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आरक्षण को लेकर जजों का नजरिया दरअसल सुप्रीम कोर्ट के ही फैसले के खिलाफ है

दिलीप मंडल | Updated on: 18 December 2015, 18:40 IST
QUICK PILL
  • सुप्रीम कोर्ट के ताजा निष्कर्ष को इस परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए कि संविधान में प्रस्तावित मूल्यों को संरक्षित रखा जाय और सरकार उच्च शिक्षा में आरक्षण के साथ किसी तरह की छेड़छाड़ को प्रतिबंधित करे.
  • भारत जैसे विविधतापूर्ण और अनेकता वाले देश में तमाम सामाजिक समूहों की न्यायिक हिस्सेदारी के बगैर एक संगठित और खुशहाल देश का निर्माण नहीं हो सकता है.

गुजरात हाईकोर्ट के एक जज ने कहा कि आरक्षण ने देश के विकास को रोक रखा है. यह बात गुजरात हाईकोर्ट के जज जेएस पारदीवाला ने हार्दिक पटेल के मामले की सुनवाई के दौरान कही. जस्टिस पारदीवाला के मुताबिक आजादी के इतने सालों बाद भी आरक्षण की मांग करना शर्मनाक है. 

इसी तरह का एक बयान उच्च शिक्षा में आरक्षण के संबंध में कुछ दिन पहले सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने भी दिया था. ये बयान दरअसल सुप्रीम कोर्ट के ही फैसले के खिलाफ है. सरकार को यह सलाह देना कि उसे आरक्षण खत्म करने की पहल करनी चाहिए, दुर्भाग्यपूर्ण है. सुप्रीम कोर्ट की इससे बड़ी बेंच अतीत में उच्च शिक्षा में आरक्षण के पक्ष में फैसला दे चुकी है. यह आश्चर्यजनक भी है कि एक बड़ी बेंच के फैसले पर कोई छोटी बेंच और हाईकोर्ट सवाल खड़ा कर रही है.

कुछ लोग बार-बार दस साल की आरक्षण सीमा का जिक्र करते हैं. उन्हें पता ही नहीं है कि संविधान के अनुच्छेद 15, 16, 340 और 341 में कहीं भी आरक्षण की सीमा दस साल तय नहीं की गई है. यह सीमा संसद और विधानसभा के लिए थी, जिसे सरकारें आम सहमति से हमेशा बढ़ाती रही हैं.

इस मामले से संबंधित पक्षों को अपील करनी चाहिए और खुद सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को संविधान पीठ का गठन करके इस विषय पर विचार करना चाहिए. और जब कोई पीठ इस पर विचार करे तो उसे इस बात का भी विशेष ध्यान रखना होगा कि वंचित वर्गों के लिए आरक्षण और विशेष अवसर का सिद्धांत भारतीय संविधान की मूल अवधारणा का हिस्सा है. मूल अधिकारों के अध्याय में होने की वजह से इस संबंध में कोई भी विचार या निष्कर्ष बेहद सर्तकता और गंभीरता की मांग करता है.

बाबा साहेब अंबेडकर ने जब अारक्षण को राष्ट्र निर्माण की प्रकिया का हिस्सा बताया था तब पूरा राष्ट्र उनसे सहमत था

भारत जैसे विविधतापूर्ण और अनेकता वाले देश में तमाम सामाजिक समूहों की न्यायिक हिस्सेदारी के बगैर एक संगठित और खुशहाल देश का निर्माण नहीं हो सकता है. इसी वजह से संविधान निर्माताओं ने विशेष अवसर के सिद्धांत को शीर्ष प्राथमिकताओं में रखा था. अगर हम संविधान सभा की बहसों को देखे तो पाएंगे कि संविधान निर्माताओं के बीच इस प्रश्न पर पूरी तरह से आम सहमति थी कि वंचित और पिछड़े समूहों के लिए विशेष अवसर का सिद्धांत होना ही चाहिए.

जिन महान लोगों की कोशिशों से यह देश बना है उनके मन में इसको लेकर कोई दुविधा नहीं थी. बाबा साहेब अंबेडकर ने जब अारक्षण को राष्ट्र निर्माण की प्रकिया का हिस्सा बताया था तब पूरा राष्ट्र उनसे सहमत था. इसकी झलक संविधान सभा की बहस में देखी जा सकती है.

