Home » इंडिया » Will Sarkeguda fake encounter perpetrators will be punished
 

क्या सरकेगुडा फर्जी मुठभेड़ के दोषियों को सजा मिल पाएगी?

सुहास मुंशी | Updated on: 18 September 2016, 7:55 IST

बस्तर के बीजापुर जिले में अपना संयुक्त अभियान खत्म हो जाने के बाद 28 जून 2012 को पुलिस और सीआरपीएफ ने दावा किया था कि नक्सलियों के खिलाफ यह अभियान अब तक सबसे बड़ी सफलता है.

पुलिस ने तीन बच्चों समेत 17 लोगों को मार गिराया था. पुलिस को उनके नक्सली होने की आशंका थी. लेकिन मुश्किल से कुछ ही दिनों के बाद, इस मुठभेड़ की सच्चाई सामने आ गई. छत्तीसगढ़ पुलिस और सीआरपीएफ ने दावा किया कि मारे गए लोगों में से सात लम्बे समय से नक्सल कैडर में थे और बाकी आम ग्रामीण थे जो आमने-सामने चलाई गई गोली से मारे गए.

मीडिया के दबाव और छत्तीसगढ़ राज्य विधानसभा में उठे सवालों के बाद सीआरपीएफ के वरिष्ठ अधिकारियों ने निर्दोष नागरिकों की मौत पर खेद जताया और स्वीकार किया कि ये 17 आदिवासी बेगुनाह थे. छत्तीसगढ़ सरकार इसी तरह से काम करती रही है. इन स्वीकरोक्तियों के बावजूद, आज तक सरकेगुडा फर्जी मुठभेड़ घटना के चार साल से अधिक होने के बाद भी, इन सभी मौतों के लिए किसी को भी जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सका है.

लेकिन अब यह स्थिति जल्द ही बदल सकती है. घटना की पहली जांच खत्म होने के कगार पर है. सरकेगुडा के निवासी न्याय की आस में हैं. कथित हत्याओं की जांच के लिए जस्टिस वीके अग्रवाल की अध्यक्षता में एक न्यायिक जांच आयोग गठित किया गया था. आयोग को केवल दो और गवाहों के बयान लेने हैं. इसके बाद ही नवम्बर में किसी समय मामले में अंतिम गवाही शुरू होगी.

कोई भी यह उम्मीद कर सकता है कि मामले का अंतिम निर्णय इस साल के अंत अथवा अगले साल की शुरुआत में आ जाएगा.

यह थी घटना

पीड़ित परिवारों के अनुसार 28 और 29 जून की रात सरकेगुडा गांव में कोट्टागुडा, और राजपेटा गांव के लोग परंपरागत उत्सव बीजपेंडुम (बीजोत्सव) के आयोजन की योजना के मकसद से एकत्र हुए थे ताकि उत्सव मनाने के बाद वे अपने खेतों में बीज बोना शुरू कर सकें. क्षेत्र में मानसून आने वाला था. लगभग 70 लोग खुले खेत में आयोजन की रुपरेखा बना रहे थे कि पुलिस ने उन पर अचानक फायरिंग शुरू कर दी.

विभिन्न दस्तावेजों के आधार पर, ग्रामीणों पर फायरिंग करने वाले पुलिस और सीआरपीएफ के बलों की संख्या 50 से 190 के बीच थी. अगली सुबह जब फोटोग्राफर्स मुठभेड़ स्थल पर फोटो लेने गए तो मुठभेड़ स्थल से लाशें हटाई जा चुकी थीं. कोई भी इन फोटो को देखकर आसानी से असलियत का अंदाज लगा सकता है. कुछ शवों पर गोलियों के गहरे निशान थे जबकि कुछ के शव खून से लथपथ थे.

कुछ लोगों का कहना था कि गोली बहुत ही निकट से मारी गई थी. इन आपरेशनों की अगुवाई कर रहे डीआईजी एस इलांगो के पास कोई जवाब नहीं था कि इन शवों पर चोट के और गोलियों के निशान कैसे आ गए. घटना को लेकर उनका बयान आपरेशन में शामिल उनके जूनियरों से बिल्कुल अलग था.

बताते हैं कि इलांगो ने अपने निकटस्थ लोगों से बातचीत में कहा था कि उनके जूनियर्स को कोई आइडिया ही नहीं था कि वे किस पर फायर कर रहे हैं. घटना पर से पर्दा उठा उनके दस्तावेजों और इससे जुड़े सवालों पर जैसे कि वे घायल कैसे हुए, मुठभेड़ कैसे हुई, आदि पर सिपाहियों के जवाब भी घटना से तालमेल खाते नहीं दिखते थे.

पोस्टमार्टम की रिपोर्ट पर सवाल

कुछ सिपाहियों का दावा था कि दाहिने कंधे में गोली लगने से वे घाय़ल हो गए हैं, पाया गया कि उन्हें अंगूठे या अन्य कहीं चोट लग गई थी, इसलिए वे चोटिल हैं. इसके बाद जो पोस्टमार्टम हुआ, वह तो और भी शर्मनाक है. डॉक्टर जिसने शवों के पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टरों की अगुवाई की थी, जिरह में यह कहते पाए गए कि वे एक ही समय पर दो स्थानों पर मौजूद थे.

उनकी खुद की स्वीकारोक्ति के अनुसार ही पोस्टमार्टम पुलिस अधिकारियों की मौजूदगी में पुलिस थाने के मैदान में किए गए थे. पिछले चार सालों से पीड़ित परिवारों की ओर से मुकदमा लड़ने वाली जगदलपुर लीगल एड की सदस्य ईशा खंडेलवाल कहती हैं कि पिछले चार सालों से ज्यादा समय से ग्रामीणों, सीआरपीएफ और सरकार गवाही दे चुकी है.

20-21 अगस्त 2016 को वीके अग्रवाल जांच आयोग ने डॉ. जीएस ध्रुव (जिन्होंने पोस्टमार्टम परीक्षणों की अगुवाई की थी) से जिरह की है. खंडेलवाल ने कहा कि जिरह में डॉ. ध्रुव ने कोर्ट में खुलासा किया है कि पोस्टमार्टमों में कई विसंगतियां थीं, हमारी समझ से अंतर्विरोध था. इससे स्पष्ट संकेत है कि बिना पोस्टमार्टम किए ही वास्तव में पोस्टमार्टम रिपोर्ट लिख दी गई.

First published: 18 September 2016, 7:55 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी