Home » इंडिया » With an eye on UP 2017, is Uniform Civil Code BJP's next jumla?
 

क्या 2017 चुनावों के मद्देनजर समान नागरिक संहिता भाजपा का एक और जुमला है?

चारू कार्तिकेय | Updated on: 2 July 2016, 7:27 IST
(कैच न्यूज)

अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण और अनुच्छेद 370 की समाप्ति के साथ ही भाजपा की सबसे पुरानी चुनावी चालों में से समान नागरिक संहिता (यूसीसी) भी है. ऐसे में यह हैरानी वाली बात नहीं है कि केंद्र सरकार ने कथित रूप से यूसीसी के क्रियान्वयन की जांच और इसे गंभीरता से लागू करने के लिए विधि आयोग से कहा है.

अगर यह फैसला सही है तो यह चुनावी चालबाजी का एक ट्रेडमार्क है, जिसे आने वाले चुनावों को ध्यान में रखते हुए अपनाया गया है.

इकोनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि केंद्रीय कानून मंत्रालय ने विधि आयोग को पत्र लिखकर पूछा है, "समान नागरिक संहिता के संबंध में जांच कर रिपोर्ट प्रस्तुत की जाए." रिपोर्ट में लिखा है कि विधि आयोग विशेषज्ञों और हितधारकों से चर्चा करके अपनी रिपोर्ट सौंपेगा. इस वक्त आयोग के प्रमुख सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति बलबीर सिंह चौहान हैं.

क्या है समान नागरिक संहिता?

भारत के सभी धर्मों की विविध शिक्षाओं और संस्कृतियों के आधार पर मौजूद तमाम निजी कानूनों के स्थान पर यूसीसी एक समान कानून बनाने की बात करता है. यह कानून काफी हद तक विवाह, तलाक, विरासत, गोद लेने और रखरखाव से संबंधित हैं.

यूसीसी का प्रस्ताव है कि सभी नागरिकों के लिए स्थानीय रूढ़ियों और धर्मों की परवाह किए बगैर उपरोक्त मामलों के लिए एक समान कानून होना चाहिए.

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निश्चित तौर पर यह एक असंवैधानिक प्रस्ताव नहीं है. भारत के संविधान के भाग 4 में अनुच्छेद 44 राज्य को "भारत के राज्यक्षेत्र के अंतर्गत नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता को सुरक्षित करने के प्रयास" की बात कहता है. 

हालांकि इस संहिता की स्वयं संविधान में विस्तृत व्याख्या नहीं है, और इसी जगह भाजपा अपने लाभ के लिए इस अस्पष्टता का उपयोग करने की कोशिश कर रही है.

हालांकि संघ परिवार इसका प्रयोग राजनीतिक चाल के रूप में करता है और इसे केवल एक समुदाय के खिलाफ सावधानी से तैयार किए गए हमले के रूप में करता है. भाजपा ने यूसीसी और दो अन्य मुद्दों को दशकों से अपने चुनावी घोषणा पत्र में शामिल कर रखा है और हालिया 2014 आम चुनाव के घोषणा पत्र में भी इसे शामिल किया गया था.

उच्च जाति का तुष्टिकरण

लेकिन इसे कभी अमल में नहीं लाए जा सकने के पीछे कारण यह रहा कि यह राम मंदिर और अनुच्छेद 370 की ही तरह बेहद विभाजनकारी मुद्दा है. फिर भी पार्टी ने ऊंची जाति के हिंदू वोटबैंक को खुश करने के लिए अपने घोषणा पत्र में शामिल किया है.

अगले साल उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव में जीत के लिए अगड़ी जातियों के तुष्टिकरण को आवश्यक माना जा रहा है. इस वक्त इस मुद्दे को फिर से उठाकर भाजपा अपनी पुरानी राजनीतिक चाल के जरिये अपने मूल वोट बैंक को मजबूत करने की उम्मीद कर रही होगी.

केवल सात दिन चुप रहेंगे सुब्रमण्यम स्वामी

यद्यपि अनधिकारिक माध्यमों से राम मंदिर के मुद्दे को फिर से उठा दिया गया है. जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आएंगे तो यह स्पष्ट है कि राम मंदिर का मुद्दा भी औपचारिक रूप से साथ आ जाएगा.

भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने हाल ही में एक ट्वीट किया था कि वे राम मंदिर मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में दिन प्रतिदिन की सुनवाई के अपने अभियान को फिर से तेज करने की तैयारी कर रहे हैं.

यहां तक की उत्तर प्रदेश से बाहर भी भाजपा से इन तीनों मुद्दों पर बयानबाजी की उम्मीद है, और क्योंकि इनका पार्टी के लिए राष्ट्रीय महत्व है, यह 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के अलावा 2019 के लोकसभा चुनाव के अभियान में भी मदद करेगा.

First published: 2 July 2016, 7:27 IST
 
चारू कार्तिकेय @CharuKeya

Assistant Editor at Catch, Charu enjoys covering politics and uncovering politicians. Of nine years in journalism, he spent six happily covering Parliament and parliamentarians at Lok Sabha TV and the other three as news anchor at Doordarshan News. A Royal Enfield enthusiast, he dreams of having enough time to roar away towards Ladakh, but for the moment the only miles he's covering are the 20-km stretch between home and work.

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