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मेरे विवाहित-अविवाहित होने का मेरे गहनों से क्या ताल्लुक?

श्रिया मोहन | Updated on: 5 December 2016, 7:42 IST
(आर्या शर्मा/कैच न्यूज़)
QUICK PILL
  • सरकार की नई नीति के मुताबिक ‘शादीशुदा औरत 500 ग्राम, अविवाहित 250 ग्राम और पुरुष 100 ग्राम सोना रख सकते हैं.
  • मगर सरकार के इस फ़ैसले को अविवाहित महिलाएं भेदभावपूर्ण मानती हैं. उनका सवाल है कि एक शादीशुदा महिला उनसे ज़्यादा सोना क्यों रख सकती है? और जिसने शादी नहीं की है वह क्यों बाकियों से कम सोना रखने के लिए बाध्य है?

नोटबंदी के बाद सरकार ने कई नीतियों में बदलाव किया है. उनमें से एक है कि कोई कितना सोना अपने पास रख सकता है, जिस पर आयकर अधिकारियों को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए? लोकसभा में हाल ही में इसकी सीमा तय कर दी गई है. इसके बारे में शुक्रवार को आयकर विभाग ने बयान दिया, ‘शादीशुदा औरत 500 ग्राम, अविवाहित 250 ग्राम और पुरुष 100 ग्राम सोना रख सकते हैं. इसे जब्त नहीं किया जाएगा, भले ही पहली नज़र में यह इन लोगों की आय से मेल नहीं खाता हो.’

मगर अगर कोई इस सीमा को लांघता भी है, तो समस्या आयकर विभाग की नाराज़गी की नहीं बल्कि नीति में भेदभाव की है. क्यों एक शादीशुदा औरत सिंगल वुमन से दुगुनी मात्रा में गोपनीय तरीके से सोना रख सकती है? शायद इसलिए कि सरकार सोचती है कि एक शादीशुदा औरत, सिंगल वुमन से ज्यादा सोना पहनती है?

क्या भारतीय लड़कियां जींस पहनते-पहनते एक पल में भारी गहनों से लदी-फंदी आंटियां बन जाती हैं? या उनकी धारणा है कि हम औरतें चाहती हैं कि हमारे पति, इन-लॉज और पैरेंट्स हमें गहने खरीद कर दें? सिंगल वुमन को गहनों की कितनी ज़रूरत हो सकती है और कितनी होगी, क्या यह उनकी खरीद क्षमता से तय नहीं होना चाहिए?

पितृसत्ता के ख़िलाफ़

अगर हम अर्थ पर सरसरी नजर डालें, तो मालूम होगा कि देश की कुल वर्कफोर्स में एक चौथाई भारतीय औरतों की भागीधारी है. यह आंकड़ा शहरी क्षेत्रों में कम नजर आता है, पर हकीकत में है काफी ज्यादा. शहरों में करीब दो पर एक महिला काम कर रही है. 

महिला साक्षरता का स्तर सुधरने और सामाजिक सशक्तिकरण से इसमें और इजाफा होगा. इस नई आर्थिक स्वतंत्रता के दो अर्थ हैं, काम करने वाली महिलाओं की खरीद क्षमता में बढ़ोत्तरी और महिलाओं की फैसले लेने में बड़ी भूमिका. अब औरतें अपनी पसंद के आउटफिट्स पहन रही हैं और हर क्षेत्र में अधिकार रख रही हैं. वे आर्थिक रूप से पहले से ज्यादा स्वतंत्र हैं. अपनी सफलता का ठोस सबूत चाहती हैं.

गहना भी अक्सर प्रतिष्ठा का प्रतीक होता है, जो आर्थिक स्वतंत्रता की सामाजिक सीढ़ी में आगे बढ़ने का एक मुश्किल पायदान है. यह कोई संयोग नहीं है कि गहने खरीद की खुद की क्षमता में बढ़ोत्तरी, आर्थिक रूप से स्वतंत्र महिलाओं की ऐतिहासिक संख्या के साथ मेल खा रही है.

याद करें जब सिंगल वुमन सुष्मिता सेन ने गर्व से कहा था, ‘मुझे हीरे खरीदने के लिए किसी आदमी की आवश्यकता नहीं है. मैं खुद खरीद सकती हूं.’ उनकी इस बात से कई औरतें प्रेरित हुईं. गहनों के विज्ञापन मूड को भुनाते हैं, औरतों को उनके लिए प्रेरित करते हैं. वे कहते हैं, गहनें औरतों का हक हैं. 

अधिकारी नहीं समझ रहे कि सोना रखने की नई नीति पितृसत्ता का ही एक नया रूप है. किसने अधिकार दिया उन्हें यह कहने का कि सिंगल वुमन को सोना कम रखने का अधिकार है? अगर सोना रखने की सीमा है, तो वह सबके लिए बराबर होनी चाहिए. वरन वे महिला ब्रिगेड की नाराजगी झेलने के लिए तैयार हो जाएं, जिन्हें अपने हक के लिए कभी शादी की जरूरत नहीं हुई, कम से कम सोना रखने के अधिकार के लिए तो बिल्कुल नहीं. 

First published: 5 December 2016, 7:42 IST
 
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