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फ़ेसबुक का फ्री बेसिक्स 'फ्री' कत्तई नहीं है

टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरटी ऑफ़ इंडिया(ट्राई) को 'फ्री बेसिक्स' के ख़िलाफ़ याचिका भेजने की तारीख 14 जनवरी तक बढ़ा दी है. फ़ेसबुक अपनी इस योजना को "फ़्री इंटरनेट" के रूप में प्रचारित कर रहा है. आइए हम इस मुद्दे से जुड़ी वो बातें आपको बताते हैं जिन्हें जानना जरूरी है.

फ्री बेसिक्स क्या है?


20 अगस्त को फ़ेसबुक ने इंटरनेट डॉट ऑर्ग लॉन्च किया. फ़ेसबुक ने कहा कि उसकी 'ज़ीरो-रेटिंग सर्विस' से उन लोगों को 'मुफ़्त' इंटरनेट मिलेगा जो इसका ख़र्च नहीं उठा सकते. इसके समर्थकों का दावा था कि जिन देशों में इंटरनेट की पहुंच सीमित है उनमें लाखों लोगों को इसकी सुविधा मिल सकेगी. उनका दावा है कि बेहतर इंटरनेट से लोगों को बेहतर लोकतंत्र और बेहतर प्रशासन मिलेगा.

इन दावों से लगता है कि ये कोई समाज सेवा का काम है लेकिन ऐसा है नहीं.

इस सेवा के माध्यम लोगों को 'मुफ्त इंटरनेट' नहीं मिलेगा. इसके माध्यम से उसे कुछ सीमित वेबसाइटें देखने की सुविधा मिलेगी. जाहिर है इन वेबसाइटों का चुनाव फ़ेसबुक करेगा. शुरू-शुरू में वो ऐसा शायद न भी करे लेकिन अंततोगत्वा यही होगा. इससे साफ़ है कि कंपनी की ये योजना ओपेन इंटरनेट के बुनियादी सिद्धांत 'नेट न्यट्रैलिटी' का ख़िलाफ़ है.

नेट न्यूट्रैलिटी का सीधा मतलब ये है कि इंटरनेट पर सभी को समान मौका मिले. कोई पैसे के दम पर इसका दुरुपयोग न कर सके. मसलन, गूगल किसी दूसरे सर्च इंजन के मुक़ाबले ज्यादा पैसा देकर अपने डाटा ट्रांसमिशन की रफ़्तार नहीं बढ़वा सकता. इस सिद्धांत की वजह से एक सामान्य ब्लॉगर और किसी ग्लोबल कॉर्पोरेशन की वेबसाइट को इंटरनेट पर समान मौक़ा मिलता है.

इसलिए इंटरनेट डॉटऑर्ग का काफ़ी विरोध हुआ. जब ये मामला दूरसंचार मंत्रालय में पहुंचा तो उसने जुलाई में प्रस्तुत अपनी रिपोर्ट में कहा, "नेट न्यूट्रैलिटी के मूल सिद्धांत का ज़रूर संज्ञान लिया जाना चाहिए."

फ्री बेसिक्स मुफ्त में इंटरनेट की सुविधा नहीं देता बल्कि ये ख़ुद की चुनी कुछ वेबसाइटें मुफ़्त में उपलब्ध कराएगा

जनता के व्यापक विरोध के बाद फ़ेसबुक ने इंटरनेट डॉटऑर्ग को फ्री बेसिक्स के नए नाम से पेश किया. ये नया नामकरण फ़ेसबुक के संस्थापक मार्क ज़करबर्ग और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका के सिलिकॉन वैली में हुई बैठक के पहले किया गया.

फ़ेसबुक ने नाम बदलने की कोई वज़ह नहीं बतायी. लेकिन इसके आलोचक इस बात पर जोर देते हैं कि जनता के विरोध के चलते ही फ़ेसबुक ने अपनी योजना का नाम बदला है. उस वक़्त हुए विरोध के कारण एनडीटीवी और क्लियरट्रिप जैसे कई बड़े संस्थानों ने ख़ुद को इस योजना से बाहर कर लिया था.

