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वामपंथ के लिए क्यों अहम है सीपीएम का प्लेनम

ऋषि मजूमदार | Updated on: 31 December 2015, 18:30 IST
QUICK PILL
  • 2015 में हुआ प्लेनम सीपीएम के 51 सालों के इतिहास में तीसरा आयोजन है. दूसरे प्लेनम के बाद करीब 37 सालों के अंतराल पर पार्टी ने तीसरा प्लेनम बुलाया. पार्टी को आखिर ऐसा करने में इतना लंबा समय क्यों लग गया?
  • सीपीएम पोलित ब्यूरो के सदस्य मोहम्मद सलीम के मुताबिक देश में हो रहे बड़े राजनीतिक और आर्थिक बदलाव की वजह उसे प्लेनम को बुलाना पड़ा.

'भारत में वामपंथ का क्या होगा?' भारतीय राजनीति में यह सवाल हमेशा ही चौंकाता है. पिछले एक दशक में भारत की राजनीति खुली अर्थव्यवस्था से प्रभावित होती रही और इसी दौरान भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई-एम) की राजनीति जमींदोज होती चली गई. 

2004 में माकपा के 43 सांसद थे जो पिछले साल हुए लोकसभा चुनाव में घटकर 10 रह गए. 2011 में तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी के हाथों सीपीएम के 34 साल के लंबे शासन का अंत हुआ. मौजूदा राजनीतिक स्थिति को देखते हुए यह नहीं कहा जा सकता कि आने वाले सालों में विधानसभा चुनाव में पार्टी कुछ बेहतर कर पाएगी. 

क्या पार्टी और पूरा वाम मोर्चा फिर से अपनी सियासी जमीन हासिल कर पाएगा? या फिर यहां से आगे उसका पतन ही होगा? क्या सीपीएम पार्टी में संगठन के स्तर पर कोई बड़ा बदलाव ला पाएगी? राजनीतिक विश्लेषकों को इस सवाल का जवाब कोलकाता में हुए पार्टी के प्लेनम से मिलने की उम्मीद थी जिसका आयोजन 27 दिसंबर से लेकर 31 दिसंबर तक हुआ. प्लेनम पार्टी कांग्रेस से अलग होता है. जिसका आयोजन सीपीएम कुछ सालों के अंतराल पर करती है. पार्टी के सभी सदस्य चुनावी रणनीति समेत अन्य मुद्दों पर वोटिंग करते हैं.

प्लेनम के दौरान इस बात पर विचार किया जाता है कि पार्टी की रणनीति में क्या बदलाव होगा. हालांकि जरूरी नहीं कि इस बैठक में कोई विशेष निर्णय लिया ही जाए, लेकिन इसके बावजूद प्लेनम की अहमियत कम नहीं हो जाती.

प्लेनम के दौरान पार्टी के सदस्य बदलते समय की जरूरतों के मुताबिक पार्टी की रणनीति में बदलाव को लेकर चर्चा करते हैं

2015 में हुआ प्लेनम सीपीएम के 51 सालों के इतिहास में तीसरा आयोजन है. दूसरे प्लेनम के बाद करीब 37 सालों के अंतराल पर पार्टी ने तीसरा प्लेनम बुलाया. सवाल यह है कि पार्टी को आखिर ऐसा करने में इतना लंबा समय क्यों लग गया?

सीपीएम पोलित ब्यूरो के सदस्य मोहम्मद सलीम बताते हैं, 'देश में हो रहे बड़े राजनीतिक और आर्थिक बदलाव की वजह उसे प्लेनम को बुलाना पड़ा.' लोकसभा सदस्य सलीम बताते हैं, 'पहली बार 1968 में प्लेनम बुलाया गया था. पार्टी की स्थापना के महज चार साल बाद इसे बुलाया गया था. उस वक्त पार्टी को अपनी विचारधारा तय करनी थी. फिर आपातकाल के बाद 1978 में दूसरी बार प्लेनम बुलाया गया जब केंद्र में गैर-कांग्रेसी सरकार बनी. उस वक्त हमें राजनीतिक संक्रमण के मुताबिक अपनी स्थिति तय करनी थी.'

कैसे मिलेगी खोई जमीन

इस बीच ऐसे कई मौके आए जब प्लेनम बुलाया जा सकता था. 90 की शुरुआत में जब देश में आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत हुई या फिर गठबंधन की राजनीति के शुरुआती दौर में या फिर 2000 की शुरुआत में, जब एनडीए की सरकार सत्ता में थी.

हालांकि पार्टी ने ऐसे किसी समय में प्लेनम का आयोजन नहीं किया और उसे इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी. अब पार्टी ने ऐसे समय में प्लेनम बुलाया है जब पश्चिम बंगाल, केरल और त्रिपुरा में विधानसभा के चुनाव होने हैं. 

मौजूदा प्लेनम में यह विचार किया गया कि पार्टी किस तरह से उदारीकृत भारत, वैश्वीकृत दुनिया और केंद्र में मोदी सरकार का सामना करे. पार्टी ने आज की परिस्थितियों के मुताबिक अपने को प्रासंगिक बनाए रखने के उपायों पर भी विचार किया. हालांकि यह पार्टी की शुरुआत के दिनों से अलग रुख है. हर प्लेनम का एक थीम होता है और इस बार का थीम 'संगठन' था.

