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बैंकिंग सेक्टर का एनपीए बढ़ रहा है, लेकिन यह चिंता की बात नहीं है

नीरज ठाकुर | Updated on: 30 June 2016, 13:50 IST
(कैच)

भारतीय रिजर्व बैंक ने साल 2016 की पहली द्विवार्षिक फाइनेंसियल स्टैबिलिटी रिपोर्ट (एफएसआर) जारी की है. इस रिपोर्ट के अनुसार ताजा वित्त वर्ष के दौरान बैंकिंग सेक्टर में ग्रॉस नॉन-परफॉर्मिंग एसेट (जीएनपीए) बढ़कर 9.3 % प्रतिशत हो सकता है. अभी इसकी दर 7.3 % है.

इसका मतलब ये हुआ कि 19 महीनों (सितंबर 2015 से मार्च 2017) के बीच बैंकिंग सेक्टर के जीएनपीए में 430 परसेंटेज प्वाइंट की बढ़ोतरी का अनुमान है. 

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सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (पीएसबी) पर इस दौरान ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ेगा. सामान्य परिस्थितियों में पीएसबी का जीएनपीए मार्च 2017 तक 10.1 % जा सकता है. मार्च 2016 में ये दर 9.6% थी. अगर हालात बहुत खराब भी हुए तो मार्च 2017 तक ये दर 11 % हो सकती है.

चिंता वाजिब है?

अगर कुल एनपीए लंबे समय में धीरे-धीरे सामने आता ये चिंता का विषय हो सकता था लेकिन रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने सभी बैंकों को मार्च, 2017 तक कुल बैड लोन सार्वजनिक करने के लिए कहा है.

हमें राजन का इस बात के लिए धन्यवाद कहना चाहिए कि उन्होंने भारतीय बैंकों द्वारा अपनी बैलेंस शीट में बैड लोन की जानकारी न देने की गलत परंपरा को बंद करने की शुरुआत की. चालू वित्तीय स्थिति की गुलाबी तस्वीर दिखाने के चक्कर में भारतीय बैंक अर्थव्यवस्था का ज्यादा नुकसान करते हैं.

बैड लोन की जानकारी सार्वजनिक होने की स्थिति में बैंक प्रबंधन पर ऐसी कंपनियों को ही लोन देने का दबाव होगा जो उसे लौटाने के प्रति गंभीर दिखेंगी.

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बैंकों द्वारा लोन न चुकाने वालों (विलफुल डिफॉल्टर) की सूची के अनुसार करीब 5000 कर्जदारों ने जानबूझकर बैंक का कर्ज नहीं चुकाया. ऐसे लोगों पर सरकारी बैंका का करीब 50 हजार करोड़ रुपये बकाया हैं.

कर्जदारों के अलावा बैंकों को इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि जिसे कंपनी वो कर्ज दे रहे हैं उसकी आर्थिक सेहत कैसी है.

अतीत में जो कंपनी जितनी बड़ी थी उसपर उतना अधिक कर्ज था. उन्हें कर्ज देने से पहले गंभीर मूल्याकंन नहीं किया गया था.

बैंकिंग सेक्टर से उपरने के रास्ते

सरकार ताजा बैंकिंग संकट से उबरने के लिए रास्ते तलाश कर रही है. इसके लिए सरकार ने साल 2015 से 2019  के बीच पीएसयू बैंकों में 70 हजार करोड़ रुपये के निवेश की योजना बनाई थी.

2019 से बैसेल-III नॉर्म लागू हो जाएगा. बैसेल-III  एक वैश्विक नियामक प्रतिमान है. बैसेल कमिटी के सभी सदस्य देशों ने इसपर दस्तखत किया है. इस प्रतिमान के तहत कैपिटल एडिक्वेसी, स्ट्रेस टेस्टिंग और मार्केट लिक्विडिटी रिस्क इतयादि का नियमन किया जाता है.

नए बैसेल नॉर्म के तहत भारतीय पीएसबी में 2.4 लाख करोड़ रुपये निवेश की जरूरत होगी. ऐसे में जाहिर है कि सरकार जितने राशि की नियत की है वो जरूरत से कम है. 

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इसके समाधान के लिए आरबीआई के अतिरिक्त फंड को बैंकों को देने पर विचार किया जा रहा है. इसके अलावा भी बैंकों को दूसरे तरीकों से वित्तीय मदद मिल सकती है लेकिन उन्हें ये भी समझना होगा ऐसा हर बार नहीं हो सकता. हर बार उनकी गलती सुधारने के लिए कोई दूसरा सामने नहीं आएगा.

सरकार, बैंकों और निवेशकों सभी को ये ध्यान रखना होगा कि सावधानी ही बचाव है. राजन की कभी नरम कभी गरम की नीति ने भारतीय बैंकिंग सेक्टर को एनपीए से काफी हद तक बचाया है. अब जरूरत है उससे आगे बढ़ने की.

First published: 30 June 2016, 8:07 IST
 
नीरज ठाकुर @neerajthakur2

As a financial journalist, his interface with the two dominant 'isms'- Marxism and Capitalism- has made him realise that an ideal economic order of the world would lie somewhere between the two. Associate Editor at Catch, Neeraj writes on everything related to business and the economy. He has been associated with Businessworld, DNA and Business Standard in the past. When not thinking about stories, he is busy playing with his pet dog, watching old Hindi movies or searching through the Vividh Bharti station on his Philips radio transistor.

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