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गिलानी का हड़ताली कैलेंडर और एक चायवाले की गुमटी

पार्थ एमएन | Updated on: 24 October 2016, 11:05 IST
(सजाद मलिक/कैच न्यूज़)
QUICK PILL
  • श्रीनगर में निज़ाम पीडीपी-बीजेपी की सरकार का है लेकिन कश्मीरियों पर हुक़ूमत सैय्यद अली शाह गिलानी करते हैं. 
  • वह ख़ुद तो एक घर में नज़रबंद हैं लेकिन फिर भी वही तय करते हैं कि अगली सुबह कश्मीर में चहल-पहल होगी या फ़िर सिर्फ़ सन्नाटा. 

दुकानों के शटर नीचे गिरे हुए हैं. दुकानदार अपने घरों में दुबके बैठे हैं. जहां तक नज़र जाती है, वहां तक सड़कें सुनसान दिखती हैं. शहर एक भुतहा कस्बे जैसा दिखता है. ख़ूबसूरत डल झील के किनारे हाउसबोट्स सूनी पड़ी हैं और शिकारा लंगर डाले हुए हैं. 

श्रीनगर, कश्मीर घाटी की तस्वीर का अक्स है. यहां के माहौल में ठंडक है. 87 साल के बुज़ुर्ग हुर्रियत नेता सैय्यद अली शाह गिलानी यहीं अपने घर में नज़रबंद हैं. यहीं से गिलानी घाटी में होने वाले विरोध प्रदर्शनों का कैलेंडर जारी करते हैं. घाटी में ज़िंदगी इन्हीं कैलेंडरों के इर्द-गिर्द घूमती है, सिवाय दो लोगों के.

चाय की गुमटी

मोहम्मद शफी (50) और मोहम्मद युसूफ (47) लाल चौक के लैम्बर्ट लेन में हमेशा की तरह सुबह-सुबह आ चुके हैं. यह उनका रोज़ाना का काम है. उनके मिलनसार रवैये से सब अच्छी तरह वाकिफ हैं. दोनों चचेरे भाई पिछले 25 सालों से यहां चाय की दुकान चला रहे हैं. उन्होंने नब्बे के दशक के डरावने और वीभत्स दिनों को देखा है और अभी भी वे उसी माहौल में रह रहे हैं. 

शफी अपने काम से ब्रेक लेते हुए कहते हैं कि मैं इसी लेन में चाय बेचता था जब नब्बे के शुरुआती दशक में एक ग्रेनेड एक घर को भेदता हुआ मेरे पास आकर गिरा था. युसूफ अपने काम में जुटे हुए हैं. वह आगे कहते हैं कि मौजूदा हालात भी नब्बे के डरावने दिनों से कम नहीं हैं.

चाय की दुकान खोलने से पहले शफी डल झील पर हाउसबोट चलाया करते थे. मगर हाउसबोट के रख-रखाव और मरम्मत के लिए पैसों की तंगी होने लगी और फ़िर एक बार हाउसबोट में लीक होने के नाते वह झील में डूब गई. शफ़ी डायबिटीज़ के मरीज़ हैं. एक दिन की दवा में उनके 200 रुपए खर्च हो जाते हैं. उन पर अपने पांच बच्चों दो बेटियां और तीन बेटों की ज़िम्मेदारी है. इन पांच बच्चों में से फिलहाल तीन पढ़ रहे हैं.

मजबूत कद-काठी वाले और कुर्ता पहने शफी कहते हैं कि मैं अपने साथी दुकानदारों के साथ गिलानी साहब के कैलेंडर का पालन करता हूं. मुझे मालुम है और मैं इत्तेफाक भी रखता हूं कि वे किसलिए लड़ रहे हैं. हम सभी कश्मीर में दमनकारी रवैये का शिकार हैं. मगर मैं हड़ताल का हिस्सा नहीं हो सकता क्योंकि मेरे ऊपर पांच बच्चों का भार है.

गिलानी साहब और उनकी हड़तालें

शफी आगे कहते हैं कि त्राल में हिजबुल के आतंकी बुरहान वानी के मारे जाने को तीन माह से ज़्यादा का वक़्त गुज़र चुका है. तभी से विरोध-प्रदर्शन जारी हैं. नतीजतन 90 से ज्यादा कश्मीरियों की मौत हो चुकी है. पेलेट की गोलियों से 12 हज़ार से ज़्यादा लोग घायल हो चुके हैं. सालों से जो गुस्सा जमा हुआ था, वह मौजूदा संकट की वजह से फूट पड़ा है.

इसके चलते  घाटी में बड़े पैमाने पर हड़ताल को बढ़ावा मिला जिसकी मजबूत डोर गिलानी साहब के हाथ में है. वह अपने घर में नजरबंद रहकर भी हड़ताल को उसी तरह तय करते हैं, जैसे कोई अपनी मनमर्ज़ी से बिजली का स्विच ऑन-ऑफ करता है. 

