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डोभाल का नाम, जाधव की गिरफ्तारी, पाक जेआईटी के दौरे के समय ही क्यों उछले?

विवेक काटजू | Updated on: 1 April 2016, 23:17 IST
QUICK PILL
  • जब पाकिस्तानी जांच दल पठानकोट हमले की जांच के लिए भारत आया था तभी कुलभूषण जाधव का मामला जानबूझ कर उठाया गया. पाक सेना ने भारतीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल को भी मामले में घसीटने की कोशिश की है.
  • पाकिस्तानी सेना ने ये दिखाने की कोशिश की है कि वही देश की असल सूत्रधार है. उसने प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ को भी एक तरह से संदेश दिया है. वहीं भारत ने पाक जांच दल की यात्रा के बाद भारतीय जांच दल के पाकिस्तान दौरे की मांग रखी है.

जिस तरह पाकिस्तानी सूचना मंत्री परवेज़ राशिद और इंटर सर्विस पब्लिक रिलेशंस (आईएसपीआर) के डायरेक्टर जनरल लेफ्टिनेंट जनरल असीम बाजवा ने 29 मार्च को तथाकथित भारतीय जासूस कुलभूषण जाधव पर संयुक्त प्रेस वार्ता की वो भारत के लिए एक खुला संदेश है.

भारतीय मीडिया ने बाजवा के बयान पर जरूरी तवज्जो नहीं दी लेकिन ये साफ है कि पाकिस्तानी सेना भारत के संग द्विपक्षीय रिश्ते सुधारने को लेकर गंभीर नहीं है. ऐसा नहीं होता तो बाजवा सार्वजनिक रूप से ये नहीं करते कि "जाधव के अनुसार वो सीधे भारतीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजित डोभाल और रॉ अधिकारी एके गुप्ता से जुड़े हुए थे."

ये एक बेतुका बयान था क्योंकि कोई भी एनएसए, चाहे वो आईबी का पूर्व प्रमुख ही क्यों न हो, खुफिया सूचनाएं इकट्ठा करने में उसकी कोई सीधी भूमिका नहीं होती. ऐसे में सवाल ये है कि बाजवा ने ऐसा क्यों कहा?

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भारतीय एनएसए अजित डोभाल और पाकिस्तानी एनएसए लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) नासिर जंजुआ के बीच शांतिपूर्वक चल रही बातचीत में कुछ सफलता मिलती दिख रही थी.

ऐसा दावा किया गया कि 10 आतंकियों के भारत में घुसपैठ करने की जानकारी जंजुआ ने ही डोभाल को दी थी. जिसके बाद भारत के गृह सचिव ने दावा किया कि उनमें से तीन आतंकियों को 'पश्चिमी भारत में कहीं' मार गिराया गया.

पाकिस्तान सेना ने जानबूझ कर जेआईटी के दौरे के समय उठाया कुलभूषण जाधव का मामला

पठानकोट हमले के बाद पाकिस्तान ने जिस तरह की प्रतिक्रिया दी, उसकी जेआईटी यहां आकर जांच करने आई, उसे भारत के नए नजरिए का संकेत माना गया. फिर भी बाजवा ने क्यों डोभाल का नाम लेना जरूरी समझा? वो भी तब जब जाधव ने वीडियो में केवल गुप्ता का नाम लिया था. (भारत ने स्पष्ट किया है कि एके गुप्ता का नाम का कोई भी अधिकारी रॉ में नहीं है.)

बाजवा के ताजा बयान से ये साफ लगता है कि डोभाल और जंजुआ के बीच चाहे जैसी भी बातचीत चल रही हो पाकिस्तानी पर ज्यादा भरोसा दिखाना अति-उत्साह है.

प्रेस वार्ता के दौरान जिस तरह राशिद लगभग चुप ही रहे और बाजवा बोलते रहे उससे जाहिर है कि इस प्रेस वार्ता में प्रधान मंत्री नवाज शरीफ को भारत-नीति के मामले में सेना के आगे झुकना पड़ गया.

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भारत ने उचित ही जाधव के वीडियो खारिज किया है. बाजवा जिस आईएसआई को दुनिया की सर्वश्रेष्ठ एजेंसियों में से एक बता रहे थे उसने बहुत सतही काम किया. जब तक भारतीय अधिकारियों को जाधव से नहीं मिलने दिया जाता तब तक ये नहीं पता चलेगा कि वो आखिर पाकिस्तान के कब्जे में कैसे आए. बाजवा इस सवाल को यह कहकर टाल गए कि 'वक्त आने पर वो इसपर आएंगे.'

