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राहुल गांधी होंंगे उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार?

आनंद कोचुकुड़ी | Updated on: 8 May 2016, 8:46 IST
QUICK PILL
  • पिछले कुछ दिनों के दौरान मीडिया में लगातार इस तरह की खबरें आई है कि चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने उत्तर प्रदेश चुनाव के लिए राहुल गांधी को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने का सुझाव दिया है.
  • कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं और प्रवक्ताओं ने इस खबर को पूरी तरह से खारिज कर दिया है. कुछ लोगों का कहना है कि किशोर की रणनीति के हवाले से राहुल गांधी की पीएम की उम्मीदवारी को लेकर साजिश की जा रही है.

पिछले कुछ दिनों के भीतर यह खबर आई कि चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने पार्टी के वाइस प्रेसिडेंट राहुल गांधी को उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान उन्हें मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने का सुझाव दिया है. 

उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा के चुनाव होने हैं. मीडिया ने इससे पहले खबर दी थी कि किशोर ने इस सिलसिले में प्रियंका गांधी के नाम का सुझाव दिया था लेकिन उन्होंने इस मामले में कोई रुचि नहीं दिखाई थी.

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने 2 अप्रैल को ही इस तरह की खबरों को बकवास करार देते हुए कहा था कि उन्हें तो राहुल गांधी के कांग्रेस का प्रेसिडेंट बनने की उम्मीद है और वह भी 2016 में. यहां तक की ज्योतिरादित्य सिंधिया और पार्टी के अन्य बड़े नेताओं एवं प्रवक्ताओं ने इसी लाइन का समर्थन किया.

जयराम रमेश ने राहुल गांधी को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री का उम्मीदवार बनाए जाने की खबर को बकवास बताया

किशोर की रणनीति को लेकर षडयंत्र की कहानियां सुनने को मिल रही है मसलन किशोर, नीतीश कुमार की मदद कर रहे ताकि कुमार 2019 में प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बन सकें. इसके लिए वह राहुल गांधी को रास्ते से हटाना चाहते हैं. किशोर को नीतीश कुमार बिहार में कैबिनेट मंत्री का दर्जा भी दे चुके हैं. 

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के पास कोई बड़ा चेहरा भी नहीं है और यह भी तुक्केबाजी की एक बड़ी वजह है.

राहुल गांधी को उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की तरफ से मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने के पक्ष और विपक्ष में कई तर्क हो सकते हैं. 

पहला तो यह कि 2014 के बाद कांग्रेस को किसी चुनाव में सफलता नहीं मिली है. आम चुनाव में भी कांग्रेस को बुरी हार का सामना करना पड़ा था और वह महज 44 सीटों पर सिमट कर रह गई. 

पिछले आम चुनाव में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा और वह महज 44 सीट पर सिमट कर रह गई

बिहार में महागठबंधन की सफलता में भी कांग्रेस के लिए कुछ नहीं रहा. वह जेडीयू और आरजेडी की सफलता ज्यादा थी जिसमें कांग्रेस को भी फायदा हुआ.

जब बीजेपी ने कांग्रेस मुक्त भारत का आह्वान कर रखा है तब उन्हें भी नहीं लग रहा है कि यह उतना आसन होगा. इस महीने केरल और असम में चुनाव होने हैं और सर्वेक्षणों के मुताबिक आ रही खबर इस धारणा के मुताबिक नहीं है.

कांग्रेस मुक्त भारत में कांग्रेस बस दक्षिण के एक राज्य कर्नाटक और पहाड़ी राज्य हिमाचल तक सीमित हो सकता है. इसमें उत्तराखंड को भी जोड़ा जा सकता है. अगर रावत शक्ति परीक्षण में बहुमत साबित कर दे तो. इसके अलावा मेघालय, मिजोरम और मणिपुर को भी इस कड़ी में शामिल किया जा सकता है.

2019 तक खत्म हो जाएगी कांग्रेस?

हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में अगले साल चुनाव होने हैं. इन दोनों राज्यों में बारी-बारी से सरकारें बदलती रहती हैं. इसका मतलब यह हुआ कि कांग्रेस केवल एक राज्य कर्नाटक और पूर्वोत्तर के तीन छोटे राज्यों तक सिमट कर रह सकती है.

