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क्या कभी मोहन भागवत की जगह ले पाएंगी भारत माता?

अनिल यादव | Updated on: 21 March 2016, 9:14 IST
QUICK PILL
  • सरसंघचालक मोहन भागवत का यह कहना कि सबको भारत माता की जय कहने के लिए तैयार करना होगा, एक नए विवाद की वजह बन गया है.
  • एमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने उन्हें चुनौती देते हुए कहा है कि वे भारत माता की जय नहीं बोलेंगे. उनके विधायक वारिस पठान को महाराष्ट्र विधानसभा के पूरे सत्र से निलंबित कर दिया गया.
  • क्या भारत माता की जय बोलना ही देशभक्ति का पैमाना हो गया है? क्या यही भारत की मूलभूत समस्याओं का इलाज है या फिर यह राजनेताओं की जनता को भटकाने की एक और तरकीब है? 

अगर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की “भारत माता कसौटी” पर रख कर देखा जाए तो गरीब निवेशकों से धोखाधड़ी के आरोप में तिहाड़ जेल में बंद सुब्रत राय सहारा को सबसे बड़ा देशभक्त होना चाहिए. वे अपनी कंपनी सहारा इंडिया के सभी दफ्तरों में गणतंत्र दिवस पर भारत माता की डिजाइनर प्रतिमा को फूल मालाओं से लाद कर भारत-पर्व मनाया करते थे.

इसके अलावा वे भारतीय क्रिकेट टीम को नीली जर्सी पहनाने का काम भी किया करते थे जो मैचों की किस्मों के हिसाब से कभी देश का गौरव बढ़ाती है तो कभी टूट कर नीलाम हो जाया करती है.

यह एक कारपोरेट कंपनी की राष्ट्रवाद और पापुलर खेल से जुड़ी जनसाधारण की भावनाओं को अपने धंधे के पक्ष में इस्तेमाल करने की ट्रिक थी.

आरएसएस भी अपने खास ढब के नफरत पर आधारित हिंदू राष्ट्र की परियोजना को पूरा करने के लिए भारत माता का इस्तेमाल करते हुए देशभक्ति का सर्टिफिकेट बांट रहा है. इतर विचार रखने वालों को हिंसा से आतंकित कर रहा है. इसका फायदा सिर्फ ओवैसी जैसे सस्ते गलेबाजों को ही नहीं मिल रहा है जो मुसलमानों के असल सवालों को भुलाकर, आरएसएस को चुनौती देने की अदाकारी से, उनके मजहबी रहनुमा होने की लफ्फाजी करते हुए आसानी से उनके वोट हथियाने का ख्वाब देख रहे हैं बल्कि पुराने प्रचारक और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी मिल रहा है. सारे चुनावी वादों को जनता को आसानी से लपेट लेने वाले एक के बाद एक हंगामों की ओट में छिपाया जा रहा हैं. किसी भी दायित्वहीन सरकार के लिए यह मनोरंजक ढंग से मुफीद स्थिति है.

आरएसएस अपने प्रधानमंत्री के बचाव में सत्ता से मिली ताकत के बूते एक काल्पनिक चित्र के जैकारे को हिंसक ढंग से थोप रहा है

यह सिर्फ हथकंडा है तो आरएसएस के कारनामें को समाज के एक बड़े हिस्से का समर्थन क्यों मिल रहा है? इसके लिए परिस्थितियां मौजूं हैं. इसे यूं भी देखा जा सकता है कि भारत माता के हिंसक पैरोकार उनके साथ भी वही सलूक कर रहे हैं जो हमारा समाज अपनी औरतों के साथ करता है.

कुछ खास धार्मिक मौकों पर उन्हें देवी कहकर पूजने का नाटक किया जाता है, बाकी वक्त बलात्कार, भ्रूण हत्या, दहेज के लिए जलाने का सिलसिला चलता रहता है. आरएसएस भी भारतमाता की संतानों की तकलीफों को छू मंतर कर देने का वादा करने वाले अपने प्रधानमंत्री का बचाव करने के लिए सत्ता से मिली ताकत के बूते एक काल्पनिक चित्र के जैकारे को हिंसक ढंग से थोप रहा है.

सारा देश अगर सुबह शाम भारत माता के आरएसएस वर्जन (1905 में अवनींद्रनाथ टैगोर की बनाई भारत माता की पहली तस्वीर में उन्हें सिर्फ बंगमाता बताया गया था और देश में उसके कई रूप मिलते हैं) की पूजा करने लगे तो क्या भारत को वह समृद्धि, शांति और गौरव मिल जाएगा जिसका स्वप्न नरेंद्र मोदी समेत कई पुराने प्रधानमंत्री दिखाते रहे हैं.

युवा यह सवाल न पूछें इसीलिए आस्था और अफवाहों की मदद से उनका लंपटीकरण किया जा रहा है. वे विरोधियों को पीटकर चुप्पी का प्रबंध करें और अपनी नाकाम जिंदगी में पुरूषार्थ का नकली बोध हासिल करें.

योजना है कि हिंसक युवा विरोधियों को पीटकर उनके लिए चुप्पी का प्रबंध करें और अपनी नाकाम जिंदगी में पुरूषार्थ का नकली बोध हासिल करें

इससे पहले बिहार चुनाव में धार्मिक ध्रुवीकरण के मकसद से गौमाता का इस्तेमाल किया जा चुका है. भारत के बीफ का बड़ा निर्यातक होने और खुद भाजपा नेताओं के इस व्यापार में शामिल होने के तथ्यों के सामने आने के बाद यह मुद्दा फुस्स हो गया.

अब महाराष्ट्र में गौहत्या पर प्रतिबंध के खिलाफ खुद भाजपा के एक विधायक ने आवाज उठाई है. अगला नंबर गंगा माता का हो सकता है. आरएसएस और आनुषांगिक संगठन गंगा को निर्मल कराना चाहते हैं लेकिन उसमें कचरा डालने वाले उद्योगों के खिलाफ वे नहीं बोलते.

हो सकता है कल गंगा माता का पानी मुसलमानों या ईसाईयों के छूने पर एतराज खड़ा किया जाए और प्रदूषण का मुद्दा ही तेल लेने चला जाए. आरएसएस के पास अव्यवाहारिक मुद्दों की भरमार है जिन्हें सत्ता की ताकत से अब आजमाने का दुर्लभ अवसर आया है.

हो सकता है कल गंगा माता का पानी मुसलमानों या ईसाईयों के छूने पर एतराज खड़ा किया जाए और प्रदूषण का मुद्दा ही बिला जाए

इसी बीच नब्बे सालों बाद आरएसएस ने अपनी ड्रेस बदली है. यानि परिवर्तन से परहेज नहीं है. अगर इस संगठन का नेतृत्व चाहे तो दूसरों से जबरदस्ती भारत माता की जै बोलवाने के बजाय किसी महिला को संघ का प्रमुख बनाकर बड़ी लकीर खींच सकता है. शोशेबाजी से आगे बढ़कर यह भारत माता को सम्मान और गौरव दिलाने की दिशा में एक वास्तविक कोशिश होगी.

First published: 21 March 2016, 9:14 IST
 
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