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तमिलनाडु की तर्ज पर बिहार: तमिलों की राह पर मधेसी

चारू कार्तिकेय | Updated on: 11 February 2016, 8:13 IST
QUICK PILL
  • बिहार के सत्ताधारी दलों जेडीयू और आरजेडी ने नेपाल में चल रहे मधेसी आंदोलन को अपना समर्थन दिया है. जो कि नई दिल्ली के सतर्क रुख के खिलाफ जा रहा है.
  • नेपाल में भारत के खिलाफ पहले से नाराजगी व्याप्त है. बिहार के नेताओं की \'अतिसक्रियता\' से भारत-नेपाल संबंध प्रभावित हो सकते हैं.

पिछले कई दशकों तक श्रीलंका के साथ संबंधों की वजह से केंद्र और तमिलनाडु के बीच टकराव की स्थिति रही. अब ऐसी ही स्थिति पूर्वी भारत में बनती दिखाई दे रही है जहां बिहार नेपाल के साथ संबंधों के मामले में स्वतंत्र रुख अख्तियार करते दिख रहा है.

बिहार के सत्ताधारी दलों जेडीयू और आरजेडी ने नेपाल में चल रहे मधेसी आंदोलन को अपना समर्थन दिया है. जो कि नेपाल के नए बने संविधान के खिलाफ जा रहा है. वहीं नई दिल्ली ने अभी तक इस मामले में अपने पत्ते नहीं खोले हैं और वह फूंक-फूंक कर कदम बढ़ा रहा है.

श्रीलंका के मामले में भारत ने हमेशा तमिलों के लिए ज्यादा संवैधानिक अधिकारों की वकालत की. तमिल आबादी श्रीलंका की अल्पसंख्यक आबादी है. भारत ने मदेशियों के मामले में बेहद सावधानी के साथ आगे कदम बढ़ाया.

ऐसी खबरें है कि आरजेडी मुखिया लालू यादव ने मधेसियों को राजनीतिक समर्थन देने का वादा किया है

हालांकि, तमिलनाडु की अधिकतर राजनीतिक पार्टियां तमिलों के अन्याय का मुद्दा उठाते हुए श्रीलंकाई सरकारों की आलोचना करती हैं. उनमें वाइको की पार्टी एमएडीएमके ने खुले तौर पर तमिल आतंकी संगठन लिट्टे के प्रति अपना समर्थन जता चुकी है.

मधेसियों के अलावा नेपाल में मैदानी इलाकों में थारु समुदाय भी नए संविधान का विरोध कर रही है. इन दोनों समुदाय की चिंता है कि नए संविधान में उन्हें संसद में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया है.

मधेसियों का विरोध

संविधान में संशोधन की मांग कर रहे मधेसी नेताओं ने पिछले पांच महीने से नेपाल और भारत सीमा पर नाकेबंदी करके रखी थी. यह नाकेबंदी सोमवार को खत्म हो गई लेकिन इस वजह से नेपाल में ईंधन, दवाओं और दूसरे जरूरी सामानों की भीषण कमी पैदा हो गई.

मधेसी नेताओं का एक समूह लगातार बीजेपी, कांग्रेस, एनसीपी, आरजेडी, जेडीयू जैसी पार्टियों से संपर्क में रहा है. ये सभी पार्टियां मधेसियों के प्रति सहानुभूति रखती हैं लेकिन आरजेडी और जेडीयू ने मधेसियों का मुखर समर्थन किया है.

नेपाल के साथ बिहार राज्य की लंबी सीमा लगती है और दोनों तरफ के लोग आसानी से आवाजाही करते हैं. मधेसियों  का बिहार के लोगों के साथ पुराना सामाजिक-सांस्कृतिक संबंध है और यहां तक कि इन्हें भारतीय मूल का माना जाता है.

मधेसियों का विरोध

इन्हीं वजहों से बिहार के नेताओं ने मधेसियों को समर्थन देने का फैसला किया. आरजेडी के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री रघुवंश प्रसाद सिंह का कहना है कि उनकी पार्टी भारत-नेपाल के मजबूत संबंधों के पक्ष में है लेकिन नेपाल में हो रही गतिविधियों पर मूकदर्शक नहीं रह सकती.

जेडीयू ने भी कहा है कि बिहार के लोग नेपाल में अपने बहनों और भाईयों के लिए चिंतित हैं. जेडीयू के प्रवक्ता नीरज ने मीडिया से कहा कि नेपाल में होने वाली किसी भी घटना का सीधा प्रभाव बिहार में पड़ता है.

