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उत्तराखंड: 'एक नौकरशाह जिसकी उंगलियों पर नाचता है सिस्टम'

प्रदीप सती | Updated on: 10 February 2017, 1:47 IST
QUICK PILL
  • उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत ने विवादित नौकरशाह राकेश शर्मा को रिटायर होने के बाद नए पद का गठन करके बहाल किया.  
  • केंद्र की भाजपा सरकार ने शर्मा को रिटायरमेंट के बाद दोबारा राज्य का मुख्य सचिव बनाने के आदेश को कर दिया था खारिज.

पिछले महीने 30-31 अक्टूबर की बात है. उत्तराखंड के अधिकतर लोग दो नवंबर से शुरू होने वाले विधानसभा सत्र को लेकर तरह-तरह की कयासबाजियों में व्यस्त थे. इसकी वजह यह थी कि यह सत्र देहरादून में न हो कर राज्य के बीचो बीच स्थित उस पहाड़ी कस्बे गैरसैंण में होने जा रहा था जिसे अलग राज्य को लेकर हुए आंदोलन के दिनों से ही उत्तराखंड की स्थाई राजधानी बनाने की मांग चल रही थी.

उम्मीद जताई जा रही थी कि इस सत्र में गैरसैंण की 'नियति' तय हो सकती है. इससे बेपरवाह प्रदेश के तमाम नेताओं और अधिकारियों की नजरें राज्य के सबसे बड़े दफ्तर यानी सचिवालय पर टिकी हुई थीं. यहां बैठे मुख्यमंत्री हरीश रावत एक ऐसे नौकरशाह का भविष्य तय करने में लगे हुए थे जिसे महज 24 घंटे बाद यानी 31 अक्टूबर को राज्य के मुख्य सचिव पद से रिटायर होना था.

राकेश शर्मा नाम के इन नौकरशाह पर मुख्यमंत्री को इस कदर प्यार था कि वे किसी भी सूरत में उन्हें रिटायर होते नहीं देखना चाहते थे. रावत ने केंद्र सरकार को एक चिट्ठी लिखी जिसमें अनुरोध किया गया था कि शर्मा को मुख्य सचिव पद पर तीन महीने का कार्यविस्तार दे दिया जाए.

सरकार ने दलील दी कि उसने अपने विशेष अधिकार का प्रयोग करते हुए यह कदम उठाया है

केन्द्र सरकार ने इस चिट्ठी का कोई जवाब नहीं दिया और इस बीच 31 तारीख भी गुजर गई. इसके बाद राज्य के सियासी हलकों में यह चर्चा जोर पकड़ने लगी कि राकेश शर्मा का वक्त खत्म हो चुका है. लेकिन एक दिन बाद ही राज्य सरकार ने रिटायर हो चुके राकेश शर्मा को मुख्य सचिव के पद पर पुनर्नियुक्ति देने का आदेश जारी कर दिया.

सरकार ने दलील दी कि उसने अपने विशेष अधिकार का प्रयोग करते हुए यह कदम उठाया है. इस फैसले को मीडिया ने सार्वजनिक किया ही था कि मामले ने एक और मोड़ ले लिया.

केंद्र सरकार ने इस फैसले पर कड़ी आपत्ति जताते हुए राकेश शर्मा की पुनर्नियुक्ति को अनुचित करार दिया. केंद्र ने राज्य सरकार से बिना देर किए किसी अन्य अधिकारी को मुख्य सचिव पद पर नियुक्त करने के लिए कहा.

केंद्र की नाराजगी का असर हुआ और हरीश रावत ने राज्य के मुख्य सचिव पद पर सबसे सीनियर नौकरशाह शत्रुघ्न सिंह की ताजपोशी कर दी. इसके बाद एक बार फिर से सियासी हलकों में राकेश शर्मा का विदाई-गान शुरू हो गया. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. 

क्या मजबूरी होगी कि मुख्यमंत्री हरीश रावत को राकेश शर्मा को खुद से चिपकाए रखना पड़ रहा है?

हरीश रावत ने फौरन एक नया पद, ‘मुख्य प्रधान सचिव, मुख्यमंत्री’ सृजित करके उन्हें अपने साथ बनाए रखने का इंतजाम कर दिया. 

कार्मिक विभाग द्वारा 15 नवंबर को जारी किए गए आदेश के मुताबिक शर्मा की नियुक्ति अगले एक साल तक के लिए की गई है और इसे जरूरत पड़ने पर आगे भी बढ़ाया जा सकता है. 

इस आदेश के मुताबिक राकेश शर्मा को लगभग वे सभी अधिकार दिए गए हैं जो उन्हें मुख्य सचिव रहते हुए प्राप्त थे. इसके अलावा उन्हें वेतन के रूप में मुख्य सचिव के पद पर रहते हुए मिलने वाली राशि (पेंशन राशि घटा कर) दी जाएगी. साथ ही उन्हें सरकारी आवास की सुविधा और अन्य भत्ते भी पहले की तर्ज पर मिलते रहेंगे.

हैरानी की बात है कि राज्य सरकार ने राकेश शर्मा पर इतनी इनायतें ऐसे समय में बरसाई हैं, जब उसके पास तमाम राजकीय कर्मचारियों को वेतन देने के लिए पैसों की भयंकर तंगी चल रही है. राज्य के तमाम विभाग ऐसे हैं जहां संविदा पर काम कर रहे कर्मचारियों को सरकार ने पिछले तीन महीनों से वेतन नहीं दिया है.

ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि आखिर ऐसी क्या मजबूरी या जरूरत रही होगी कि मुख्यमंत्री हरीश रावत को राकेश शर्मा को खुद से चिपकाए रखना पड़ रहा है?

प्रदेश की राजनीति को जानने समझने वाले लोग इसके पीछे कोई एक वजह नहीं बल्कि कई सारी वजहों का होना बताते हैं. इन सब वजहों को यदि सच मान लिया जाय तो राकेश शर्मा प्रदेशभर में एकमात्र ऐसे अधिकारी हैं जो सत्ता के हित में कुछ भी कर सकते हैं. 

मीडिया खुले तौर पर यह दावा करती थी कि जब रावत मुख्यमंत्री बनेंगे तो पहला विकेट राकेश शर्मा का ही गिरेगा

राज्य की ब्यूरोक्रेसी के बीच यह चर्चा आम है कि रावत को ऐसा अधिकारी चाहिए जो भले ही बेदाग न हो लेकिन काम करना जानता हो. माना जाता है कि इस लिहाज से राकेश शर्मा सबसे काबिल हैं.

वरिष्ठ पत्रकार जय सिंह रावत बताते हैं, "जिस तरह से सरकार ने राकेश शर्मा को पहले कार्यविस्तार देने की कोशिश की और असफल रहने पर उनके लिए नया पद ईजाद किया उससे लगता है कि वे सरकार की जरूरत नहीं बल्कि मजबूरी बन चुके हैं."

शर्मा के बारे में यह धारणा है कि उनके पास हर मर्ज की दवा है. कहा जाता है कि वे सामने वाले की खूबी और खामी को आसानी से पढ़ लेते हैं. 

पहले हरीश रावत को भी वो फूटी आंख नहीं सुहाते थे. मीडिया खुले तौर पर यह दावा करती थी कि जब रावत मुख्यमंत्री बनेंगे तो पहला विकेट राकेश शर्मा का ही गिरेगा. इसकी एक बड़ी वजह यह थी कि उन्हें हरीश रावत के पूर्ववर्ती विजय बहुगुणा का बेहद खास माना जाता था.

बहुगुणा के मुख्यमंत्री रहते हुए राकेश शर्मा ने औद्योगिक विकास, खनन, आपदा नियंत्रण और वित्त जैसे मलाईदार विभागों की कमान जिस तरह से संभाली हुई थी उसके चलते उनकी छवि बेहद विवादित अधिकारी की बन गई थी. उनपर तब भ्रष्टाचार के कई गंभीर आरोप भी लगे, जिसके चलते विजय बहुगुणा की छवि को भी बहुत नुकसान पहुंचा. हालांकि इस नुकसान की परवाह किए बिना बहुगुणा ने आखिर तक उन्हें अपने साथ बनाए रखा. 