विवाद की वजह?


फ्री बेसिक्स को दुनिया के 36 देशों में लॉन्च किया गया था. भारत में फ़ेसबुक का पार्टनर रिलायंस टेलीकॉम है. भारत के दूरसंचार सेक्टर की निगरानी रखने वाली सर्वोच्च संस्था ट्राई ने 22 दिसंबर को रिलायंस से तब तक रोकने के लिए कहा जब तक कि संस्था ये तय नहीं कर लेती कि इससे नेट न्यूट्रैलिटी का उल्लंघन होता है या नहीं.

ट्राई इस मसले पर कंसल्टेशन पेपर के माध्यम से विचार कर रहा है. इसका सीधा अर्थ ये हुआ कि ट्राई आम लोगों की भेजी राय को ध्यान में रख कर ही इस मसले पर कोई फ़ैसला करेगा. जनता के पास ट्राई तक अपनी राय भेजने के लिए 30 दिसंबर तक का ही समय है.

इसे देखते हुए फ़ेसबुक पिछले कुछ दिनों से भारत के सभी प्रमुख अख़बारों में अपनी योजना के समर्थन में विज्ञापन छपवाए हैं.

कॉमेडियन केनेथ सेबैस्टियन फ्री बेसिक्स पर अपनी राय साझा करते हुए

फ्री बेसिक्स में क्या ख़राबी है?


फ़ेसबुक के नए प्रचार कैंपेन के बाद लोगों ने इसकी और बारीक जांच शुरू कर दी. अल्टरनेट लॉ फ़ोरम की स्मारिका कुमार कहती हैं, "अगर फ्री बेसिक्स मोबाइल सेवा देने वाली सभी कंपनियों के लिए है तो फ़ेसबुक उनसे संपर्क क्यों नहीं कर रहा है ताकि वो भी फ्री बेसिक्स को अपने नेटवर्क पर फ्री में दें?"

वो सवाल उठाती हैं, "इसके लिए केवल रिलायंस को क्यों चुना गया है? इससे सभी टेलीकॉम और मोबाइल ऑपरेटरों को क्यों नहीं जोड़ा गया?"

फ़ेसबुक के दावों के उलट ये एक 'ओपेन प्लेटफॉर्म' नहीं है. इसकी गाइडलाइन फ़ेसबुक तय करेगी. वही तय करेगा कि कौन इसपर कंटेट देगा, उसे देने का मानदंड क्या होगा और किस तरह देगा. कुल मिलाकर फ़ेसबुक के इस 'फ्री इंटरनेट' की चौकीदारी फ़ेसबुक के हाथ में रहेगी.

वर्ल्ड वाइड वेब के संस्थापक टिम बर्नर-ली ने द गार्डियन अख़बार से बातचीत में कहा है, "ये कत्तई फ्री नहीं है. ये पब्लिक डोमेन में भी नहीं है."

ली ने आगे कहा, "अगर इंटरनेट को सस्ता बनाना ही था तो इसके लिए और भी तरीके हो सकते हैं. मुझे लगता है कि लोगों को इंटरनेट का एक ख़ास हिस्सा उपलब्ध कराना प्रतिगामी कदम है."

फ़ेसबक का दावा है कि फ्री बेसिक्स मुफ्त है लेकिन वो नहीं बताता कि इसकी चौकीदारी उसके हाथ में ही रहेगी

फ़ेसबुक के पास फ्री बेसिक्स की गाइडलाइन को कभी भी बदलने का अधिकार रहेगा. कंपनी ने ये अधिकार भी अपने पास ही रखा है कि उसेक प्लेटफॉर्म से कौन जुड़ सकेगा और कौन नहीं. ऐसे हालात में फ़ेसबुक किसी को फ्री बेसिक्स के जुड़ने के लिए अपनी शर्तें मानने पर मजबूर कर सकता है.

जाहिर है कि फ़ेसबुक ने अपने दो-दो पेज को विज्ञापनों में ये बातें नहीं बतायी हैं. लेकिन उसने जो बातें बतायी हैं उनमें से कई चीज़ें ग़लत तरीके से पेश की गई हैं.

निखिल पाहवा मिडियानामा के संस्थापक हैं. नेट न्यूट्रैलिटी कैंपेन के समर्थन में अगुआ रहे हैं. निखिल कहते हैं, "लोगों को ये यकीन दिलाने के लिए कि फ्री बेसिक्स को बहुत सारे लोगों का समर्थन प्राप्त है फ़ेसबुक ने भ्रामक तरीका अपनाया."

पाहवा कहते हैं कि भारत में इंटरनेट की पहुंच कभी समस्या नहीं रही है. वो कहते हैं, "भारत के एक चौथाई इंटरनेट यूजर्स पिछले एक साल में इससे जुड़े हैं. दिक्कत ये है कि फ़ेसबुक जैसी कंपनी हमारे देश के सभी भावी इंटरनेट यूजर्स पर कब्जा जमा लेना चाहती है, जिससे इंटरनेट के खुलेपन और आज़ादी को धक्का पहुंचेगा."

फ़ेसबुक ने क्या भ्रामक प्रचार किया?


'सेव द इंटरनेट' नामक स्वयंसेवी समूह फ्री बेसिक्स के विरोध में जनजागरूकता अभियान चलाया है. संस्था ने फ़ेसबुक के विज्ञापन में किए गये दावों को बिंदुवार जवाब दिया है-

फ्री बेसिक्स पर किसी तरह का शुल्क नहीं है


फ़ेसबुक भले ही फ्री बेसिक्स से पैसा न कमाए टेलीकॉम ऑपरेटरों की इससे जरूर कमायी होगी. टेलीकॉम ऑपरेटरों की नए यूजर्स से ही कमायी होती है. चूंकि रिलायंस एकमात्र नेटवर्क है जिसपर फ्री बेसिक्स उपलब्ध होगा इसलिए इसके सहारे रिलायंस का प्रचार होगा.

फ्री बेसिक्स के डाटा के लिए हम कोई पैसा नहीं देंगे. ऑपरेटर इससे इसलिए जुड़ रहे हैं क्योंकि इससे अधिक से अधिक लोग इंटरनेट से जुड़ेंगे


फ्री बेसिक्स का मक़सद लोगों तक इंटरनेट पहुचाना नहीं है. इसपर फ़ेसबुक और उसके साझेदार वेबसाइटें मुफ्त उपलब्ध रहेंगी इनके अलावा बाक़ी सब के लिए पैसा देना होगा. जिन लोगों के पास पहले से इंटरनेट सुविधा है उन्हें भी फ्री बेसिक्स मुफ्त उपलब्ध रहेगा. इससे फ़ेसबुक और उसके साझेदारों को लाभ मिलेगा. इसीलिए फ्री बेसिक्स नेट न्यूट्रैलिटी के सिद्धांतों के ख़िलाफ़ है.

फ्री बेसिक्स एक ओपेन प्लेटफॉर्म है. कोई भी डेवलपर और पब्लिशर इसपर अपना कंटेट उपलब्ध करा सकता है


फ्री बेसिक्स ओपेन प्लेटफॉर्म नहीं है. फ्री बेसिक्स की गाइडलाइन फ़ेसबुक तय करेगा. उसके पास इसे कभी भी बदलने का अधिकार सुरक्षित है. किसी को फ्री बेसिक्स भी इससे जुड़ने देने या न देने का आखिरी फैसला फ़ेसबुक का होगा. यानी इससे जुड़ने के लिए लोग फ़ेसबुक की शर्तें मानने के लिए बाध्य होंगे.

इंटरनेट एक्टिविस्टों को कहना है कि फ़ेसबुक को प्रतियोगी बढ़त दिये बिना लोगों तक मुफ्त इंटरनेट की सेवा पहुंचाने के कई दूसरे तरीके हो सकते हैं.

