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कमलनाथ की नियुक्ति से कांग्रेस को कुछ नुकसान तो हो ही चुका है

राजीव खन्ना | Updated on: 18 June 2016, 0:18 IST

कमलनाथ को पंजाब के प्रभारी पद से हटाना कांग्रेस का सही समय पर उठाया गया कदम है. कांग्रेस के इस निर्णय से बरसों पुरानी कहावत चरितार्थ होती है कि घाव नासूर बन जाए, उससे पहले ही उसका इलाज कर दिया जाना जरूरी है. कांग्रेस नेतृत्व ने इस संदर्भ में यही किया है.

रविवार को उनकी नियुक्ति के साथ ही पार्टी में राजनीतिक उथल-पुथल शुरू हो गई, जो लगातार बढ़ती ही जा रही थी. उनके हटने से पार्टी के चुनाव प्रचार ने जोर पकड़ा, क्योंकि कांग्रेसी नेता अपना सारा समय पार्टी के चुनाव कार्यक्रम और एजेंडे का प्रचार करने के बजाय कमलनाथ की नियुक्ति को जायज ठहराने में लगा रहे थे.

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कांग्रेस के एक अंदरूनी सूत्र के मुताबिक ‘हम जानते थे कि रविवार को कमलनाथ की नियुक्ति के बाद से ही पार्टी के भीतर सुगबुगाहट थी कि आलाकमान ने ऐसा क्यों किया.’ सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस के गलियारों में बहुमत यह कयास लगाने में जुटा था कि इस नुकसान की भरपाई पार्टी कब और कैसे करेगी, लेकिन किसी में इतना साहस नहीं था कि वह आलाकमान के सामने कमलनाथ की नियुक्ति रद्द करने का मुद्दा उठा सके. इस गलती को ठीक करने के बावजूद कांग्रेस के चुनाव प्रचार को पिछले तीन दिनों में कई मायनों में धक्का लगा है.

राजनीतिक पर्यवेक्षकों ने माना कि कमलनाथ की नियुक्ति निहायत ही गलत मौके पर की गई

पार्टी आलाकमान ने शिरोमणि अकाली दल और आम आदमी पार्टी को बैठे-बिठाए एक मुद्दा दे दिया. विश्लेषकों की त्वरित प्रतिक्रिया यही थी कि कमलनाथ की पंजाब में नियुक्ति से अकालियों को एक संवेदनशील मुद्दा मिल गया, जिसकी उन्हें कब से तलाश थी.

यह सर्वविदित है कि 1984 के दंगे पंजाबियों के दिलो दिमाग में आज भी ताजा हैं. चाहे आॅपरेशन ब्लू स्टार हो, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या या सिक्खों के खिलाफ दंगे. ये सारे मामले आज भी मतदाताओं का रुझान बदलने के लिए काफी हैं. जबकि वास्तविकता यह है कि ये चुनाव की दिशा तय करने वाले घटक नहीं हैं. पिछले दो दशकों में कांग्रेस नेतृत्व ने इन मामलों पर लोगों के बीच आक्रोश को शांत करने का भरसक प्रयास किया है.

पार्टी ने अपने खिलाफ किए जा रह सिख विरोधी दुष्प्रचार को भी विफल कर दिया था. पर्यवेक्षकों का मानना है कि एक कदम आगे बढ़ाते हुए कांग्रेस ने डाॅ. मनमोहन सिंह के रूप में देश को पहला सिख प्रधानमंत्री दिया. साथ ही 2005 में जनरल जेजे सिंह को पहला सिख चीफ आॅफ आर्मी स्टाफ बनाया.

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संयोगवश इस पद पर दूसरी नियुक्ति जनरल विक्रम सिंह की हुई, वह भी 2012 में कांग्रेस नीत यूपीए सरकार के दौरान. इन नियुक्तियों ने पंजाब में इस मिथक को तोड़ दिया कि कांग्रेस सिखों पर विश्वास नहीं करती. राजनीतिक विश्लेषकों का यह भी मानना है कि पार्टी ने बहुत ही चतुराई से निर्णय लिया, जब प्रधानमंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह ने संसद में 1984 के दंगों के लिए माफी मांगी और पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भी इस पर अफसोस जताया.

कांग्रेस नेतृत्व यह उदाहरण देकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गुजरात में मुस्लिम रोधी दंगों में उनके रवैये पर सवाल उठाता है.

बावजूद इसके कमलनाथ की नियुक्ति सही नहीं ठहराई जा सकती, भले ही कमलनाथ इन आरोपों से बरी हो चुके हों कि इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उन्होंने गुरुद्वारा रकाबगंज साहिब पर हमला किया था. यह सही समय पर उठाया गया सही कदम नहीं है.

हालांकि 1984 के दंगे कभी पंजाब में चुनावी मुद्दा नहीं रहे फिर भी यह चर्चा का विषय बन गया कि कांग्रेस ने आप और अकालियों को मुद्दा दे दिया था, जो उनके पास नहीं था. वरिष्ठ नेता जगतार सिंह के अनुसार अब कोई मसला नहीं रह गया है और अब कांग्रेस को निशाना बनाने के लिए वे कुछ और मुद्दे तलाशेंगे. पर्यवेक्षकों ने माना कि नाथ की नियुक्ति निहायत ही गलत मौके पर की गई.