उस समय हरीश रावत गाहे-बगाहे बहुगुणा और शर्मा की जोड़ी पर तंज कसते थे. जिससे ऐसा लगता था कि मुख्यमंत्री बनते ही वो सबसे पहले राकेश शर्मा को हटाएंगे.

समय का पहिया घूमा और रावत राज्य के मुख्यमंत्री बन गए. उन्होंने साल भर के भीतर राकेश शर्मा के पुनर्वास के लिए मुख्य प्रधान सचिव मुख्यमंत्री जैसा नया पद गढ़ कर राज्य में एक नई परिपाटी शुरू कर दी है. 

राकेश शर्मा कांग्रेस और भाजपा दोनों दलों की सरकार में काम कर चुके हैं

शर्मा की हनक का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि राज्य के सबसे बड़े विपक्षी दल भाजपा ने भी उनकी नियुक्ति के खिलाफ चूं नहीं किया.

जानकारों के मुताबिक राकेश शर्मा के खिलाफ बोलकर विपक्ष के लेना कोई खतरा मोल नहीं लेना चाहते. नाम न बताने की शर्त पर एक बड़े अधिकारी कहते हैं, " राकेश शर्मा कांग्रेस और भाजपा दोनों दलों की सरकार में काम कर चुके हैं. उन्हें दोनों सरकारों की कमजोर नसें जानते हैं. यही वजह है कि भाजपा उनका विरोध नहीं कर पा रही है."

वरिष्ठ अधिकारी अपनी बात समझाने के लिए तीन साल पहले की एक घटना का जिक्र करते हैं. उन्होंने बताया कि 17 नवंबर 2012 को देश की राजधानी दिल्ली से सटे  इलाके छतरपुर में एक हत्याकांड हुआ था. उसमें शराब कारोबारी पोंटी चड्ढा और उनके भाई की मौत हो गई थी. बाद में पता चला कि इस हत्याकांड के तार उत्तराखंड के एक नेता से जुड़े थे जिन्हें राज्यमंत्री का दर्जा प्राप्त था. वो नेता अभी सलाखों के पीछे हैं.

राकेश शर्मा के दामन पर लगा यह इकलौता आरोप नहीं है

उस समय यह चर्चा उठी थी कि छतरपुर में हुए हत्याकांड के वक्त राकेश शर्मा घटनास्थल पर मौजूद थे. मुख्यमंत्री के बेहद करीबी अधिकारी की मौजूदगी की बात सामने आते ही बवाल खड़ा हो गया. उस समय लगा कि शर्मा भी जांच के लपेटे में आ सकते हैं. लेकिन बाद में यह मामला दब गया.

राकेश शर्मा के दामन पर इस तरह के कई दाग हैं. औद्योगिक विकास विभाग का सचिव रहते हुए उन पर सरकारी जमीनों को औने-पौने दामों पर भूमाफियाओं को देने का गंभीर आरोप लगा था. उत्तराखंड के स्वतंत्र पत्रकार दीपक आजाद ने उनके खिलाफ नैनीताल हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका भी दायर की है. उन्होंने शर्मा पर बेहद गंभीर आरोप लगाए गए हैं.

शर्मा पर गलत तरीके से खनन के पट्टे जारी करने के आरोप भी लगे हैं. हरिद्वार स्थित 'मातृ सदन' गंगा नदी में होने वाले खनन के खिलाफ लंबे समय से आवाज उठाता रहा है. मातृ सदन ने उनके खिलाफ जांच कराने की मांग की है. 

मातृ सदन के संस्थापक शिवानंद के शिष्य निगमानंद की 76 दिनों तक अनशन के बाद मृत्यु हो गई थी.

ऐसे में सवाल उठता है कि इतनी विवादित छवि के बावजूद रावत राकेश शर्मा को क्यों बनाए रखना चाहते हैं?

