Home » इंडिया » Why People Are Starving In Ranchi
 

बायोमीट्रिक प्रूफ रांची में भूख से मरने की नौबत क्यों है?

श्रिया मोहन | Updated on: 9 September 2016, 8:17 IST

झारखंड के रांची में अकेले ही रहने वाले 60 वर्षीय चारु ओरावं के पास आमदनी का कोई जरिया नहीं है. वह किसी तरह अपना गुजर-बसर कर लिया करते हैं. 

खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत हर माह मिलने वाले अनाज पर ही वो पूरी तरह निर्भर है. पर जून से सब्सिडाइज्ड राशन लेने के लिए बॉयोमीट्रिक पहचान को अनिवार्य बना दिया गया है जिस कारण उन्हें राशन नहीं मिल पा रहा है.

ओरावं को भी आश्वासन दिया गया था कि रांची के सभी लोगों की तरह उन्हें भी बॉयोमीट्रिक प्रणाली से राशन मिलेगा. इसके लिए बॉयोमीट्रिक मशीन पर अंगूठा लगाना पड़ेगा, मशीन में से बीप की आवाज आने के बाद उसे राशन मिल जाएगा. अब ओरावं के पास यूआईडी तो है लेकिन राशन नहीं. 

जून महीने से लगातार कोशिश करने के बाद भी उनसे कहा जा रहा है कि उसकी बॉयोमीट्रिक पहचान काम नहीं कर रही है. उसके अंगुलियों के निशान बायोमीट्रिक से मेल नहीं खा रहे हैं.

ऐसे में नई व्यवस्था लागू होने के बाद से उन्हें जन वितरण प्रणाली के तहत अनाज मिलना ही बंद हो गया है. इसका मतलब यह हुआ कि पूरे, जून, जुलाई और अगस्त में वह भूखे पेट ही रहे. जून के पहले ओरावं को पुरानी रजिस्टर व्यवस्था के अनुसार अनाज आराम से मिल जाता था.

जून से झारखंड के रांची जिले में जन वितरण प्रणाली (पीडीएस) के तहत राशन लेने वालों के लिए आधार- आधारित बॉयोमीट्रिक पहचान को जरूरी कर दिया गया है अर्थात जिसके पास आधार कार्ड होगा, उसी को राशन मिलेगा. इसमें जन वितरण प्रणाली की दुकानों पर प्वाइन्ट ऑफ सेल (पीओएस) मशीनें लगाना भी शामिल था ताकि इंटरनेट पर मौजूद आधार कार्ड के डाटा के आधार पर राशनकार्ड धारक के फिंगरप्रिन्ट्स से उपभोक्ता की पहचान की जा सके.

लेकिन इतनी लम्बी-चौड़ी कवायद के बाद भी पॉयलट जिले रांची में इस योजना के दायरे में आने वाले लोगों में से केवल आधे ही लोगों को जून से राशन मिल सका है. 

वरिष्ठ भारतीय अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज द्वारा जारी एक प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार- 'सरकार के खुद के आंकड़े, जो आसानी से एनएफएसए वेबसाइट पर उपलब्ध है, दर्शाते हैं कि यह व्यवस्था काफी कठिन दौर से गुजर रही है. जुलाई 2016 में, रांची जिले के एनएफएसए कार्डधारकों में मुश्किल से केवल आधे कार्डधारकों को ही जन वितरण प्रणाली से अनाज मिल सका है.

विफल बायोमीट्रिक सिस्टम की वजह से झारखंड के सैंकड़ों आदिवासियों को पीडीएस से राशन तक नहीं मिल पा रहा है.

अगस्त में भी यही बानगी देखी गई. पीओएस व्यवस्था के जरिए एनएफएसए कार्डधारकों में से सिर्फ 53 फीसदी को ही अनाज मिला. सम्भवतः इस विफलता की वजह आधार कार्ड बनाने में जिस टेक्नॉलाजी का इस्तेमाल किया गया है, उसका झारखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में पूरी तरह से उपलब्ध नहीं होना है.

नए सिस्टम में यह जरूरी है कि छोटी-छोटी कई तरह की टेक्नॉलाजी एक साथ ही काम करे. मसलन- पीओएस मशीन, बॉयोमीट्रिक्स, रिमोट सर्वर और मोबाइल नेटवर्क आदि. इसके अलावा डाटा ग्राउंडवर्क (आधार कार्ड के आंकड़ों समेत) को भी ठीक तरह से काम करना चाहिए.

आधार को राशन कार्ड के बॉयोमीट्रिक से लिंक करना जरूरी है तभी ठीक तरह से किसी की पहचान हो सकेगी. नहीं तो ओरावं जैसे लोगों की तरह काफी लोगों को इस समस्या से गुजरना पड़ेगा क्योंकि उनके फिंगरप्रिंट्स समुचित रूप से लिंक हुए होंगे.