मगर श्रीनगर के लैम्बर्ट लेन के एक कोने में ये चाय की दुकान एकमात्र ऐसा ठिकाना है जहां हड़ताल के दिन भी लोग दिख जाते हैं. पिछले तीन महीनों से रिपोर्टिंग करने वाले कश्मीरी पत्रकारों के लिए यह चाय की दुकान उनका अड्डा बन गई है. पूरे भारत से आने वाले पत्रकारों और यहां तक कि विदेशी पत्रकारों ने भी शफ़ी की चाय का लुत्फ़ उठाया है. शफी की दुकान से सटी दुकानों की सीढ़ियां शफी के ग्राहकों के लिए बेंच का काम करती हैं. 

पत्रकार इन सीढ़ियों पर आकर बैठ जाते हैं और चाय-बिस्कुट के साथ अपनी-अपनी खबरों पर चर्चा करते हैं. शफी पर ज़रा-सा दबाव डालो तो वह ऑमलेट भी बना देते हैं जब शहर में खाने के लिए कुछ भी नहीं मिल पाता. आसपास के लोग भी 

अक्सर उनका साथ निभाने वहां आ जाते हैं. शफ़ी की गरमागरम चाय पीते हुए वहां मौजूद पत्रकारों से उन्हें हालात की ताज़ा जानकारी मिल जाती है. 

जवानों का भी अड्डा

दिलचस्प यह है कि सिर्फ़ ये लोग ही शफी के ग्राहक नहीं हैं. उनके यहां चाय पीने इलाक़े में गश्त लगा रहे अर्धसैनिक बलों के जवान भी हैं. शफी कहते हैं कि सचमुच देखा जाए तो अर्धसैनिक बलों के जवान मेरा धंधा चलाने में मददगार हैं. एक बार उन्हें एहसास हो जाता है कि मैं कोई हंगामा या शोर-शराबा नहीं कर रहा हूं, तो वे भी मेरे ग्राहक बन जाते हैं.

यह पूछने पर कि क्या उन्होंने सुरक्षा बलों के लोगों को दोस्त बनाए हैं? शफी इसपर हंस देते हैं. शफी कहते हैं कि उनका रवैया सभी से मीठा और मिलनसार मगर मैं दावे के साथ नहीं कह सकता कि वे मुझ पर लाठी नहीं चलाएंगे.

चाय और ऑमलेट बेचकर शफी ने वो आसाधारण काम किया है जिसे करना बड़े से बड़े नेता के लिए मुश्किल है. वह सुरक्षाबलों, पत्रकारों, आम नागरिकों के साथ एक जैसा व्यवहार करते हैं. चाय-ऑमलेट देने में वह भेदभाव नहीं करते. शफ़ी बेहद कम पढ़े हैं. वह कहते हैं कि उनके साथी दुकानदार भी उनके साथ अलग व्यवहार नहीं करते. मेरे मन में गिलानी साहब के लिए सबसे ज्यादा इज्जत है. वह कहते हैं कि मैं दुकान इसलिए नहीं खोलता कि मैं उनका हुक्म नहीं मान रहा हूं बल्कि इसलिए खोलता हूं कि यह हिम्मत का काम है.

रेंगती ज़िंदगियां

इस नाफ़रमानी और हिम्मत के बीच शफ़ी रोजाना लगभग 800 रुपए कमा लेते हैं. हालांकि, पिछले साढ़े तीन महीनों में घाटी में 10 हज़ार करोड़ रुपए का नुकसान हो चुका है. लोअर मिडिल क्लास के 32 साल के इन्तियाज खान की लाल चौक में कपड़ों की छोटी-सी दुकान से कोई बिक्री नहीं हुई है. 

उन्हें घर चलाने में काफी परेशानी हो रही है. फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी है. वह कहते हैं कि अब बहुत हो गया है. हम इस समय कुछ भी काम करने को तैयार हैं.

घाटी के लोगों पर गिलानी के असर की हुकूमत चलती है जिसका असर सरकार पर पड़ता है. विपक्ष की तो अटकलें ही लगती हैं. राज्य के शिक्षा मंत्री नईम अख़्तर ने गिलानी (जिसे उनकी सरकार ने ही नजरबंद करके रखा हुआ है) को एक गुज़ारिश भरी चिट्ठी लिखी है कि घाटी में फिर से स्कूल खोलने की इजाज़त दी जाए.

कश्मीर में कर्फ्यू और हड़ताल के बीच की रेखा धुंधली-सी है. सिवाय इस तथ्य के कि कर्फ्यू को अपनी मनमर्ज़ी से तोड़ा जा सकता है. गिलानी काबू में हैं लेकिन वह अपना काम कर रहे हैं. हालांकि शांति और सम्मान के साथ लैम्बर्ट लेन के एक कोने से उनके फरमान को चुनौती भी मिल रही है. और ये चुनौती देने वाले हैं शफी और यूसुफ़. 

First published: 24 October 2016, 11:05 IST
 
पार्थ एमएन @catchhindi

Parth is a special correspondent with the Los Angeles Times. He has a degree in mass communication and journalism from Journalism Mentor, Mumbai. Prior to journalism, Parth was a professional cricketer in Mumbai for 10 years.

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