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बलात्कारी सैनिक: कहीं ऐसा न हो कि फूल बरसाने वाले हाथ पत्थर उठा लें

पाणिनि आनंद | Updated on: 31 December 2015, 8:32 IST
QUICK PILL
  • मणिपुर की मनोरमा के बलात्कार के बाद एक बार फिर से सेना के जवानों की हैवानियत सामने आई है. हावड़ा-अमृतसर एक्सप्रेस में सेना के जवानों ने चलती रेलगाड़ी में 14 साल की बच्ची के साथ गैंगरेप किया है.
  • ताबूत और जूतों तक में घोटाला इसी देश में हुआ है और सेना के अधिकारियों और मंत्रालय की मिलीभगत से हुआ है. लेकिन इस देश की आम जनता ने उस सेना को हमेशा सर आंखों पर ही रखा.

वो हमारे प्रहरी हैं, आपात स्थितियों में हमारी आखिरी उम्मीद हैं. सीमा की सुरक्षा हो, आपदाओं का चक्रवात हो, भूकंप, बाढ़ जैसे संकट हों या दंगों और आतंकवादी हमलों जैसी चुनौतियां, ये हमारी रक्षा करते हैं, हमारा कवच बनते हैं. हम उन्हें अपनी हिफ़ाजत का ज़िम्मा सौंपकर यह उम्मीद करते हैं कि अब मुल्क सुकून से बाकी काम करेगा, इस तरह देश आगे बढ़ेगा.

इस लेख को लिखते हुए दिमाग में बहुत कुछ चल रहा है. अचानक ही मणिपुर की मनोरमा के साथ हुए बलात्कार और जघन्य हत्या की घटना याद आ गई. 2004 की वो क्रूरता आज भी रोंगटे खड़े कर देती है. सरकारें और सेना जब इससे अनभिज्ञ बनी रही तो अधेड़ महिलाओं ने सड़कों पर पूरी तरह निर्वस्त्र होकर प्रदर्शन किया था.

उनके बैनरों पर लिखा था- इंडियन आर्मी रेप अस. बलात्कार का यह सिलसिला तब से लेकर अबतक जारी है. ताज़ा मामला 14 साल की नाबालिग का है जिसे इन जवानों ने अपना शिकार बनाया है.

लेकिन कल्पना कीजिए कि जिसकी वर्दी पर आप फ़क्र करते हों, जिसके होने से आपको अनुशासन और कर्तव्यनिष्ठा ध्यान आती हो, जिसके होने से आपके भीतर सुरक्षा का भरोसा पैदा होता है, वो आपकी अस्मिता को रौंदने वाले वहशी बन जाएं.

रविवार 27 दिसंबर की शाम हावड़ा-अमृतसर एक्सप्रेस में एक 14 साल की लड़की के साथ सेना के तीन जवानों ने यही किया. उस लड़की जबरन शराब पिलाकर उससे बलात्कार किया. कोच के शौचालय में चलती रेलगाड़ी में वर्दी से नंगी होकर बाहर आती हवस उस मासूम को बारबार अपना निशाना बनाती रही.

देश के इन वीरों को ऐसा करने में चंद घंटे लगे. 14 बरस की यह लड़की अपने मित्र से मिलने पंजाब जा रही थी. उसकी ग़लती यह थी कि वो सेना के कोच में चढ़ गई थी. इन जवानों ने पहले उसे जबरन शराब पिलाई और फिर बलात्कार किया.

14 बरस को सेना के जवानों ने पहले जबरन शराब पिलाई और फिर फसके साथ गैंंगरेप किया

इस अचेत लड़की को झारखंड के मधुपुर में इन वीरों में रात के अंधेरे में ट्रेन से उतार दिया. जीआरपी में जब इसकी शिकायत हुई तब जाकर पूरी घटना का पता चला. फिलहाल एक जवान पकड़ा जा चुका है. बाकी की तलाश जारी है.

यह देश मोर्चे पर जा रहे जवानों की आरती उतारकर, तिलक लगाकर विदाई करता है. उनके ताबूतों से लिपटकर रोता है, उनके शौर्य की कहानियों को गर्व के साथ सुनता-सुनाता है. उनका दर्जा हमेशा एक पायदान ऊपर रहता है. लेकिन सेना का एक चेहरा यह भी है. बदसूरत और डरावना.

