपूर्ति घटेगी और ब्याज दरों में इजाफा हो सकता है.

लाइन लगी रहेगी

अंत में यही कहना है कि हाल में सीआर का जो सूत्रपात किया गया है, वह अधिकांशतः या आंशिक रूप से बुरा है लेकिन कई तरह से अच्छा भी है. वरना काली आय को कम करने का जो तरीका है, उसे अधिसूचित किया जाता और निकट भविष्य में क्रियान्वित किया जाता. ऐसे में तो सीआर से तो कुछ भी नहीं मिल पाता. 

सीआर से जीडीपी में जो व्यवधान पैदा होगा, वह तो बना ही रहेगा और सरकार के लिए भी परेशानी का सबब बना पड़ेगा. अब तक हम लोगों को सिर्फ़ यही जानकारी मिल पाई है कि सिर्फ 20 फीसदी ही पुराने नोट नए नोटों में बदले गए हैं. ऐसे में तो हममें से अधिकांश लोगों के लिए अगले कुछ महीनों तक लम्बी लाइन में लगे रहना जीवन का हिस्सा बना रहेगा. लिहाज़ा, तब तक सिर्फ मुस्कारते रहिए और झेलते रहिए.

First published: 30 November 2016, 7:47 IST
 
मनोज पंत @catchhindi

लेखक जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी, नई दिल्ली स्थित अंतरराष्ट्रीय व्यापार एवं विकास केंद्र में प्रोफेसर हैं

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