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सुप्रीम कोर्ट की क्षेत्रीय शाखाएं न्याय की दिशा में ऐतिहासिक कदम सिद्ध हो सकती हैं

सौरव दत्ता | Updated on: 18 April 2016, 23:13 IST
QUICK PILL
  • सुप्रीम कोर्ट देश के अलग-अलग इलाकों में अपनी चार क्षेत्रीय शाखाएं खोलने से जुड़ी याचिका पर विचार कर रहा है.
  • केंद्र सरकार इसके खिलाफ है. सुप्रीम कोर्ट भी पहले ऐसे प्रस्ताव को ठुकरा चुका है. जबकि उसकी एक संविधान पीठ ने इसका समर्थन किया था.
  • भारतीय विधि आयोग भी सुप्रीम कोर्ट की क्षेत्रीय शाखाएं खोलने की अनुशंसा कर चुका है. लेकिन ऐसा करने में कुछ कानूनी रोड़े हैं जिनपर कोर्ट को विचार करना है.

कानूनी कहावत 'जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनाइड' (देर से मिला न्याय अन्याय है) भारत में पूरी तरह सही साबित होती है. भारतीय अदालतों में इतने मामले लंबित हैं कि सुप्रीम कोर्ट से अंतिम फैसला आने तक दशकों लग जाते हैं.

ऐसे में क्या सुप्रीम कोर्ट की देश में कुछ अन्य शाखाएं खोलने से राहत मिलेगी?

ये सवाल एक बार फिर तब मौजूं हो गया जब सुप्रीम कोर्ट ने पुड्डुचेरी के रहने वाले वकील वी वसंतकुमार की इस बाबत एक याचिका को स्वीकार कर लिया.

सुप्रीम कोर्ट कोलकाता, इलाहाबाद, हैदराबाद और मुंबई में अपनी शाखाएं खोलने पर विचार कर रहा है.

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सर्वोच्च अदालत देश के चारों हिस्सों में नेशनल कोर्ट्स ऑफ अपील स्थापित करने की संभावनाओं की पड़ताल करेगा. ये चार शाखाएं पूर्व (कोलकाता), उत्तर (इलाहाबाद), दक्षिण (हैदराबाद) और पश्चिम (मुंबई) में स्थापित की जा सकती हैं.

न्यायिक मामलों के जानकार कई लोगों को मानना है कि सुप्रीम कोर्ट की क्षेत्रीय शाखाएं खोलने से सर्वोच्च अदालत में लंबित मामलों का बोझ कम हो सकता है.

सुप्रीम कोर्ट पूरब, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण में शाखाएं खोलने की याचिका पर विचार कर रहा है

लेकिन ये मामला ऊपर से भले ही सीदा नज़र आता है लेकिन इसमें कई जटिलताएं सामने आ सकती हैं.

कानूनी मामलों से जुड़ी वेबसाइट 'बार एंड बेंच' के अनुसार भारत सरकार ने इसका विरोध किया है. सरकार का दावा है कि अगर ऐसा किया गया तो इससे मुश्किल कम होने के बजाय बढ़ सकती है.

नेशनल कोर्ट्स ऑफ अपील क्या है?


नेशनल कोर्ट्स ऑफ अपील में नियमित दिवानी और फौजदारी के मामले से जुड़ी याचिकाएं दायर की जा सकेंगी. दिल्ली स्थित सुप्रीम कोर्ट केवल संवैधानिक महत्व के मामलों पर विचार करेगा. कानूनी भाषा में ऐसी अदालतों को 'कैसेशन (अपील) कोर्ट' कहते हैं.

19 मार्च, 2010 को सुप्रीम कोर्ट के 27 जजों  की पीठ ने रीजनल ब्रांच खोलने की याचिका खारिज कर दी थी. उस समय सर्वोच्च अदालत ने कहा था कि ऐसे किसी कदम से राष्ट्रीय अखंडता पर आंच आ सकती है. लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि सर्वोच्च अदालत अपनी राय पर दोबारा सोच रही है.

