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क्या बंगाल में होगा बिहार की तर्ज पर महागठबंधन?

रजत रॉय | Updated on: 4 February 2016, 12:23 IST

प. बंगाल के आगामी विधानसभा चुनावों में संभवत: पहली बार पश्चिम बंगाल गठबंधन की राजनीति से रूबरू होगा. सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ कांग्रेस और वाम कंधे से कंधा मिलाकर लड़ सकते हैं. एक फ़रवरी 2016 को प्रदेश कांग्रेस के नेताओं ने अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के उपाध्यक्ष राहुल गांधी के सरकारी बंगले में करीब 90 मिनट लंबी चर्चा की थी. 

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी के नेतृत्व में राज्य कांग्रेस के प्रतिनिधिमंडल ने राहुल गांधी की सहमति हासिल करने की नीयत से कहा कि इस बार वे वाम मोर्चा के साथ गठबंधन करके तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़ना चाहते हैं. कांग्रेस उपाध्यक्ष ने उन्हें आश्वासन दिया कि वह राज्य की ओर से मिले इस संदेश को पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी तक ले जाएंगे और बहुत जल्द ही कांग्रेस हाईकमान द्वारा इस संबंध में कोई निर्णय ले लिया जाएगा.

कांग्रेस के साथ गठबंधन के मुद्दे पर कोई निर्णय लेने की प्रक्रिया में माकपा, वामपंथी दलों के नेता भी जुटे हुए हैं. कोलकाता में 12-13 फरवरी को माकपा राज्य समिति भी मुलाकात करेगी. माकपा पोलित ब्यूरो 16 फ़रवरी को मिलेगी और अगले दो दिनों (17-18 फरवरी) तक माकपा की केंद्रीय समिति स्थिति का आकलन कर अंतिम निर्णय लेगी. 

जिस तरह से मामला सामने आ रहा है उससे लगता है कि पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य, वर्तमान राज्य सचिव सूर्यकांत मिश्रा और वाम मोर्चा के अध्यक्ष बिमान बोस जैसे राज्य माकपा नेताओं ने सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ सभी लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष ताकतों को एकजुट करने का आह्वान किया है. पार्टी के पूर्व महासचिव प्रकाश करात ने कहा है कि एक बार राज्य समिति अपनी सिफारिशों को अंतिम रूप दे देगी उसके पोलित ब्यूरो इस पर विचार-विमर्श करेगी. 

2011 का राज्य विधानसभा चुनाव बंगाल की राजनीतिक इतिहास के लिए निर्णायक साबित हुआ

पार्टी लाइन के अनुरूप ही निर्णय को स्वीकार किया जाएगा. हालांकि अनौपचारिक रूप से दोनों पक्ष भले ही गठबंधन को लेकर एकराय नजर आ रहे हैं लेकिन अभी तक इस गठबंधन के लिए कोई औपचारिक प्रस्ताव दोनों पक्षों की तरफ से नहीं आया है. नाम न छापने की शर्त पर बंगाल से राज्य समिति के एक सदस्य ने कहा, "कांग्रेस को अभी अपना मन बनाना बाकी है. ऐसे अनिश्चित माहौल में हम कोई निर्णय नहीं ले सकते." क्योंकि विधानसभा चुनाव केवल 2-3 महीने बाद है इसलिए दोनों शिविरों में गतिविधियां बढ़ गई हैं.

राहुल गांधी से मुलाकात करने के बाद वापस लौटे प्रदेश कांग्रेस के नेताओं में से अधिकांश का विचार है कि जल्द ही हाईकमान द्वारा सकारात्मक निर्णय लिया जाएगा. राज्य कांग्रेस के प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व अधीर चौधरी ने किया जिसमें राज्य के सभी पांच सांसद और दो पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष शामिल थे. 

इस बैठक से मालूम हुआ है कि जहां प्रतिनिधिमंडल के अधिकांश सदस्य वाम के साथ गठबंधन के पक्ष में जाना चाहते हैं, वहीं मानस भुनिया और अभिजीत मुखर्जी (राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के बेटे) ने इसका विरोध किया और इसके बजाय चुनाव में अकेले जाने का प्रस्ताव रखा. माना जाता है कि राहुल गांधी को यह संदेश गया कि टीएमसी से गठबंधन को लेकर बंगाल कांग्रेस में आम सहमति नहीं हैं, लेकिन ज्यादातर लोग वाम से गठबंधन के पक्ष में हैं. कुछ लोग ऐसे भी हैं जो चाहते हैं कि न तो टीएमसी से गठबंधन किया जाए और न ही वाम से.