झारोखंड में इंटरनेट कनेक्टिविटी की बड़ी समस्या है, यहां तक कि राज्य की राजधानी में भी. कनेक्टिविटी समस्या हर जगह है. इस समस्या को दूर किए जाने की जरूरत है. कोई आश्चर्य नहीं, तब पीडीएस के तहत लाभ लेने वाले कई उपभोक्ता अनाज लेने से वंचित रह जाएंगे.

बायोमीट्रिक सिस्टम में पहचान नहीं होने के कारण लाभार्थियों के हिस्से का अनाज काला बाजार में बेच दिया जाता है.

द्रेज ने कैच को बताया कि बॉयोमीट्रिक सिस्टम से हेरफेर की गुंजाइश खत्म हो जाएगी. पर इसका दूसरा पहलू भी है. जो लोग बॉयोमीट्रिक से जुड़े हुए हैं और उनकी बॉयोमीट्रिक पहचान नहीं हो पाती है, उन्हें वापस लौटा दिया जाता है. ऐसे में उनके पास अनाज प्राप्त करने का कोई विकल्प नहीं बचता है. डीलर्स भी नए सिस्टम का हवाला देकर लोंगो का शोषण कर रहे हैं.

आखिरकार लगभग सभी वितरक अनाज को काला बाजार में बेच देते हैं. उधर, झारखंड सरकार ने आने वाले महीनों में पूरे झारखंड में तेजी से बॉयोमीट्रिक प्रणाली चालू करने का दावा किया है. ओरावं जैसे लोगों के लिए तो यह व्यवस्था उनकी समस्याएं ही बढ़ाएगी.

आधिकारिक रूप से पुरानी रजिस्टर व्यवस्था को पूरी तरह से खत्म करने की अनुमति नहीं दी गई है. इसकी वजह यही है कि बॉयोमीट्रिक सिस्टम के काम न करने पर किसी को अनाज ही नहीं मिल सकता. द्रेज ने कहा कि लेकिन ऐसा अनाधिकारिक रूप से हो रहा है. 

बदतर दोहरी व्यवस्था

यह दोहरी व्यवस्था बदतर है. कुछ लोगों को पीडीएस का अनाज पीओएस सिस्टम से दिया जा रहा है तो बाकी को पुरानी रजिस्टर व्यवस्था के जरिए. इसका कारण यह है कि डीलर्स को रजिस्टर व्यवस्था की खामियों के बारे में मालुम है.

नए सिस्टम में पीडीएस के तहत अनाज के लेन-देन का ब्यौरा ऑनलाइन रहेगा. इससे भ्रष्टाचार पर लगाम लग सकेगी. झारखंड जैसे राज्य ने जहां हाल के वर्षों में काफी तरक्की की है, वह जन वितरण प्रणाली में भ्रष्टाचार की समस्या से जूझ रहा है.

संयोगवश, सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेशों में आधार को पीडीएस के लिए लिंक करने का आदेश दिया था, पर इसे वैधानिक बनाया जा रहा है. कोर्ट ने आधार को पीडीएस के लिए इस्तेमाल करने की अनुमति दी थी लेकिन इसे अनिवार्य नहीं बनाया था. यह उसके पूर्व के आदेशों का उल्लंघन है कि आधार को किसी भी जनोपयोगी सेवा के लिए अनिवार्य बनाया जा रहा है.

सरकार भी इस कदम को आधार अधिनियम के तहत न्यायोचित नहीं ठहरा सकती क्योंकि अभी अधिनियम की प्रासंगिक धारा 7 को अधिसूचित किया जाना बाकी है.

दुर्भाग्यवश राज्य सरकारों का भी रवैया ठीक नहीं दिखता है. झारखंड और राजस्थान में इसकी विफलता के बढ़ते सबूतों को देखते हुए द्रेज का मानना है कि जहां तक पीडीएस का सवाल है, आधार आधारित पीओएस मशीनें बड़े पैमाने पर विध्वंस के छोटे हथियार साबित हो सकती हैं. 

द्रेज कहते हैं कि ऐसी भी कई ऑफलाइन टेक्नॉलाजी है जिसके इस्तेमाल से भ्रष्टाचार का खात्मा किया जा सकता है.

लेकिन नेटवर्क हो या नहीं, सरकार अगले कुछ महीनों में ही इस टेक्नोलॉजी को पूरे राज्य में लागू करने की योजना बना रही है. कुछ भी हो, भूख से होने वाली कितनी मौतें सरकार को यह एहसास कराएंगी कि उसकी टेक्नोलॉजी को उन लोगों पर आजमाइश के लिए प्रयोग में नहीं लाया जा सकता जो पहले से ही भूख से बिलबिला रहे हैं.

First published: 9 September 2016, 8:17 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी