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रोमिला थापर: हिंदुओं को भारत का प्राथमिक नागरिक क्यों होना चाहिए?

सौरव दत्ता | Updated on: 9 March 2016, 8:30 IST
QUICK PILL
  • भगवा ब्रिगेड अपने आलोचकों को मैकाले पुत्र या मैकाले पुत्री कहकर मजाक बनाते हैं. लेकिन वे उन्हीं अंग्रेजों की नीतियों को लागू करते हैं जिनसे वह नफरत करते हैं.
  • हिंदुओं को प्राथमिक नागरिक दिखाने की मानसिकता को कर्नल जेम्स स्टील ऑलकॉट ने 1881 में प्रस्तुत किया और उन्होंने इस दौरान मुसलमानों को हिंसक गद्दार के तौर पर दिखाया जबकि हिंदुओं को कर्तव्यनिष्ठ नागरिकों के तौर पर.

'राष्ट्रवाद बनाम राष्ट्र विरोधी' सबसे हालिया राजनीतिक विमर्श है. लेकिन इस बहस में जो तर्क पेश किए गए वह बेहद निम्नस्तरीय रहा. इस पूरी बहस को तथ्य और ठोस विमर्श पर आधारित होना चाहिए था लेकिन यह ज्ञान झाड़ने पर केंद्रित होकर रह गया. 

ऐसे में दो इतिहासकारों ने पूरे बहस को लेकर परिदृश्य साफ करने की कोशिश की है. रविवार शाम को रोमिला थापर और हरबंस मुखिया ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में राष्ट्रवाद पर चल रहे सार्वजनिक लेक्चर सीरिज में अपने विचार रखे.

तर्क का दोहरापन

नागरिकता संविधान से तय होती है और इसका धर्म से कोई लेना-देना नहीं है.

तो फिर ऐसे में किसी व्यक्ति को कम महत्व का क्यों समझा जाए?

भगवा ब्रिगेड अपने आलोचकों को मैकाले पुत्र या मैकाले पुत्री कहकर मजाक बनाते हैं. लेकिन वह अंग्रेजों की नीतियों को लागू करते हैं जिनसे वह नफरत करते हैं.

प्राचीन भारत का इतिहास लिखने वाली मशहूर इतिहासकार रोमिला थापर छात्रों, शिक्षकों और पत्रकारों की बड़ी उपस्थिति को संबोधित करते हुए पूछती हैं, 'आखिर हिंदुओं को भारत का प्राथमिक नागरिक क्यों होना चाहिए?'

थापर और मुखिया बताते हैं कि चूंकि उन दोनों का संबंध मार्क्सवादी इतिहास लेखन से रहा है इसलिए अरुण शौरी और उनके खेमे के लोग उन्हें 'मशहूर इतिहासकार' कह उनका मजाक उड़ाते हैं. ऐसे सभी लोग हिंदू विचारधारा से ताल्लुक रखते हैं. हालांकि यह अलग बात है कि देर से ही सही शौरी नरेंद्र मोदी सरकार की आलोचना भी करने लगे हैं.

राष्ट्रवाद और औपनिवेशिक संबंध

मौजूदा सरकार का सबसे प्यारा एजेंडा 'राष्ट्रवाद' है. यह न केवल सरकार बल्कि उनके समर्थकों की भी पसंद है. पुलिस ने 'राष्ट्रविरोधी' गतिविधियों के आरोप में छात्रों को गिरफ्तार किया और हाईकोर्ट के एक जज ने इसी आधार पर छात्र नेता की आलोचना की. 

इसके अलावा कुछ टीवी एंकरों ने भी इस मौके का इस्तेमाल कर उन लोगों को निशाना बनाया जिनसे वह वैचारिक तौर पर सहमत नहीं हैं.

'राष्ट्रविरोध' को कहीं भी भारतीय दंड संहिता में पारिभाषित नहीं किया गया है. तो फिर कुछ लोगों को इस मामले में निशाना क्यों बनाया जा रहा है?

थापर बताती हैं कि इसका संबंध औपनिवेशिक इतिहास से जुड़ा हुआ है. ब्रिटिश प्रशासकों को यहां के लोगों की सहमति चाहिए थी और उन्होंने अपने खिलाफ उठने वाली हर आवाज को दबाने के लिए इस कानून का इस्तेमाल किया. धारा 124 ए इस दिशा में की गई अन्य कोशिशों में से एक है. आजाद भारत आज भी इस औपनिवेशिक विरासत को ढो रहा है.

इतिहासकार और राजनीति विज्ञानी बेनेडिक्ट एंडरसन की किताब इमैजिंड कम्युनिटीज-रिफ्लेक्शंस ऑन द ओरिजिन एंड स्प्रेड ऑफ नेशनलिज्म का हवाला देते हुए थापर और मुखिया ने कहा कि आज जिस उग्र और आक्रामक राष्ट्रवाद को आगे बढ़ाया जा रहा है वह औपनिवेशिक मानसिकता की देन है.

सबसे पहली बार इस मानसिकता को कर्नल जेम्स स्टील ऑलकॉट ने 1881 में प्रस्तुत किया और उन्होंने इस दौरान मुसलमानों को हिंसक गद्दार के तौर पर दिखाया जबकि हिंदुओं को कर्तव्यनिष्ठ नागरिकों के तौर पर.

यह एक महज संयोग ही था कि बाल गंगाधर तिलक, ऑलकॉट और उनकी थियोसॉफिकल सोसाएटी के कट्टर समर्थक थे. तिलक पर धार्मिक राष्ट्रवाद की बुनियाद रखने का आरोप लगता रहा है. 

यहां यह जानना जरूरी है कि तिलक ने ही द आर्कटिक होम ऑफ द वेदाज लिखकर आर्यों की श्रेष्ठता का विचार सामने रखा जिसके तहत भारत के सभ्यता की बुनियाद आर्यों ने रखी थी.

तिलक के इस सिद्धांत की जबरदस्त आलोचना की जाती रही है क्योंकि अभी तक इस सिद्धांत के समर्थन में कोई सबूत नहीं मिला है.

तो फिर यह सिद्धांत आया कहां से?

कालखंड में इतिहास का विभाजन

संघ विचारधार के लोग इतिहास को तीन भागों में विभक्त करने की कोशिश करते हैं. उनका कहना है कि प्राचीन इतिहास हिंदुओं का है जबकि मध्यकालीन इतिहास मुस्लिमों का. वहीं आधुनिक भारत का इतिहास यूरोपीयंस का है.

दूसरी श्रेणी को लेकर हिंदुत्ववादी सहज नहीं है. थापर और मुखिया के मुताबिक उनका झूठ ही जेएनयू विवाद में उनकी पोल खोल देता है.

इतिहास को धार्मिक आधार पर देखने का तरीका जेम्स मिल का था जो ब्रिटीश प्रशासन के विचारक थे. उन्होंने समुदायों को धार्मिक आधार पर बांट कर देखा.

मिल्स धर्मरिनपेक्षता का अधिनायकवादी वर्जन चाहते थे जहां केवल उनके विचारों को ही 'तार्किक' माना जाए. इतिहास को इस तरह से बांटना गलत था लेकिन इसे अभी भी प्रैक्टिस किया जा रहा है.

मुखिया कहते हैं कि मिल्स का सिद्धांत आवश्यकतावाद की टाइपकास्टिंग पर आधारित था. इसका मौजूदा स्वरूप कन्हैया कुमार को बतौर हीरो दिखाना जबकि उमर खालिद को मुस्लिम आतंकवादी दिखाना है. 

First published: 9 March 2016, 8:30 IST
 
सौरव दत्ता @SauravDatta29

Saurav Datta works in the fields of media law and criminal justice reform in Mumbai and Delhi.

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