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मुंहफट सुब्रमण्यम स्वामी इस क़दर आतुर क्यों हैं?

पाणिनि आनंद | Updated on: 26 June 2016, 7:46 IST
QUICK PILL
  • बीजेपी और एनडीए में शामिल होने से पहले से स्वामी की अपनी महत्वाकांक्षाएं रही हैं. उनकी इच्छा कैबिनेट में शामिल होने की है. उन्हें लगता है कि उनके जैसा अर्थशास्त्री वित्त मंत्रालय में होना चाहिए.
  • दरअसल स्वामी को लगता है कि अधिकारियों को निशाना बनाने की वजह से सरकार उन्हें मंत्री पद दे देगी. वास्तव में स्वामी यह बताना चाहते हैं कि अगर आप यह सब नहीं चाहते हैं तो मुझे काम दीजिए और व्यस्त रखिए.

स्वामियों के लिए यह बुरी खबर है. चाहे वह सुब्रमण्यन स्वामी हो या फिर स्वामी प्रसाद मौर्य. मौर्य अब बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) में नहीं हैं. दोनों ही नेता अपनी जिंदगी और कैरियर से ज्यादा की उम्मीद कर रहे हैं और इस चक्कर में उन्हें विफलता का मुंह देखना पड़ रहा है.

स्वामी प्रसाद ने बीएसपी छोड़ दी और वह अब नए ठिकाने की तलाश में हैं. सपा में जाने की अटकलें थीं लेकिन उन्हें यादव कुनबे से वह नहीं मिला जिसकी उम्मीद थी. इसके बाद उन्होंने बीजेपी के साथ बातचीत करने की कोशिश की और साथ ही वह लगातार कांग्रेस के भी संपर्क में बने हुए हैं. स्वामी ने सोचा था कि चुनाव के दौरान उन्हें अन्य दल हाथों हाथ लेंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

हालांकि हम दूसरे स्वामी के बारे में लिख रहे हैं. जिनकी शोहरत मौर्य से ज्यादा है और वह पिछले सत्र में सदन में धमाका कर चुके हैं. सदन में विपक्ष उन्हें अधिक मनोरंजन करने वाला नेता बताता है. कांग्रेस ने यह कहने में भी देर नहीं लगाई कि आज आप जिसे सदन में लेकर आए हैं वह आने वाले दिनों में आप पर भारी पड़ेंगे.

बीजेपी और एनडीए में शामिल होने से पहले से स्वामी की अपनी महत्वाकांक्षाएं रही हैं. उनकी इच्छा कैबिनेट में शामिल होने की है. उन्हें लगता है कि उनके जैसा अर्थशास्त्री वित्त मंत्रालय में होना चाहिए. हालांकि पिछले बजट सत्र तक उन्हें ऐसा कुछ नहीं मिला. फिर बीजेपी ने उन्हें राज्यसभा में भेजने का फैसला लिया.

इसे हासिल करने के लिए स्वामी कई कोशिश कर चुके हैं. उन्होंने गांधी परिवार पर हमला करते हुए कांग्रेस पर निशाना साधा. उन्होंने राम मंदिर तका का मुद्दा उठाया. यह बीजेपी की रणनीति के मुताबिक थी. बदले में उन्हें राजयसभा की सदस्यता मिली. राज्यसभा में पहुंचते ही स्वामी ने अगस्ता वेस्टलैंड का मामला उठाकर हंगामा मचा दिया.

ये दिल मांगे मोर

स्वामी इतने से संतुष्ट नहीं हुए. उनका सपना बड़ा है. स्वामी जानते थे कि असम चुनाव के बाद कैबिनेट में बदलाव होगा और इस बार उन्होंने मोदी सरकार के मंत्रिमंडल में शामिल होने के लिए नए निशाने खोज लिया.

रघुराम राजन पर उन्होंने हमला बोला. इसके बाद मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम उनके निशाने पर आए. उन्होंने कहा कि आने वाले दिनों में वह कई और लोगों की पोल खोलेंगे. हालांकि उनके कारनामे से सरकार के लिए असहज स्थिति पैदा हो गई है. स्वामी लगातार नौकरशाहों और सलाहकारों पर हमला कर रहे हैं. 

दरअसल स्वामी को लगता है कि वित्त विभाग के अधिकारियों को निशाना बनाने की वजह से सरकार उन्हें पद दे देगी. वास्तव में स्वामी यह बताना चाहते हैं कि अगर आप यह सब नहीं चाहते हैं तो मुझे काम दीजिए और व्यस्त रखिए.

स्वामी अपने आकलन में चूक गए थे लेकिन अब मोदी मंत्रिमंडल में जगह बनाने के लिए उनका सही समय है. जब वित्तमंत्री अरुण जेटली ने उनके बयान से पार्टी को अलग करने की कोशिश की तो उन्होंने जेटली को भी नहीं छोड़ा.

स्वामी ने आरएसएस का कार्ड भी खेला. ऐसी अटकलें चलने लगी कि उनके पीछे आरएसएस खड़ा है. कैच को मिली जानकारी बताती है कि उनके पीछे आरएसएस का कोई नेता नहीं था. आरएसएस मोदी के साथ खड़ा है और आरएसएस ऐसा कोई काम नहीं करता जो उसकी योजना के खिलाफ हो.

मोदी के कैबिनेट में अगले कुछ हफ्तों में बदलाव होना है और उसमें स्वामी के नाम को लेकर कोई चर्चा भी नहीं हो रही है. स्वामी की कोशिश एक बार फिर से असफल होती दिख रही हैं.

First published: 26 June 2016, 7:46 IST
 
पाणिनि आनंद @paninianand

Senior Assistant Editor at Catch, Panini is a poet, singer, cook, painter, commentator, traveller and photographer who has worked as reporter, producer and editor for organizations including BBC, Outlook and Rajya Sabha TV. An IIMC-New Delhi alumni who comes from Rae Bareli of UP, Panini is fond of the Ghats of Varanasi, Hindustani classical music, Awadhi biryani, Bob Marley and Pink Floyd, political talks and heritage walks. He has closely observed the mainstream national political parties, the Hindi belt politics along with many mass movements and campaigns in last two decades. He has experimented with many mass mediums: theatre, street plays and slum-based tabloids, wallpapers to online, TV, radio, photography and print.

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