आधुनिक भारत के अस्तित्व में आने के साथ एक अंतरविरोध स्वाभाविक रूप से अंतरनिहित था कि हम पश्चिम दुनिया में प्रचलित एक आधुनिक शासन पद्धति को अपना रहे थे, जहां हर व्यक्ति के वोट का एक समान मूल्य है. लेकिन संविधान निर्माताओं के मन में यह चिंता भी बराबर बनी हुई थी कि सामाजिक स्थितियों के चलते यहां हर व्यक्ति का सामाजिक दर्जा एक समान नहीं था. संविधान सभा के आखिरी भाषण में अंबेडकर ने जोर देकर कहा था कि अगर इस सामाजिक गैरबराबरी का हल नहीं निकाला गया तो इससे असंतुष्ट लोग उस ढांचे को तहस-नहस कर देंगे जिसे यह संविधान सभा बना रही है. सुप्रीम कोर्ट के ताजा निष्कर्ष को इस परिप्रेक्ष्य देखा जाना चाहिए और सरकार को यह बात साफ कर देनी चाहिए कि उच्च शिक्षा में आरक्षण के साथ किसी तरह की छेड़खानी नहीं की जाएगी. 

अमेरिका के लगभग सभी विश्वविद्यालय डायवर्सिटी के सिद्धांत में यकीन रखते हैं

यह तर्क निरर्थक है कि शिक्षा के क्षेत्र में विविधता से शिक्षा का स्तर गिरता है. दुनिया के श्रेष्ठ विश्वविद्यालय शिक्षकों की नियुक्ति और छात्रों के दाखिले में सामाजिक, नस्लीय और लैंगिक विविधता को बढ़ाने की कोशिश करते हैं. अमेरिका के लगभग सभी विश्वविद्यालय डायवर्सिटी के सिद्धांत में यकीन रखते हैं. वहां के टेक्सास लॉ स्कूल से संबंधित अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के फैसले में यह सिद्धांत स्थापित किया गया है कि कोई भी शैक्षणिक संस्था दाखिले के मामले में सामाजिक विविधता सुनिश्चित करने के लिए स्वतंत्र है क्योंकि इससे बराबरी का सिद्धांत मजबूत होता है.

कोई भी छात्र/छात्रा यह शिकायत नहीं कर सकता है कि सामाजिक विविधता लाने के लिए दिए गए एडमिशन से उसकी मेरिट की अनदेखी हुई है. इस सिद्धांत को मानने से अमेरिकी विश्वविद्यालयों में भी मेरिट का कोई नुकसान नहीं हुआ है, बल्कि भारत के हजारों छात्र अमेरिकी विश्वविद्यालयों में इसी सिद्धांत की वजह से दाखिला पाते हैं. अलग-अलग सामाजिक समूहों के इकट्ठा होने से टैलेंट पूल बड़ा होता है और प्रतिस्पर्धा का माहौल मजबूत होता है. 

इस समय की जरूरत है कि सरकार तत्काल हस्तक्षेप करे और संविधान की मूल भावना को अक्षुण रखे.

इस फैसले पर विचार करते हुए जिस तीसरी बात का ध्यान रखना चाहिए कि वह यह है कि अगर विभिन्न सामाजिक समूह राष्ट्र के संसाधन और अवसर में अपनी हिस्सेदारी को लेकर वंचना का एहसास करते हैं तो यह राष्ट्रीय एकता के लिए अच्छी स्थिति नहीं है. किसी राष्ट्र का राष्ट्र बनना इस बात से तय होता है कि उसमें रहने वाले तमाम लोग और तमाम सामाजिक समूह सामूहिक सुख, सामूहिक दुख और सामूहिक स्वप्न में बराबर के हिस्सेदार हैं या नहीं. अगर किसी नक्शे के अंदर रहने वाले लोगों के सुख-दुख साझा नहीं है और वो एक साथ सपने नहीं देख सकते तो राजनीतिक दृष्टि से वह एक राष्ट्र हो सकता है लेकिन वास्तविक अर्थों में वह राष्ट्र नहीं है.

इस आलोक में तमाम सामाजिक समूहों और खासकर ऐतिहासिक रूप से पीछे रह गए सामाजिक समूहों को आगे लाने के लिए आरक्षण के साथ ही और भी सैकड़ों और संभवत: हजारों प्रयासों की जरूरत है. आरक्षण पर प्रश्नचिह्न खड़ा करना मौजूदा सामाजिक विषमता वाले भारत के हित के भी खिलाफ है. इस समय की जरूरत है कि सरकार तत्काल हस्तक्षेप करे और संविधान की मूल भावना को अक्षुण्ण रखे.

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First published: 18 December 2015, 18:40 IST
 
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