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नए मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्री अभी संसद से इस्तीफ़ा क्यों नहीं देंगे?

चारू कार्तिकेय | Updated on: 24 March 2017, 8:31 IST

अपने तीन सांसदों को मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री नियुक्त करके भाजपा ने लोकसभा की दो और राज्यसभा की एक सीट पर उपचुनाव होना तय कर दिया है. साथ ही संबंधित राज्य की विधानसभा या परिषद में भी उपचुनाव होगा. हालांकि फिलहाल ऐसे कोई संकेत नहीं हैं कि ये उपचुनाव जल्दी होंगे. इसका मतलब है कि ये मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री कम से कम जुलाई 2017 तक तो सांसद पद पर बने रहेंगे. कारण है-राष्ट्रपति चुनाव!


मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य उत्तर प्रदेश से भाजपा सांसद हैं. जबकि पर्रिकर गोवा से राज्यसभा में भाजपा सांसद हैं. वहीं आदित्यनाथ और मौर्य क्रमशः गोरखपुर और फुलपुर से लोकसभा मे सांसद हैं. अगर वे अभी इस्तीफा दे देते हैं तो भाजपा को राष्ट्रपति चुनाव में 2000 वोट कम पड़ जाएंगे.


राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का कार्यकाल 25 जुलाई 2017 को समाप्त हो रहा है. इसलिए राष्ट्रपति पद के चुनाव उससे पहले संपन्न होने जरूरी है. राष्ट्रपति का चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व के जटिल फॉर्मूला के अनुसार संपन्न होता है. संविधान के अनुच्छेद 55 में इस फार्मूले का उल्लेख मिलता है. इसके तहत संसद के दोनों सदनों के सदस्य, सभी राज्यों की विधानसभाओं और केंद्र शासित प्रदेशों के चुने हुए प्रतिनिधियों का समूह राष्ट्रपति चुनाव के लिए मतदान करता है. 2017 तक इन मतदाताओं में 776 सांसद और 4120 विधायक शामिल होंगे.

इस मतदाता समूह द्वारा डाले जाने वाले वोटों की संख्या 11 लाख मतों से कुछ ही कम है और इसका आधा 5.5 लाख वोट होता है. हाल ही संपन्न विधानसभा चुनावों के बाद जो तस्वीर उभर कर आई है, उसके मुताबिक राष्ट्रपति चुनाव के लिए एनडीए के पास लगभग 25 हजार वोट कम हैं.

 

एनडीए के वोट कम


2012 में जब राष्ट्रपति चुनाव हुए थे तो प्रत्येक सांसद के पास 708 वोट थे. अगर इसी गणित पर गौर किया जाए तो पर्रिकर, आदित्य नाथ व मौर्य के कुल वोट मिला कर 2,124 होते हैं. भाजपा के लिए यह चिंता का विषय है. यहां तक कि अगर एनडीए की बात की जाए तो यह कहना मुश्किल है कि शिवसेना क्या रुख अख्तियार करेगी. पार्टी के पास फिलहाल 23 हजार से अधिक वोट हैं और अगर वह विपक्ष के उम्मीदवार का समर्थन करना चाहे तो एनडीए से बगावत कर उसे झटका दे सकती है. पार्टी पहले भी ऐसा कर चुकी है. 2007 में कांग्रेस उम्मीदवार प्रतिभा पाटील और 2012 में प्रणब मुखर्जी का समर्थन कर चुकी है.


अगर शिवसेना एक बार फिर भाजपा को दगा देती है तो वह बीजद या अन्नाद्रमुक या इन दोनों पर ही निर्भर होगी. भाजपा के लिए हर सीट महत्वपूर्ण है. चूंकि संविधान अनुसार, आदित्यनाथ, मौर्य और पर्रिकर के पास अपने-अपने राज्यों की विधानसभा के लिए चुने जाने में छह माह का समय है. इसलिए फिलहाल लगता नहीं कि भाजपा यहां कोई जोखिम उठाएगी.

First published: 24 March 2017, 8:31 IST
 
चारू कार्तिकेय @CharuKeya

Assistant Editor at Catch, Charu enjoys covering politics and uncovering politicians. Of nine years in journalism, he spent six happily covering Parliament and parliamentarians at Lok Sabha TV and the other three as news anchor at Doordarshan News. A Royal Enfield enthusiast, he dreams of having enough time to roar away towards Ladakh, but for the moment the only miles he's covering are the 20-km stretch between home and work.

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