संभव है कि सुप्रीम कोर्ट अपनी ही एक संविधान पीठ के 1986 में दिए फैसले को स्वीकार कर ले.

माना जा रहा है कि सर्वोच्च अदालत मुंबई हाईकोर्ट के जस्टिस एमसी छागला की उस बयान की रोशनी में फैसला ले जिसमें उन्होंने कहा था, "अदालतें जनता की सुविधा के लिए बनायी गई हैं, न कि किसी खास कानूनी या प्रशासनिक व्यवस्था को कायम रखने के लिए."

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इस मसले पर भारत के प्रमुख न्यायविद और जज छागला द्वारा की गई टिप्पणी काफी महत्व रखती है. भारत की भौगोलिक विशालता के साथ ही सामाजिक और आर्थिक विविधता के चलते दिल्ली तक पहुंचना देश के लोगों काफी मुश्किल साबित होता है.

भारत के विधि आयोग में अपनी 229 पेज की रिपोर्ट (2009) में सुप्रीम कोर्ट की रीजनल ब्रांच खोलने की अनुशंसा कर चुका है.

2010 में सुप्रीम कोर्ट के 27 जजों  की पीठ ने रीजनल ब्रांच खोलने की याचिका खारिज कर दी थी

विधि आयोग ने अपनी रिपोर्ट में भारतीय संविधान की अनुच्छेद 130 का भी हवाला दिया है जिसके अनुसार जब तक राष्ट्रपति भारत के मुख्य न्यायाधीश को अनुमति न दें दिल्ली से बाहर सर्वोच्च अदालत की क्षेत्रीय शाखा नहीं खोली जा सकती. आयोग ने अनुशंसा की है कि इस प्रावधान को लचीले ढंग से देखना चाहिए ताकि दिल्ली से बाहर सुप्रीम कोर्ट की शाखा खोलना संभव हो सके.

कानूनी नुक्ता


आम तौर पर माना जाता है कि क्षेत्रीय शाखाएं खुलने से सर्वोच्च अदालत में लंबित मामलों के निपटारे में तेजी आएगी. हालांकि असल मामला थोड़ा अलग है. भारत की सर्वोच्च अदालत के पास इस मामले में दो विशेष अधिकारों का उल्लेख यहां समीचीन होगा.

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1- भारतीय संविधान का अनुच्छेद 142- इसके अनुसार अदालत के पास 'संपूर्ण न्याय' देने का पूरा अधिकार है. इस अधिकार के तहत अदालत कई बार ऐसे जटिल मामलों को स्वीकार करती है जिनमें न्यायपालिका का काफी समय जाता है.

2- भारतीय संविधान का अनुच्छेद 136- इस अनुच्छेद के तहत अदालत उन्हीं मामलों में याचिका स्वीकार कर सकती है जिनमें 'व्यापक जनहित से जुड़ा ठोस कानूनी सवाल खड़ा होता हो.' भारत के पूर्व सॉलिसिटर जनरल और न्यायविद टीआर अंध्यार्जुना के अनुसार भारत की सर्वोच्च अदालत याचिकाएं स्वीकार करने में बहुत उदार है. जिसके कारण ये संवैधानिक अदालत के बजाय एक आम अपील अदालत प्रतीत होने लगती है, जो कि नहीं होना चाहिए.

खुद सुप्रीम कोर्ट ने अपने 2010 के एक फैसले में अनुच्छेद 136 के दुरुपयोग को लेकर तल्ख टिप्पणी की थी.

सुप्रीम कोर्ट 25 अप्रैल को वसंतकुमार की याचिका पर अगली सुनवाई करेगा. उम्मीद है कि अदालत इस मामले पर जो भी फैसला करेगी उससे अदालती चक्करों से बेहाल जनता को थोड़ी राहत मिलेगी.

First published: 18 April 2016, 23:13 IST
 
सौरव दत्ता @SauravDatta29

Saurav Datta works in the fields of media law and criminal justice reform in Mumbai and Delhi.

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