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भाजपा कार्यकर्ताओं के खातोंं की जांच क्यों न हो? प्रधानमंत्री को 5 अन्य सुझाव

सुहास मुंशी | Updated on: 2 December 2016, 8:28 IST
(मलिक/कैच न्यूज़)
QUICK PILL
  • देशभर में नोटबंदी की वजह से मची अफर-तफरी पर विपक्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को घेरने की कोशिश कर रहा है. 
  • वहीं नरेंद्र मोदी ने पारदर्शिता दिखाने के लिए पार्टी के सांसदों विधायकों से अपने अकाउंट का विवरण सार्वजनिक करने को कहा है. 
  • मगर क्या इतने भर से पूरी भाजपा को ईमानदार माना जा सकता है. प्रधानमंत्री को इस दिशा में अगर कुछ करना ही है, तो बहुत सारे सुझाव हैं.

तमिलनाडु में भाजपा की युवा इकाई के एक नेता जेवीआर अरुण बीस लाख रुपए की नई करेंसी के साथ गिरफ्तार हुए हैं. उन्होंने प्रधानमंत्री के नोटबंदी के फैसले का बढ़चढ़ कर स्वागत किया था. पुलिस को उनके पास से करीब 20 लाख रुपए के नए नोट मिले जिसका कोई स्रोत वे बता नहीं सके. दूसरी तरफ वेंकैया नायडू ने घोषणा की है कि पार्टी के सभी एमपी आठ नवंबर के बाद अपने खातों के लेनदेन को सार्वजनिक करें. इन दोनों बातों से क्या अर्थ निकलता है. क्या सिर्फ सांसदों के खातों का रिकॉर्ड सामने आ जाने से समंदर रूपी भाजपा का पूरा चरित्र पारदर्शी हो जाएगा?

नोटबंदी के आलोचकों का कहना है कि ऐसे बहुत से लोग हैं जो यह सोचकर नोटबंदी का समर्थन कर रहे हैं कि प्रधानमंत्री 50 दिन पूरे होने के बाद उनके खातों में अपने वादे के मुताबिक 15 लाख रुपए जमा करवाएंगे. इस बात की अफवाहें हैं कि इस अभियान के खत्म होने के बाद सरकार हर एक जन-धन खाते में 10,000 रुपए जमा करवाएगी.

ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आत्मावलोकन करने का खास शौक है. देश के सबसे प्रभावशाली व्यक्ति से कौन सवाल-जवाब कर सकता है? लेकिन वह स्वयं तो अपना आकलन कर ही सकते हैं! इसीलिए जब पीएम मोदी ने 86 फीसदी नोटों पर पाबंदी लगाई तो उन्होंने अपने प्राइवेट एप पर जनता का मत मांगा और उसका नतीजा घोषित कर दिया कि देश की 90 फीसदी जनता नरेंद्र मोदी के फैसले के साथ है.

कुछ दिन बाद जब विपक्ष संतुष्ट नहीं हुआ तो नरेंद्र मोदी ने एक कदम और उठाया. मंगलवार को मोदी ने अपनी पार्टी के सभी विधायकों, सांसदों से कहा कि वे नोटबंदी के बाद यानी 8 नवम्बर से लेकर इस वर्ष के अंत तक के लेन-देन सहित अपने बैंक खातों की जानकारी पार्टी को उपलब्ध करवाएं. और यह केवल इसलिए किया जा रहा है ताकि विपक्ष को उंगली उठाने का मौका नहीं मिले, जैसा कि मोबाइल एप सर्वे के वक्त मिला. इस बार मोदी ने पार्टी विधायकों व सांसदों से मांगी गई यह जानकारी स्वयं न लेकर पार्टी अध्यक्ष अमित शाह को जमा कराने के लिए कहा है.

मगर विपक्ष को तो इसमें भी खोट नजर आ रहा है. विपक्ष तो सवाल उठाता ही रहेगा. इस बीच कैच न्यूज ने बीजेपी को कुछ विनम्र सुझाव दिए हैं कि पार्टी अपना सेल्फ ऑडिट किस तरह और बेहतर कर पाएगी. ऐसा करने से न केवल विपक्ष के हमले को कुंद किया जा सकेगा बल्कि उन ‘भ्रष्टाचार विरोधी कार्यकर्ताओं' की भी आंखें खुल जाएंगी जो अब वास्तव में काले धन, भ्रष्टाचार और आतंकवाद के पक्ष में खड़े हैं.

1. छह माह का बैंक घोषणा पत्र दें

पार्टी में आंतरिक ऑडिट का आदेश देने का एक कारण यह दिखाना है कि बीजेपी के कार्यकर्ताओं ने कर के दायरे में रह कर ही लेन-देन किया है, खास तौर पर नोटबंदी से पहले. मोदी और उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं पर मुख्य आरोप यही है कि पार्टी को नोटबंदी की घोषणा से पहले ही इसकी भनक लग चुकी थी.