2011 का राज्य विधानसभा चुनाव बंगाल के राजनीतिक इतिहास के लिए निर्णायक साबित हुआ. उस वर्ष कांग्रेस और टीएमसी ने गठबंधन कर चुनाव लड़ा. इस गठबंधन ने जबर्दस्त जीत हासिल की. कुल 294 मेेें से टीएमसी ने 184 और कांग्रेस ने 42 सीटें जीतीं और वाम को 62 सीटें मिलीं. टीएमसी का वोट प्रतिशत 39, कांग्रेस का 9 फीसदी ही रहा. जबकि वाम दलों को 39.60 फीसदी वोट मिले.  

2014 के चुनाव में कांग्रेस अकेले लड़ी. चुनाव के नतीजों से साफ है कि भाजपा का वोट बैंक बढ़ा. 2011 के चुनाव में भाजपा का वोट प्रतिशत करीब चार फीसदी था वहीं 2014 में यह बढ़कर 16.90 फीसदी हो गया. कांग्रेस अपना वोट बैंक बचाने में काफी हद तक सफल रही और उसे 9.60 फीसदी वोट मिले. यानी इस चुनाव में उसे मामूली नुकसान हुआ. 

हालांकि राज्य के कांग्रेस नेताओं का मानना है कि यूपीए एक और दो सरकारों के हितों के बचाव और सीपीआईएम को सबक सिखाने की हड़बड़ी के कारण केंद्रीय नेतृत्व ने राज्य कांग्रेस के हितों की अनदेखी की. 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और टीएमसी ने गठबंधन किया लेकिन कांग्रेस आलाकमान ममता बनर्जी की मांगों के आगे झुक गई.

जिस तरह से टीएमसी कार्यकर्ताओं ने वामपंथी कार्यकर्ताओं पर हिंसक हमले किए, उससे उनका हौसला पस्त हो गया है

दक्षिणी बंगाल जहां गठबंधन की जीत तकरीबन तय मानी जा रही थी वहां ममता ने ज्यादातर सीटें ले लीं. कांग्रेस को केवल वहीं सीटें मिलीं जहां जीत की संभावना पहले से ही कम थी. नतीजतन कांग्रेस टीएमसी गठबंधन को 222 सीटें मिली जिनमें कांग्रेस की महज 42 सीटें थीं. कांग्रेस दक्षिणी बंगाल के मुर्शीदाबाद जिले और उत्तरी बंगाल के कुछ जिलों तक सीमित हो गई. जब इन इलाकों में टीएमसी ने अपना जमीनी प्रभाव बढ़ाना शुरू किया तो कांग्रेस असहज हो गई. 

कांग्रेस का वामपंथ से टकराव बहुत पुराना है. इसलिए उससे गठबंधन के बारे में बात करना बहुत कठिन राह है. लेकिन आखिरकार दक्षिणी बंगाल के नेता अब्दुल मन्नान ने वामपंथ से गठबंधन की जरूरत को रेखांकित किया है.

वाममोर्चे को भी शायद इस बात का अहसास हो गया है और शायद कांग्रेस से ज्यादा. जिस तरह से टीएमसी कार्यकर्ताओं ने वामपंथी कार्यकर्ताओं पर हिंसक हमले किए, उससे उनका हौसला पस्त हो गया है. ऐसी हिंसाओं में 170 पार्टी सदस्य मारे गए जबकि सैकड़ों बेघर हो गए. अगर ऐसे में चुनाव होता है तो वामपंथ को प्रतिरोध तो दूर अपनी मौजूदगी दर्ज कराने में भी मुश्किल आएगी. 

सिलीगुड़ी कॉरपोरेशन में कांग्रेस से अनौपचारिक गठबंधन करके मिली जीत से एक उम्मीद की किरण जगी है. दोनों दलों ने मिलकर बूथ कैप्चरिंग या ऐसी घटनाओं को विफल कर दिया. 

राज्य के वामपंथी नेता इसे सिलीगुड़ी मॉडल का नाम दे रहे हैं. जिसका समर्थन बढ़ता जा रहा है. अब राज्य के कांग्रेस और सीपीएम नेताओं की निगाहें नई दिल्ली की ओर लगी हुई हैं कि दोनों दलों का केंद्रीय नेतृत्व इस गठबंधन को हरी झंडी देगा. 

First published: 4 February 2016, 12:23 IST
 
रजत रॉय

Journalist based out of Kolkata.

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