प्रमुख चिंताएं

60 पन्नों के गुप्त दस्तावेज में उन मुद्दों की चर्चा की गई है जिन पर बहस किया जाना है. इसे तीन भागों में बांटा गया है जिसमें संगठन का ढांचा, जन मोर्चा और जन आंदोलन शामिल है. इसके अलावा कई चिंताएं जाहिर की गई है लेकिन प्रमुख चार ही हैं.

पहला लोकतंत्र का संकेंद्रीकरण है जिसमें पार्टी की केंद्रीय ईकाई पोलित ब्यूरो और सेंट्रल कमेटी के पार्टी यूनिट से चर्चा किए जाने का जिक्र है. रिपोर्ट के मुताबिक पार्टी की केंद्रीय ईकाई और राज्य के बीच संवाद की स्थिति बेहद कमजोर है जिसे मजबूत किए जाने की जरूरत है.

दूसरा मामला प्रतिनिधित्व का है. करीब 81 फीसदी पार्टी के सदस्य कामकाजी वर्ग से आते हैं. लेकिन जिला समितियों में उनकी हिस्सेदारी 58 पर्सेंट से अधिक है और राज्य समितियों में उनकी हिस्सेदारी 38 फीसदी है. सेंट्रल कमेटी में इस वर्ग की हिस्सेदारी महज 26.5 पर्सेंट है.

पार्टी के सदस्यों में महज 20 फीसदी ही एससी से आते हैं लेकिन स्टेट कमेटी में इनकी हिस्सेदारी महज 8 फीसदी है. हालांकि पार्टी में एसटी की भागीदारी ज्यादा बेहतर है. वहीं पार्टी सदस्यों में मुस्लिमों की भागीदारी 9 फीसदी है जबकि स्टेट कमेटी में इनकी हिस्सेदारी पांच फीसदी से अधिक है.

त्रिपुरा, कर्नाटक, असम, दिल्ली और आंध्र प्रदेश समेत पांच राज्यों में महिला सदस्यों की संख्या 20 फीसदी है. केरल में महिला सदस्यों की हिस्सेदारी 16 फीसदी जबकि पश्चिम बंगाल में इनकी हिस्सेदारी 10 फीसदी से अधिक है. 

2008 के बाद से युवाओं की सदस्यों में 16.7 से 20 फीसदी तक की बढ़ोत्तरी हुई है लेकिन कुछ राज्यों में यह निराशाजनक है

तीसरा मुद्दा विस्तार का है. 2002 में सीपीएम ने विस्तार के लिए असम, बिहार, झारखंड, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश का चयन किया. प्लेनम में यह स्वीकार किया गया कि इस दिशा में उम्मीद के मुताबिक कोई तरक्की नहीं हो पाई. जब तक पार्टी विस्तार की योजना पर विशेष तौर पर काम नहीं करती, इसका कोई नतीजा नहीं निकलने वाला.

आखिरी मुद्दा जन संघर्ष और जन आंदोलन का है. इसी तरह के जन आंदोलनों के आधार पर सीपीएम अपने को स्थापित करने में सफल रही है. हालांकि पिछले कुछ समय से वाम इस तरह के आंदोलनों से गायब ही रहा है. चाहे वह भ्रष्टाचार के विरोध का मामला हो या फिर लैंड बिल को लेकर जारी प्रतिरोध. 

अन्य पार्टियों के मुकाबले सीपीएम बड़े या निजी पक्षों से चंदा नहीं लेती है, जिसकी वजह से फंड की तंगी बनी रहती है

दूसरी तरफ वामपंथ ने जिन आंदोलनों को समर्थन दिया वह जनता के बीच में शायद ही जगह बना पाईं. जब तक आंदोलन को इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया से नहीं जोड़ा जाएगा तब तक उसके सफल होने की संभावना बेहद कम है. पार्टी नए पीढ़ी के साधनों को नजरअंदाज करने का जोखिम नहीं उठा सकती.

अन्य मुद्दे

प्लेनम में अन्य कई छोटे मुद्दों पर चर्चा हुई. पार्टी के नियमों के मुताबिक 70 फीसदी से अधिक फंड सदस्यता फी के तौर पर पार्टी सदस्यों से वसूला जाता है. पार्टी बड़े लोगों से कम ही चंदा लेती है. अन्य राजनीतिक दल बड़ी पार्टियों से मोटा चंदा लेते हैं और इस वजह से सीपीएम को बड़ा नुकसान उठाना पड़ता है. पार्टी को निजी चंदे से करीब 50 फीसदी से अधिक चंदा जुटाने की जरूरत होगी.

इस बीच वामपंथ कोलकाता में फिर से जिंदा होता दिख रहा है. सड़कों पर लाल झंडा फिर  से दिखने लगा है और प्लेनम के पोस्टर्स भी नजर आने लगे हैं. ब्रिगेड ग्राउंड में आयोजित प्लेनम में करीब 10 लाख से अधिक लोगों ने हिस्सा लिया. सीताराम येचुरी ने कहा, 'आप मेरे से पार्टी में युवाओं के बारे में पूछ रहे हैं.' तो मैं आपको बता दूं कि 'यह रैली इस सवाल का बेहतर जवाब दे रही है.'

First published: 31 December 2015, 18:30 IST
 
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