क्यों न पार्टी आठ नवंबर से पहले के बैंक खातों के लेनदेन को सार्वजनिक करने का निर्देश दे ताकि यह अटकलें ही समाप्त हो जायं कि कुछ भाजपावालों को नोटबंदी की भनक पहले से ही थी.

2. छह माह की संपत्ति का ब्यौरा

पिछले छह माह में बीजेपी और इसकी अन्य इकाइयों द्वारा की खरीदी गई संपत्ति की खरीद-फरोख्त का ब्यौरा घोषित किया जाए. बीजेपी को नोटबंदी का पहले से ही पता था, ऐसा इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि पार्टी की बिहार इकाई ने नवम्बर से पहले अचानक से बहुत सी सम्पत्ति खरीदी. कैच ने एक विधायक से इस बारे में बातचीत की, जिसमें पता चला कि पार्टी ने पूरे राज्य में जमीनें खरीदीं. इनमें से ज्यादातर सितम्बर-अक्टूबर में नकद भुगतान करके खरीदी गई. 

विपक्ष के आरोपों का जवाब देने का इससे बेहतर तरीका क्या हो सकता है कि पार्टी पिछले छह माह में किए गए खर्च का ब्यौरा दे? इससे यह साबित हो जाएगा कि केवल बिहार ही इस मामले में अकेला ऐसा मामला है.

3. स्वतंत्र ऑडिटर

ये सारे रिकॉर्ड किसी बाहरी ऑडिटर को दें. यह सुझाव तो काबिल-ए-तारीफ है लेकिन इसे लागू करने में शायद थोड़ी अड़चन है? फिलहाल पार्टी ने जो घोषणा की है उसके मुताबिक सारी जानकारी पार्टी अध्यक्ष अमित शाह को दी जानी है. केवल शाह को ही बैंक अकाउंट्स की जानकारी देने का क्या मतलब? इससे बेहतर होता कि सारा बही खाता किसी प्रोफेशनल ऑडिटर के सामने लाया जाता. और इससे भी बेहतर यह है कि पार्टी के सारे वित्तीय मामले आरटीआई के अधीन लाए जाएं.

4. सभी का अकाउंट शामिल हो

केवल सांसद और विधायक ही क्यों? पार्टी के कार्यकर्ता क्योंं नहीं. क्यों मे पार्टी के सभी कार्यकर्ता, पदाधिकारी, सांसद, विधायक और इन सबके तमाम रिश्तेदारों के खातों की जांच हो. साथ ही सहयोगी पार्टियों के सदस्यों के बैंक अकाउंट लेन-देन की भी जानकारी देने को कहा जाए.

मोदी निश्चित तौर पर उस पार्टी का नेतृत्व नहीं कर रहे हैं जो बड़ी मात्रा में काले धन के लेन-देन में लिप्त है लेकिन पार्टी के भीतर कोई तो खोटा सिक्का निकल ही सकता है. अगर कोई सांसद या विधायक वाकई कर अदा नहीं कर रहा है या कर के दायरे से बाहर लेन-देन कर रहा है तो यह वह अपने नाम पर तो नहीं ही करेगा. तो क्यों नहीं उनके रिश्तेदारों के बैंक अकाउंट की जांच की जाए? साथ ही उनके व्यापारिक खतों और लेन-देन की भी? 

सांसद और विधायकों का पार्टी के लिए फंड जुटाने से पाला बमुश्किल ही पड़ता है. अक्सर यह जिम्मेदारी पार्टी की प्रदेश इकाई के अध्यक्ष या अन्य पदाधिकारी को दी जाती है और पार्टी कोषाध्यक्ष ही इसे संभालते हैं. जमीनी स्तर पर बूथ स्तरीय कार्यकर्ता भी इसमें शामिल होते हैं. तो पार्टी के बही खाते खोलने में हर्ज ही क्या है? इससे सारे विरोधियों का मुंह बंद करना आसान होगा!

5. नोटबंदी पैसा जन-धन में?

यह भी बता दें कि क्या सरकार नोटबंदी के बाद कमाया पैसा जन-धन खातों में डालेगी? नोटबंदी के आलोचकों का कहना है कि ऐसे बहुत से लोग हैं जो यह सोचकर नोटबंदी का समर्थन कर रहे हैं कि प्रधानमंत्री 50 दिन पूरे होने के बाद उनके खातों में अपने वादे के मुताबिक 15 लाख रूपए जमा करवाएंगे. अफवाहें हैं कि इस अभियान की समाप्ति के बाद सरकार हर एक जन-धन खाते में 10,000 रुपए जमा करवाएगी.

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने पीएम को चुनौती दी है कि वे इस योजना को फलीभूत कर दिखाएं. सबसे बढ़िया तरीका तो यह है कि बीजेपी या सरकार एक सार्वजनिक बयान जारी कर लोगों के मन में उपजे सारे संदेह गलत साबित कर दे!

और भी बेहतर होगा कि मोदी संसद में इस संबंध में बयान दें.

First published: 2 December 2016, 8:28 IST
 
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