बाजवा ने कहा कि जाधव को मार्च के पहले हफ्ते में गिरफ्तार किया गया था. आखिर पाकिस्तानी अधिकारियों ने इस मामले को पाकिस्तान में भारतीय उच्चायुक्त गौतम बंबावाले के सामने मामला उठान के लिए 25 मार्च का इतंजार क्यों किया? निस्संदेह वो पाकिस्तानी जेआईटी के भारत आने का इंतजार कर रहे थे. भारत भले ही उनकी चाल में न फंसा हो पाकिस्तान में जेआईटी के भारत दौरे का मामला जाधव के 'कबूलनामे' में दब सा गया.

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जाधव के मामले से लाहौर में हुए आतंकी धमाके के मामले में पाकिस्तानी अधिकारियों को चेहरा छिपाने का बहाना मिल गया. लाहौर नवाज शरीफ़ का गढ़ है. इस आतंकी हमले से उन्हें सीधी चुनौती मिली. इस धमाके से आतंकियों के तुष्टिकरण नीति की भी पोल खुल गई, जिसके माध्यम से वो पंजाब में आतंकी हिंसा पर नियंत्रण रखना चाहते थे.

इन घटनाक्रमों के बाद नवाज शरीफ ने अमेरिका में परमाणु सुरक्षा समिति की बैठक में जाने का योजना रद्द कर दी.

पाकिस्तानी जांच दल के पठानकोट दौरे के बाद भारत ने अपने जांच दल को पाकिस्तान भेजने की मांग रखी है

बाजवा के भारत-विरोधी बयान से ये भी नहीं समझना चाहिए कि उनके निशाने पर केवल भारत था. बाजवा ने दावा किया कि जाधव भारतीय सेना के अधिकारी हैं और भारत बलूचिस्तान और कराची में आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा है.

इस मामले में चीन को घसीटते हुए बाजवा ने किया कि जाधव पाकिस्तान-चीन इकॉनोमिक कॉरिडोर को ध्वस्त करना चाहते थे.

बाजवा ने दावा किया कि ईरानी खुफिया सेवा को जाधव के बारे में पता था. ईरानी उनके इस बयान से खुश नहीं हुए. बाजवा ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से आतंकवाद पर भेदभाव न करने की अपील की. उन्होंने संयुक्त राष्ट्र समेत अन्य अंतरराष्टरीय मंचों पर भी इस मुद्दे को उठाने की बात कही.

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ऐसे में देखना ये है कि अतंरराष्ट्रीय समुदाय उनकी बात को कैसे लेता है. लेकिन पहले पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय समुदाय में अपनी आतंक के खिलाफ गंभीरता साबित करनी होगी. जेआईटी की भूमिकी यहीं से शुरू होती है.

पाकिस्तानी जेआईटी को लेकर भारत में जिस तरह की राजनीति हुई उससे भी साफ है कि भारतीय राजनेताओं के लिए पाकिस्तान आतंकवाद केवल राजनीतिक बढ़त हासिल करने का जरिया भर है.

भारत के पास जेआईटी को जांच की इजाजत देने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं था. पाकिस्तान में कानूनी कार्रवाई करने के लिए साझा सबूत जुटाना जरूरी था. लेकिन भारत इस दौरे के बेहतर तरीके से बरत सकता था.

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रक्षा मंत्री मनोहर पर्रीकर ने पठानकोट में जेआईटी के दौरे पर परस्पर विरोधी बयान दिए. जिनकी कोई जरूरत नहीं थी.

पठानकोट में पाकिस्तानी जांच दल को दौरे की अनुमति देने के बाद भारत अपनी राष्ट्रीय जांच एजेंसी(एनआईए) के पाकिस्तान दौरे की मांग रखी है.

इस बात की बहुत कम उम्मीद है कि पाकिस्तान एनआईए को ऐसी इजाजत देगा. बड़ा सवाल ये भी है कि अगर ऐसे दौरे को इजाजत मिलती है तो क्या पाकिस्तान भारतीय जांच दल को जैश-ए-मोहम्मद के प्रमुख मसूद अज़हर से पूछताछ करने देगा?

ऐसे में भारतीय प्रधानमंत्री को पाकिस्तान मामले पर अपनी नीति साफ करनी होगी. उन्हें इस मामले में किसी भी बुरे निवेश से परहेज करना चाहिए.

First published: 1 April 2016, 23:17 IST
 
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