बीजेपी के नेशनल प्रेसिडेंट अमित शाह लगातार देश को कांग्रेेस मुक्त करनेे की बात करते रहे हैं

पंजाब और गुजरात में अगर कांग्रेस नहीं जीत पाती है तो उसे काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है. पूर्वोत्तर में अगर मणिपुर में अरुणाचल जैसी स्थिति पैदा हो जाती है तो कांग्रेस की मुश्किल कई गुणा बढ़ जाएंगी. 

वहीं हिंदी क्षेत्र में कांग्रेस कहीं से भी अगले कुछ सालों के दौरान वापसी करती नहीं दिखाई दे रही है. कर्नाटक में 2018 में चुनाव होने हैं और बीजेपी इससे पहले अपने दागी लेकिन कद्दावर नेता बीएस येदियुरप्पा को पार्टी में वापस ला चुकी है. इस लिहाज से 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेेस के लिए बुरे स्वप्न की तरह होगा जब उसके पास एक भी राज्य की सत्ता नहीं होगी. यह अभी दूर की कौड़ी लग सकती है लेकिन असंभव नहीं है.

हालांकि जरूरी नहीं कि यह सच हो जाए. 

राहुल गांधी पर पार्टी का दांव?

कांग्रेस पार्टी और उत्तर प्रदेश में मरणासन्न पड़ी राज्य इकाई के लिए एक रास्ता यह हो सकता है कि वह राहुल गांधी को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दे. इसका मतलब यह नहीं हुआ कि अगर उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को शानदार जीत मिलती है तो वह अपने आप को 2019 में मोदी के खिलाफ खड़ा कर पाएंगे.

2012 से 2013 तक मोदी खुद को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के लिए आगे बढ़ाने से लेकर घोषित होने तक गुजरात के मुख्यमंत्री थे. उन्होंने विधानसभा चुनाव में पार्टी का नेतृत्व किया था. यहां तक कि प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के कुछ दिन पहले ही उन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया.

अगर राहुल गांधी जनता दल यूनाइडेट और राष्ट्रीय लोक दल के साथ मिलकर पार्टी को 100 से अधिक सीट नहीं दिला पाए तो भी यह 2019 के लिहाज से अच्छी स्थिति होगी. ऐसा इसलिए क्योंकि तब कई विपक्षी पार्टियां मोदी के खिलाफ एक मंच पर नजर आएंगी. बीजेपी ने तब उत्तर प्रदेश को सबसे अधिक प्राथमिकता दी थी क्योंकि उन्हें पता था कि अगर  केंद्र में 2014 में सरकार बनानी है तो इसके लिए उत्तर प्रदेश को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.

2017 में उत्तर प्रदेश के नतीजे पड़ोसी राज्य राजस्थान और मध्य प्रदेश को भी प्रभावित करेंगे. ऐसे में मुख्यमंत्री पद के किसी लोकप्रिय उम्मीदवार की गैर मौजूदगी में कांग्रेस को एक बार फिर से चौथे पायदान पर जाना पड़ेगा. वह भी तब अगर ओवैसी की पार्टी कुछ बड़ा नहीं कर पाई.

हालांकि राहुल को यह जोखिम इसलिए भी लेना चाहिए ताकि वह लोगों को यह बता सके कि वह जोखिम ले सकते हैं और आगे आकर पार्टी को नेतृत्व दे सकते हैं.

उत्तराखंड और अरुणाचल प्रदेश की हालियाा घटना यह बताती है कि राहुल गांधी को फिलहाल पार्टी के प्रेसिडेंट की अतिरिक्त जिम्मेदारी से बचना चाहिए. असम में विद्रोह के बाद हेेमंत बिस्वा शर्मा कांग्रेस छोड़कर जा चुके हैं. केरल में टिकट वितरण को लेकर घमासान मचा हुआ है. अभी भी कांग्रेस के पास अन्य दलों के मुकाबले बेहतरीन नेता है. इससे पहले कि हिंदी क्षेत्र के नेता कांग्रेस से नाता तोड़ने लगे, राहुल गांधी को पार्टी का नेतृत्व देना ऐतिहासिक बदलाव होगा.

First published: 8 May 2016, 8:46 IST
 
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