यह कितना शर्मनाक है कि जिस लड़की को सेना के उस कोच में सबसे अधिक महफूज और सुरक्षित महसूस करना चाहिए था, वहीं उसके साथ ऐसा हादसा हुआ जो ताउम्र उसकी स्मृतियों को दु:स्वप्न बन कर रौंदता रहेगा. उस लड़की का अपराधी सेना का एक जवान नहीं था. एक के बाद एक, तीन जवानों ने यही कुकृत्य किया उस नाबालिग के साथ.

यह कोई अपवाद या इक्का-दुक्का घटना नहीं है. हमारे गर्व के शिखर सेना के जवानों की मनमानी की अनगिनत कहानियां हमारे आस-पास मौजूद है. तमाम बार देखा गया है कि अपने गंतव्य को जा रही ट्रेन में भागते भागते अगर कोई व्यक्ति फौजियों के कोच में चढ़ने लगता है तो उसे लात मारकर गिरा दिया जाता है. अचानक से वह फौजी जिसे तिलक लगाकर, आरती उतारकर भेजा गया है वह अंग्रेज़ी फौज जैसा बर्ताव करने लगता है. 

सेना के अधिकारियों की अनियमितताएं कोई नई ख़बर नहीं हैं. सेना में महिलाओं के साथ भेदभाद और शोषण की ख़बरें भी हमें यदाकदा सुनने को मिलती रही हैं. ताबूत और जूतों तक में घोटाला इसी देश में हुआ है और सेना के अधिकारियों और मंत्रालय की मिलीभगत से हुआ है. लेकिन इस देश की आम जनता ने उस सेना को हमेशा सर आंखों पर ही रखा.

सबके थोड़ा-थोड़ा करने से यह देश बनता है. और हां इन सबका योगदान सेना के किसी जवान से कम नहीं है

देश को देश बनाने का काम केवल बंदूक और वर्दी नहीं करती है. न ही चमड़े के काले जूते और सिर पर गोल टोपी से कोई महान बन जाता है. सूदूर गांव के झोपड़ीनुमा किसी स्कूल में पढ़ा रहा शिक्षक, एक दफ्तर का चौकीदार, किसी गल्लामंडी में पीठ पर बोरे ढोता मजदूर, खलिहान में अनाज ओसाता किसान, सबके थोड़ा-थोड़ा करने से यह देश बनता है. और हां इन सबका योगदान सेना के किसी जवान से कम नहीं है. न ही इनका बलिदान किसी लिहाज से कम कहा जा सकता है.

बावजूद इसके राष्ट्रवाद के चश्मे से तर्कों को अनदेखा करने वाला यह देश सेना को सिर आंखों पर बिठाए रखता है, उसके बारे में एक उल्टा शब्द नहीं सुनना चाहता. हम अपने नेताओं, अभिनेताओं, खिलाड़ियों, अधिकारियों की तो बेरहमी से आलोचना कर सकते हैं लेकिन सेना पवित्र गऊ है. उसके खिलाफ कुछ भी कहना खतरनाक हो सकता है. 

ऐसे में मनोरमा से लेकर बंगाल की नाबालिग लड़की तक का सच सवाल उठाता है. सवाल, जिसका जवाब सेना को भी देना है और समाज को भी. किसी भी नागरिक द्वारा ऐसा किया जाना अपराध है. लेकिन सेना के जवान द्वारा ऐसा किया जाना और भी गंभीर अपराध है.

फूल बरसाने वाले हाथों में पत्थर आ जाय उससे पहले आत्मचिंतन कर लेना चाहिए.

(ये लेखकर के निजी विचार हैं, जरूरी नहीं कि संस्थान इससे सहमत हो)

First published: 31 December 2015, 8:32 IST
 
पाणिनि आनंद @paninianand

Senior Assistant Editor at Catch, Panini is a poet, singer, cook, painter, commentator, traveller and photographer who has worked as reporter, producer and editor for organizations including BBC, Outlook and Rajya Sabha TV. An IIMC-New Delhi alumni who comes from Rae Bareli of UP, Panini is fond of the Ghats of Varanasi, Hindustani classical music, Awadhi biryani, Bob Marley and Pink Floyd, political talks and heritage walks. He has closely observed the mainstream national political parties, the Hindi belt politics along with many mass movements and campaigns in last two decades. He has experimented with many mass mediums: theatre, street plays and slum-based tabloids, wallpapers to online, TV, radio, photography and print.

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