नेपाल की सरकार ने मधेसियों के आंदोलन और नाकेबंदी के लिए भारत को जिम्मेदार ठहराया है

रघुवंश प्रसाद सिंह का मानना है कि नेपाली लीडरशिप को मधेसियों से बातचीत करके उनके मुद्दों को सुलझाना चाहिए.  उन्होंने यह भी घोषणा कि अगर मध्यस्थता के लिए पार्टी अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव की जरूरत पड़ी तो इसमें कोई संकोच नहीं होगा. इसी महीने मधेसी लोगों का एक डेलिगेशन ने पटना में लालू प्रसाद से मुलाकात की. ऐसी खबरें है कि आरजेडी मुखिया ने उन्हें राजनीतिक सहायता देने का वादा किया है.

मधेसियों का विरोध

नई दिल्ली ने अब तक कोई आधिकारिक लाइन नहीं ली है लेकिन थोड़ी सी नाराजगी जरूर दिखाई है. सितंबर, 2015 में  नेपाल में नया संविधान लागू होने के कुछ ही घंटों बाद भारतीय विदेश मंत्रालय ने एक बयान में चिंता व्यक्त की. विदेश मंत्रालय ने कहा, 'भारत देश की सीमा के कई हिस्सों में हिंसक स्थिति बनी हुई है.'

इस बयान में यह भी कहा गया कि विवादपूर्ण मुद्दों को 'बातचीत के जरिए सुलझाया जाना चाहिए'. इसके अलावा बातचीत को एक संस्थानिक तरीके से आगे बढ़ाए जाने की जरूरत है ताकि व्यापक स्तर पर मुद्दों को लेकर सहमति बनाई जा सके.

दूसरी ओर नेपाल की सरकार ने मधेसियों के आंदोलन और नाकेबंदी के लिए भारत को जिम्मेदार ठहराया. इसके अलावा बिहार के नेताओं को 'अतिसक्रिय' और मामले से 'अनभिज्ञ' कहा गया.

भारत सरकार पर नेपाल के आतंरिक मामलों में दखल देने का आरोप लगा और उन्हें कोसा भी गया. नेपाल में चल रहा विवाद नई दिल्ली के खिलाफ असंतोष पैदा कर रहा है, यह आगे और भी भड़क सकता है. साथ ही यह भी डर बना हुआ है कि काठमांडू को नाराज करने पर उसका झुकाव बीजिंग की ओर हो सकता है.

हालांकि, केंद्र इस मुद्दे पर बिहार के नेताओं को पीछे हटने के लिए नहीं कह सकता और ये नेता उसके सहयोगी भी नहीं है. वास्तव में ये नेता धीरे-धीरे बीजेपी के प्रमुख विरोधी बनते जा रहे हैं. हाल में ही आरजेडी नेता रघुवंश प्रसाद सिंह ने केंद्र पर निशाना साधा है. उन्होंने कहा है कि चीन ने 'नेपाल के आतंरिक मामलों में दखल देना शुरू कर दिया है' और भारत सरकार को ऐसी घटनाओं पर सचेत होना चाहिए.

भारत सरकार पर नेपाल के आतंरिक मामलों में दखल देने का आरोप लगा है

इस समय, रघुवंश और लालू दोनों भारत में ही है और मधेसी नाकेबंदी समाप्त हो चुका है. हालांकि, मधेसियों का आंदोलन जारी है. सीमा की नाकेबंदी को खत्म करने की घोषणा नेपाली प्रधानमंत्री के पी ओली की 19 फरवरी को होने वाली भारत यात्रा से पहले की गई है.

प्रधानमंत्री ओली ने आंदोलन वापस लेने के मधेसियों के फैसले का स्वागत करते हुए इसे एक 'सकारात्मक कदम' बताया. पीएम ने कहा, ‘मुझे विश्वास है कि हमारे बीच बातचीत के माध्यम से ही मतभेदों एवं विवादों का हल किया जा सकता है.'

हालांकि, जब तक नेपाल के मुख्यधारा के नेताओं का हृदय परिवर्तन नहीं हो जाता यह मुद्दा लंबे समय तक सुलगता रहेगा. इस बात की संभावना है कि केंद्र के लिए फिर से तमिलनाडु-श्रीलंका वाली जटिलता सामने आ सकती है. नई दिल्ली हमेशा इस मुद्दे पर हमेशा सतर्क रहेगा जबकि पटना और मुखर हो जाएगा. यह भारत-नेपाल संबंधों में पहले से जारी तनाव में चुनौती पेश करेगा.

First published: 11 February 2016, 8:13 IST
 
चारू कार्तिकेय @CharuKeya

Assistant Editor at Catch, Charu enjoys covering politics and uncovering politicians. Of nine years in journalism, he spent six happily covering Parliament and parliamentarians at Lok Sabha TV and the other three as news anchor at Doordarshan News. A Royal Enfield enthusiast, he dreams of having enough time to roar away towards Ladakh, but for the moment the only miles he's covering are the 20-km stretch between home and work.

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