भाकपा माले की राज्य इकाई के सदस्य इंद्रेश मैखुरी कहते हैं, "हरीश रावत ने राकेश शर्मा को पैसा और संसाधन इकट्ठा करने के लिए अपने साथ रखा हुआ है, जिसके दम पर वो 2017 का विधानसभा चुनाव फतह करना चाहते हैं."

मैखुरी ने शर्मा की नियुक्ति को रद्द करने की मांग करते हुए राज्यपाल को एक चिट्ठी भी लिखी है जिसमें शर्मा से जुड़े कई सारे सवाल उठाए हैं. 

मैखुरी सवाल उठाते हुए कहते हैं, "ऐसी क्या मजबूरी है कि रावत बाकी अधिकारियों के होते हुए एक रिटायर और बदनाम अधिकारी को अपने गले से लगाए हुए हैं?"

पूरे मामले में सबसे हैरान करने वाला रवैया विपक्षी भारतीय जनता पार्टी का है जिसने चुप्पी साध रखी है

भाकपा माले के अलावा उत्तराखंड क्रांति दल और उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी ने भी राकेश शर्मा की नियुक्ति पर ऐतराज जताया है.

इस पूरे मामले में सबसे हैरान करने वाला रवैया विपक्षी भारतीय जनता पार्टी का है. न तो पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष, न ही नेता प्रतिपक्ष और न ही पांचों सांसदों ने राकेश शर्मा की नियुक्ति के खिलाफ सार्वजनिक तौर पर कुछ कहा है. जबकि भाजपा नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने हरीश रावत को पत्र लिख कर उनके फैसले से नाराजगी जताई थी.

कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रदेश भाजपा की इस चुप्पी के पीछे एक बड़ी वजह खुद केंद्र सरकार का एक फैसला भी है.

जिस तरह हरीश रावत ने राकेश शर्मा के पुनर्वास के लिए नया पद ईजाद किया उससे कुछ समय पूर्व केंद्र सरकार द्वारा गैर परंपरागत तरीके से नृपेंद्र मिश्र की पीएमओ में नियुक्ति की याद आती है. तब एक अध्यादेश के जरिए नियुक्ति की प्रक्रिया को बदला गया था और नृपेंद्र मिश्रा को प्रधानमंत्री का प्रधान सचिव नियुक्त किया था.

जय सिंह रावत कहते हैं, "भाजपा जानती है कि अगर वो राकेश शर्मा की नियुक्ति पर सवाल उठाती है तो उसे नृपेंद्र मिश्र पर सफाई देनी पड़ेगी."

एक नौकरशाह की उंगलियों पर पूरा सिस्टम कैसे नाचता है, राकेश शर्मा इसका जीता जागता प्रमाण हैं

जय सिंह रावत यह भी कहते हैं कि भाजपा शायद इसलिए भी चुप है क्योंकि राकेश शर्मा ने उसे भी कृतार्थ किया हुआ है. 

राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यदि भाजपा इस मुद्दे को उठाती तो आगामी विधानसभा चुनाव में उसे इसका लाभ जरूर मिलता. लेकिन शर्मा की बंद मुट्ठी में भाजपा के खिलाफ भी शायद ऐसे राज हैं जो खुल गए तो उसे जवाब देना मुश्किल हो जाएगा.

बहरहाल 9 नवंबर 2000 को अस्तित्व में आये उत्तराखंड ने इसी महीने अपने पंद्रह बरस पूरे किए हैं. इन पंद्रह वर्षों में राकेश शर्मा ने बतौर ब्यूरोक्रेट जितनी लंबी छलांग लगाई है, वह अब तक के सभी नौकरशाहों पर भारी पड़ती है. जानकार मानते हैं कि उत्तराखंड की ब्यूरोक्रेसी उनके इर्दगिर्द सिमटकर रह गई है.

एक नौकरशाह की उंगलियों पर पूरा सिस्टम कैसे नाचता है, राकेश शर्मा इसका जीता जागता प्रमाण हैं.

(लेखक के विचार निजी हैं)

First published: 4 December 2015, 7:12 IST
 
प्रदीप सती @catchhindi

स्वतंत्र पत्रकार

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