Home » इंडिया » Will the Supreme Court allow Catholics to follow their own laws?
 

क्या सुप्रीम कोर्ट ईसाइयों को भी मुस्लिमों की तर्ज पर पर्सनल लॉ की इजाजत देगा

कैच ब्यूरो | Updated on: 7 July 2016, 7:36 IST
QUICK PILL
  • कैथोलिक एसोसिएशन ऑफ दक्षिण कन्नड़ जिले के पूर्व प्रेसिडेंट क्लीयरेंस पैस ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका देकर ईसाइयों को मुस्लिमों की तरह पर्सनल लॉ दिए जाने की मांग की है.
  • एडिशनल सॉलीसिटर जनरल नीरज किशन कौल और पूर्व सॉलीसिटर जनरल सोली सोराबजी की मांग पर सुप्रीम कोर्ट का बेंच मामले की सुनवाई के लिए तैयार हो गई है. सुप्रीम कोर्ट के बेंच में चीफ जस्टिस तीरथ ठाकुर और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ शामिल हैं.

दिसंबर 2013 में 84 वर्षीय वकील और कैथोलिक एसोसिएशन ऑफ दक्षिण कन्नड़ जिले के पूर्व प्रेसिडेंट क्लीयरेंस पैस ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. उनका कहना था कानून को निश्चित तौर पर सबके लिए समान होना चाहिए. 

पैस ने कहा कि अगर संविधान और कानून मुसलमानों को उनका निजी कानून मामने की इजाजत देता है तो फिर ईसाइयों को कैथोलिक चर्च के कानून मानने की आजादी क्यों नहीं होनी चाहिए?

एडिशनल सॉलीसिटर जनरल नीरज किशन कौल और पूर्व सॉलीसिटर जनरल सोली सोराबजी की मांग पर सुप्रीम कोर्ट की बेंच मामले की सुनवाई के लिए तैयार हो गई है. सुप्रीम कोर्ट के बेंच में चीफ जस्टिस तीरथ ठाकुर और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ शामिल हैं.

क्या है मामला?

पैस ने कैथोलिक दंपत्तियों के लिए तलाक के कानून पर सवाल उठाया था. उन्होंने कहा कि भारतीय कानून यानी तलाक कानून 1869 और इंडियन क्रिस्चियन मैरिज एक्ट 1872 में चर्च की तरफ से लगाई जाने वाली अदालत को मंजूरी नहीं दी गई है और इस वजह से कई ईसाइयों को समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है. पहले इन अदालतों को विवाह संबंधी मामलों में फैसला लेने का अधिकार था.

उन्होंने कहा कि इस कारण हजारों लोगों के भारतीय दंड संहिता की धारा 494 के तहत एक पत्नी के होते हुए दूसरी पत्नी से विवाह करने के जुर्म में दोषी साबित होने का खतरा बढ़ गया है. सरकार ने पैसे की याचिका का विरोध किया था.

सरकार का कहना था कि 1996 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक इस कानून को खारिज किया जाना चाहिए कि केवल सिविल कोर्ट्स ही ईसाई शादी को नकार सकता है.

हालांकि पैस ने संविधान की धारा 14 का हवाला देते हुए पूछा कि आखिर क्यों मुस्लिम और ईसाई के बीच फर्क किया जा रहा है.

कांटों भरा सफर

पैस के पीआईएल में मेरिट हो सकता है लेकिन इससे आने वाले दिनों में संघर्ष की संभावना छिपी हुई है. पहला तो यह कि मौजूदा सरकार फिलहाल समान नागरिक संहिता लाने के लिए विचार कर रही है, जिसका कई अल्पसंख्यक समुदाय विरोध कर रहे हैं. उनका कहना है कि इस कानून के लागू होने से उनकी धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकारों का हनन होगा.

वह यूनिफॉर्म सिविल कोड के बदले कॉमन सिविल कोड की मांग कर रहे हैं ताकि धर्म में मौजूद प्रतिगामी धारणाओं को खत्म करते हुए धार्मिक विविधता को बनाए रखा जा सके. इसके अतिरिक्त बीजेपी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर ईसाईयों के खिलाफ  काम करने का आरोप लगता रहा है. ओड़ि़शा के कंधमाल या गुजरात के दांग इलाके में ईसाईयों को भगवा प्रकोप का सामना करना पड़ा है.

इसमें एक दूसरा पहलू भी है. भगवा दल हर मुमकिन कोशिश कर अपने ऊपर लगे मुस्लिम विरोधी के ठप्पे को मिटाना चाहते हैं. हालांकि इस मामले में अभी सुनवाई की शुरुआत भी नहीं हुई है लेकिन इन सवालों और शंकाओं को देखते हुए कहा जा सकता है कि आने वाले दिनों में यह जबरदस्त कानूनी संघर्ष का रूप लेगा.

First published: 7 July 2016, 7:36 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी