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सीपीएम की उपज थे सिंडिकेट जो अब टीएमसी के हो लिए

शौर्ज्य भौमिक | Updated on: 26 April 2016, 8:29 IST
QUICK PILL
  • राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी ने पश्चिम बंगाल में सिंडिकेट फलने-फूलने का मुद्दा उठाया है. हाल ही में सिंडिकेट से जुड़े एक नेता का कथित स्टिंग वीडियो सामने आया है.
  • रियल एस्टेट से जुड़े कोऑपरेटिव को स्थानीय लोग सिंडिकेट कहते हैं. सीपीएम के शासनकाल में ही सिंडिकेट ने जमाया जड़. सत्ता परिवर्तन के बाद ज्यादातर सिंडिकेट वाले टीएमसी से जुड़े गए.

राहुल गांधी ने शनिवार को पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस(टीएमसी) सरकार पर हमला बोलते हुए कहा कि यहां केवल सिंडिकेट से जुड़े कारोबार फल-फूल रहे हैं. इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी राज्य के रियल एस्टेट सिंडिकेट का मुद्दा उठा चुके हैं.

सोमवार को राज्य के जिन इलाकों(बिधाननगर,  राजारहाट-न्यू टाउन, राजरहाट-गोपालपुर)) में मतदान हुआ उनमें पिछले कुछ समय में रियल एस्टेट सेक्टर में तेज उछाल आया है.

साल 2015 में नगरपालिका चुनाव के दौरान बिधाननगर में काफी हिंसा हुई थी. जिसके बाद राज्य के इलेक्शन कमिश्नर को इस्तीफा देना पड़ा था. नगरपालिका को कुछ वार्डों में मिली 'बढ़त' से टीएमसी के कार्यकर्ता भी हैरान थे.

पश्चिम बंगाल में सीपीएम के शासनकाल में सिंडिकेट में सभी को बराबर हिस्सा मिलता था

ये सारा बखेडा सिंडिकेट से जुड़े सैकड़ों नौजवानों का खड़ा किया हुआ था. हाल में राजरहाट-न्यू टाउन से प्रत्याशी सब्यसाची दत्ता एक स्टिंग ऑपरेशन में कहते दिखे कि सिंडिकेट चुनावी फंडिंग और चुनाव के दिन जनबल उपलब्ध कराने के लिए लाइफलाइन की तरह है.

बिधाननगर(साल्ट लेक) से जब आप राजरहाट में प्रवेश करेंगे तो आपको ऊंची-ऊंची बहुमंजीली इमारतें, शॉपिंग माल और मल्टिप्लेक्स दिखायी देंगे. लेकिन मेन रोड से आप अंदर मड़ जाएं आपको नारियल के पेड़, फार्म और गांव दिखायी देने लगेंगे. आपको महिसबथान, जोतभीम, कोचपुकुर, चकपाचुरिया, शिखरपुर जैसे गांव दिखायी देने लगेंगे. ये सभी गांव रियल एस्टेट सिंडिकेट के गढ़ हैं.

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यहां कि भांगर विधान सभा में मेरी दो भाइयों से मुलाकात हुई थी. इन दोनों भाइयों के सहयोगी तीन भाई हैं. ये पांचों मिलकर राजरहाट के छह गांवों में सात सिंडिकेट चलाते हैं.

चाय और समोसे पर हमने सिंडिकेट के बारे में बात शुरू की. दोनों भाइयों के अनुसार राजरहाट और उसके आसपास के 40 गांवों में 400-500 सिंडिकेट काम करते हैं. इनमें से साल 2010 तक करीब 30 प्रतिशत ही हाउसिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन में पंजीकृत हैं.

औसतन एक सिंडिकेट में 50 बेरोजगार युवक जुड़े होते हैं. ये सभी नौजवान सिंडिकेट में कुछ पैसे लगाते हैं जो सीड फंडिंग का काम करता है.

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मसलन, अगर 50 लोग 10-10 हजार रुपये लगाते हैं तो पांच लाख रुपये इकट्ठा हो जाएंगे. जिससे बालू, सीमेंट और ईंट खरीदी जाती है. साल के अंत हर किसी को अपने निवेश पर मुनाफा मिलता है. उसके बाद वो दोबारा पैसा निवेश कर सकते हैं.

सिंडिकेट का अपना बैंक अकाउंट और अकाउंट अफसर होता है. साल 2000 के बाद राज्य के रियल एस्टेट में तेज उछाल आया. इस दौरान ज्यादातर सिंडिकेट ने औसतन 30 लाख रुपये महीने(3.6 करोड़ रुपये सालाना) कमाए.

एक सूत्र ने मुझे बाद में बताया कि दोनों भाई खुद को पास के कस्बे में रहते हैं कि लेकिन उनके फ्लैट करीब स्थित शपूरजी पलून जी कॉम्पलेक्स में हैं.

मुझे बताया गया, "वो अलग ही वक्त था. राजरहाट में बिल्डिंग मैटेरियल ढो रहे ट्रकों की वजह से घंटों तक जाम लग जाता था. "

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सिंडिकेट चलाने वाले भाइयों ने मुझे बहुत ही बेबाकी से बताया कि वो कमर्शियल और रेजीडेंशियल बिल्डिंग के प्रमोटरों से मिलकर उन्हें "बाजार भाव से थोड़े अधिक दर पर" सामान उपलब्ध कराते थे.

उन्होंने मुझे बताया कि किसी तरह उन्होंने इलाके में टाटा कंसल्टेंसी सर्विस के डील करायी थी. उन्होंने मुझे बताया कि बिल्डरों से पैसा कमाने के लिए सिंडिकेट को हेरफेर का सहारा लेना पड़ता है. मसलन, 10 ट्रक बालू में पहुंचाना है तो सिक्योरिटी गॉर्ड को धमका कर या घूस देकर आठ ट्रक माल ही पहुंचाया जाता था. जबकि खाते में 10 ट्रक दर्ज होते थे. बिल्डिंग प्रमोटरों को इस बात का एहसास होता था कि माल जितना कहा जा रहा है उससे कम है लेकिन उनके पास इसे प्रमाणित करने का कोई तरीका नहीं होता.

सिंडिकेट राज की शुरुआत सीपीएम सरकार के समय ही  हुई थी. एक सीपीएम कार्यकर्ता ने नाम न छापने की शर्त पर मुझे बताया कि सिंडिकेट(कोऑपरेटिव) की शुरुआत इसलिए हुई थी कि जिन लोगों की जमीन लेकर शहर बसाया जा रहा है उन्हें भी इसका फायदा मिले.

बेरोजगार नौजवानों के लिए इस तरह आय का नया जरिया खुल गया. स्थानीय लोगों की मानें तो सीपीएम के जमाने में सिंडिकेट की कमायी का सबमें बराबर बंटवारा होता था. यहां तक कि सिंडिकेट में करीब एक-तिहाई लोग गैर-सीपीएम पार्टियों के होते थे.

टीएमसी के राज्य की सत्ता में आने के बाद ज्यादातर सिंडिकेट उससे जुड़े गए

जिले के एक पूर्व सीपीएम नेता ने बताया, "ये सत्ताधारी पार्टी का सोचा-समझा निर्णय था. राजरहाट में भूमि अधिग्रहण में काफी अनियमितता हुई थी. पंचायत नेता खासकर विपक्षी पार्टी के ज्यादा शोर शराबा न मचाए इसके लिए उन्हें रियल एस्टेट सेक्टर में हिस्सेदारी दे दी गयी."

राज्य में सत्ता परिवर्तन होते ही सारे सिंडिकेट टीएमसी से जुड़ गए क्योंकि सत्ता के करीब रहने से वो कानूनी अड़चनों से बच जाते हैं.

एक स्थानीय नागरिक ने बताया,"सिंडिकेट तो हमेशा से रहा है. लेकिन राजनीतिक दलों की आपसी लड़ाई से वो अब खबर में आने लगा है. इस कारोबार पर कब्जे के लिए उनके बीच हमेशा संघर्ष चलता रहता है. टीएमसी के कम से कम तीन नेता विभिन्न सिंडिकेट को समर्थन देते हैं."

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कथित स्टिंग ऑपरेशन में सब्यसाची दत्ता कहते दिख रहे हैं, "चुनाव लड़ने के लिए 50-60 लाख चाहिए होते हैं. पार्टी पांच लाख देती है. बाकी पैसा इन्हीं लोगों से आता है. उन्हें पता है कि एक बार पैसा देकर वो अगले चार साल 364 दिन आराम से धंधा कर सकते हैं."

राजरहाट में कम से कम 20 हजार नौजवान अपनी जीविका के लिए सिंडिकेट पर निर्भर हैं. अगर परिवार के सदस्यों को भी जोड़ लिया जाए तो ये आंकड़ा एक लाख के करीब पहुंच जाएगा.

पिछले कुछ समय में सिंडिकेट के धंधे में कोई बदलाव आया है तो वो है इसमें रहने के लिए टीएमसी से जुड़ने की जरूरत.

सीपीएम के पूर्व नेता तापस चटर्जी का सिंडिकेट के धंधे में अच्छा दखल माना जाता है. वो जुलाई, 2015 में टीएमसी में चले गए. जबकि साल 2012 तक वो टीएमसी के खिलाफ लड़ते थे लेकिन उन्होंने बहुत कम समय टीएमसी से नजदीकियां बढ़ा लीं.

फिलहाल इलाके में टीएमसी का कोई मजबूत विरोधी नजर नहीं आता लेकिन असलियत चुनावी नतीजे सामने के बाद ही सामने आएगी.

First published: 26 April 2016, 8:29 IST
 
शौर्ज्य भौमिक @sourjyabhowmick

संवाददाता, कैच न्यूज़, डेटा माइनिंग से प्यार. हिन्दुस्तान टाइम्स और इंडियास्पेंड में काम कर चुके हैं.

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