फ्री बेसिक्स पर सूचना का एकमात्र स्रोत फ़ेसबुक होगा. ब्राजील में पहले ही भ्रामक विज्ञापन के लिए फ़ेसबुक की आलोचना हो चुकी है.

इंटरनेट एक्टिविस्टों को कहना है कि अगर फ़ेसबक सचमुच लोगों तक इंटरनेट पहुंचाने के प्रति गंभीर है तो उसे सीमित गुणवत्ता के साथ पूरा इंटरनेट उपलब्ध कराना चाहिए. केवल कुछ वेबसाइटें फ्री में उपलब्ध कराना इसका सही तरीका नहीं है.

एंटरप्रेन्योर के लिए भी फ्री बेसिक्स घाट का सौदा साबित होगा. अगर आप कोई वेबसाइट या ऐप बनाते हैं और इसे अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं तो आपके पास फ़ेसबुक पर विज्ञापन देने के अलावा कोई विकल्प नहीं होगा. और पैसा देने के बावजूद फ़ेसबुक ने आपको अपने प्लेटफॉर्म पर जोड़ने से मना कर दिया तो आपका क्या होगा?

फ्री बेसिक्स से खुली प्रतियोगिता के सिद्धांत का भी उल्लंघन होता है. मान लीजिए आपने व्हाट्सऐप को टक्कर देने के लिए कोई मैसेजिंग ऐप बनाया तो क्या फ्री बेसिक्स उसे समर्थन देगा? चाहे आपका ऐप उससे बेहतर ही क्यों न हो?

फ्री बेसिक्स की आलोचना के बाद फ़ेसबुक के संस्थापक मार्क ज़करबर्ग ने एक राष्ट्रीय अख़बार में 28 दिसंबर को इसके बचाव में एक लेख लिखा है. इसके बाद कंपनी ने एक बयान जारी करके कहा कि वो इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया जैसे किसी भी थर्ड-पार्टी एजेंसी से इसकी जांच कराने को तैयार है.

इंटरनेट डॉटऑर्ग के वाइस-प्रेसिडेंट क्रिस डैनियल्स ने कहा, "इससे ट्वीटर, गूगल प्लस जैसी सेवाओं को फ्री बेसिक्स से जोड़कर हमें ख़ुशी होगी. कई लोगों ने इसकी मांग की है."

लेकिन पाहवा जैसे एक्टिविस्ट उनसे सहमत नहीं हैं. इस मुद्दे पर अपनी राय बनाने के लिए आप एआईबी का नीचे दिया गया वीडियो भी देख सकते हैं.

आज इंटरनेट हमारे लिए एक विकल्प मात्र नहीं है. ये हमारी ज़रूरत बन चुका है. विकसित और विकासशील दोनों तरह के देशों में नेट न्यूट्रैलिटी को लेकर बहस छिड़ी हुई है. जब अमेरिका में ऐसी ही बहस चली तो ज़करबर्ग ने खुलकर नेट न्यूट्रैलिटी का समर्थन किया था.

ज़करबर्ग के लिए शायद भारत में ये बहस जरूरी नहीं क्योंकि यहां अभी बुनियादी सुविधाओं की अभाव है. उनका मानना है कि कुछ न होने से कुछ होना अच्छा है.

क्वार्टज़ में छपे एक विश्लेषण के अनुसार लाखों लोगों को लगता है कि फ़ेसबुक ही इंटरनेट है. अगर ज़करबर्ग की मंशा पूरी हो गयी और फ्री बेसिक्स ज़मीनी स्तर पर लागू हो जाता है तो बहुत सारे लोगों के लिए फ़ेसबुक और इंटरनेट के एक ही मायने हो जाएगा. जाहिर ऐसा मानने वालों में बड़ी संख्या भारतीयों की है. ऐसा हुआ तो ये हमारे देश, हमारे लोकतंत्र और इंटरनेट बाज़ार सभी के लिए बुरा होगा.

First published: 31 December 2015, 8:19 IST
 
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