कमलनाथ की नियुक्ति रद्द करके कांग्रेस ने फिलहाल सारे विवाद पर विराम लगा दिया है

पार्टी अपने उपाध्यक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व में जालंधर में अपनी ताकत दिखाने की तैयारी कर रही थी. पंजाब में नशे और बिगड़ती कानून व्यवस्था पर वह सरकार को घेरने की फिराक में थी. रविवार को जालंधर की सड़कों पर पंजाब के स्थानीय नेताओं, राहुल गांधी एवं तत्कालीन पार्टी प्रभारी शकील अहमद की तस्वीरों से सजे बैनर और होर्डिंग्स लगे थे. इसी बीच अहमद की जगह नाथ की नियुक्ति की घोषणा कर दी गई. पार्टी नेता इसकी पुष्टि करने के लिए इधर-उधर भागने लगे. कुछ लोग कमलनाथ के फोटो ढ़ूंढने में लग गए, ताकि होर्डिंग्स और बैनर पर अहमद की फोटो की जगह लगाया जा सके.

कुछ समझदार नेताओं ने ऐसा करने की जहमत बिल्कुल नहीं उठाई, जो यह जानते थे कि अहमद के नाम का फायदा उन्हें ज्यादा मिलेगा. पर्यवेक्षकों का मानना है कि इस सारी बेमतलब की बात ने पार्टी चुनाव प्रचार का माहौल शुरुआत में ही बिगाड़ कर रख दिया.

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तलवंडी में बैसाखी मेले के दौरान और दिनानगर में गन्ना किसानों को मूल्य मिलने में देरी के मुद्दों पर बात करके कांग्रेस ने अच्छा चुनावी प्रदर्शन किया. हमेशा बिखरी सी दिखाई देने वाली कांग्रेस पार्टी जालंधर में एकजुट दिखाई दी थी.

राहुल गांधी की मौजूदगी के बावजूद पार्टी ने एक मंच और स्टेज का इंतजाम किया, जहां राहुल गांधी भी अपने नेताओें के बीच बैठे दिखाई दिए. उनके साथ मंच पर सुनील जाखड़ जैसे वरिष्ठ नेता और मनप्रीत बादल भी दिखाई दिए, जिन्होंने हाल ही अपनी पंजाब पीपुल्स पार्टी का कांग्रेस के साथ विलय किया है.

इससे मतदाताओं के बीच एक सकारात्मक संदेश गया. लेकिन इस पर किसी का ध्यान नहीं गया क्योंकि आप और अकाली दल-भाजपा ने कमलनाथ की नियुक्ति के बाद आसमान सिर पर उठा लिया. पार्टी फिर से बचाव की मुद्रा में दिखने लगी. इसी बीच कैप्टन अमरिंदर सिंह के ‘हल्के विच कैप्टन’ चुनाव अभियान की घोषणा भी फीकी पड़ती नजर आई.

अकाली और आप दोनों ही दल गाहे-बगाहे आॅपरेशन ब्लू स्टार व सिख दंगों के मुद्दों को हवा देने की कोशिश में रहते हैं

यह कैप्टन अमरिंदर सिंह का चुनाव प्रचार का तरीका है. इसके तहत अमरिंदर 117 विधानसभा क्षेत्र में से प्रत्येक में एक दिन गुजारेंगे और लोगों से सीधा मिलेंगे. यानी वे दो करोड़ लोगों तक अपनी पहुंच बनाएंगे और पांच लाख लोगों से सीधे मिलेंगे. ‘आइए अपनी समस्या बताइए. कांग्रेस सरकार सत्ता में आई तो मेरा वादा है सौ दिन में टास्क फोर्स बनवा कर आपकी समस्याओं को हल किया जाएगा.'

अमरिंदर ने कहा, अकाली दल और भाजपा गठबंधन ने पंजाब को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया है, यहां तक कि लोगों की मूलभूत आवश्यकताएं ही पूरी नहीं की जा रही हैं. 'हल्के विच कैप्टन' का मेरा मकसद लोगों की समस्याएं सुनने और उनके एक समयसीमा में हल करने का आश्वासन देना है.

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कार्यक्रम के तहत ही 'लोकां दा दरबार' यानी जनता का दरबार भी लगाया जाएगा, जहां आमजन की समस्याएं सुनी जाएंगी. लोग एक फाॅर्म भर कर जमा करवाएंगे, जिसकी उन्हें रसीद दी जाएगी. 72 घंटे के अंदर शिकायतकर्ता के मोबाइल पर अमरिंदर की आवाज में एक संदेश भेजा जाएगा, जिसकी पुष्टि एसएमएस से भी की जाएगी. जो लोग इस लोकां दा दरबार में नहीं आ पाएंगे, उनके लिए यह नेट पर भी उपलब्ध है.

जनता अपनी शिकायत ऑनलाइन भी दर्ज करा सकेगी. जगतार ने कहा, जब आप शुरुआती चरण में हों तो जरूरी नहीं कि आप पहली ही बार मे तीर मार लें. विरोधियों को हम पर हमला करने देने के लिए मौका देने की जरूरत नहीं है.

अकाली और आप दोनों ही दल गाहे-बगाहे आॅपरेशन ब्लू स्टार व सिख दंगों के मुद्दों को हवा देने की कोशिश में रहते हैं. पिछले तीन दिनों में इन दोनों दलों ने सोशल मीडिया और दूसरे चैनलों पर इस मुद्दे को खूब भुनाया है. यहां तक कि प्रेस काॅन्फ्रेंस तक में दोनों दलों ने इस मुद्दे पर बात खूब बात की. कमलनाथ की नियुक्ति रद्द करके कांग्रेस ने फिलहाल सारे विवाद पर विराम लगा दिया है.

First published: 18 June 2016, 0:18 IST
 
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